क्या इंसाफ अब सिर्फ़ कागज़ों में रह गया है...?📃
एक किसान... बेबस न्याय की चौखट पर खड़ा है। उसका आरोप है कि 13 जुलाई को उस पर और उसकी पत्नी पर दबंगों ने हमला किया गया, गहने लूट लिए गए, जातिसूचक गालियां दी गईं और जमीन छोड़कर गांव से चले जाने की धमकियां दी गईं। पीड़ित का यह भी आरोप है कि सात जुलाई को भी उससे मारपीट की गई थी जिसकी शिकायतों पर स्थानीय पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय उसे ही डराया-धमकाया। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि उस भरोसे पर गहरी चोट है जो हर नागरिक कानून और न्याय व्यवस्था से रखता है। आखिर एक घायल और बेबस इंसान को अपनी ही पीड़ा साबित करने के लिए बार-बार आवेदन क्यों देने पड़ते हैं? दुर्भाग्य यह है कि ऐसे आरोपों वाले मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं, जहां पीड़ितों का कहना होता है कि उनकी शिकायतों पर समय पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई। जब ऐसा होता है, तो सवाल केवल एक थाने या एक मामले का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का खड़ा होता है, जिस पर आम आदमी अपना सबसे बड़ा भरोसा रखता है। जब व्यवस्था मौन हो जाती है, तब अपराधियों के हौसले बोलने लगते हैं।जब पीड़ित ही असुरक्षित महसूस करने लगे, तब कानून का डर नहीं, बल्कि न्याय पर से भरोसा टूटने लगता है। पुलिस का काम किसी प्रभावशाली व्यक्ति का नहीं, कानून का पक्ष लेना है। वर्दी की असली गरिमा तब है, जब सबसे कमजोर और बेबस व्यक्ति भी यह विश्वास कर सके कि उसकी आवाज़ सुनी जाएगी और अपराधी, चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो, कानून के सामने खड़ा होगा। इस मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच होनी चाहिए। यदि लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार लोगों पर भी सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि न्याय में देरी सिर्फ एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होती, बल्कि पूरे समाज के विश्वास की हार होती है।
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