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20 साल का इंतजार खत्म ! #ग्लासगो से #गुजरात पहुंचा #Commonwealth #games का झंडा, 2030 में मिला भारत को मेजबानी बानी का मौका 2030 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) का झंडा ग्लासगो से गुजरात पहुंच गया है। गांधीनगर में आयोजित कैबिनेट मीटिंग के दौरान डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष सांघवी ने यह झंडा औपचारिक रूप से चीफ मिनिस्टर भूपेंद्र पटेल को सौंपा। इसके साथ ही गुजरात में 2030 राष्ट्रमंडल खेलों की आधिकारिक तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस खास मौके पर ग्लासगो में गुजरात का प्रतिनिधित्व करने वाले पैरा-एथलीट राकेश भट्ट, रोहित मजगुल और पैरा टेबल टेनिस खिलाड़ी सोनल पटेल भी मौजूद थे। बैठक में पूरी राज्य कैबिनेट ने इस पल का उत्साह के साथ स्वागत किया। #CWG झंडे की मौजूदगी और महत्व अब यह राष्ट्रमंडल ध्वज 2030 के खेलों के आयोजन तक गुजरात में ही रहेगा। यह झंडा राज्य में खेलों के प्रति उत्साह बढ़ाएगा और खिलाड़ियों को बेहतरीन प्रदर्शन के लिए प्रेरित करेगा। ग्लासगो खेलों में भारत का प्रदर्शन बेहद शानदार रहा। भारत ने 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज़ समेत कुल 39 मेडल जीतकर तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय पैरा-एथलीटों ने भी इतिहास रचते हुए 3 गोल्ड, 2 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज़ मेडल अपने नाम किए, जिससे पोडियम पर पहुंचने का 20 साल लंबा इंतजार खत्म हुआ। #झंडा सौंपने की परंपरा क्यों खास है? #कॉमनवेल्थ #गेम्स के समापन समारोह में झंडा अगले मेजबान देश को सौंपने की एक पुरानी और गरिमामय परंपरा है: मेजबानी का अधिकार: यह ध्वज आयोजन की जिम्मेदारी का प्रतीक है। परंपरा और एकता: यह गेम्स की निरंतरता, विश्वास और कॉमनवेल्थ देशों के बीच दोस्ती को मजबूत करता है। मूल्यों का प्रसार: यह झंडा निष्पक्ष खेल, आपसी सम्मान और विश्व बंधुत्व का संदेश देता है। यह #ध्वज केवल एक औपचारिक वस्तु नहीं है, बल्कि दुनिया को “खेल हम सबको जोड़ता है” का संदेश देने वाला शांति और भाईचारे का प्रतीक है। @followers #flags #sports #khel #gujrat #GujratNews #GujratSportsNews #छत्तीसगढ़ #chhattisgarh #ChhattisgarhNews #लोरमी_को_सौगात #लोरमी_के_गौरव #लोरमीमुंगेलीन्यूज़ #lormimungelinews #छत्तीसगढ़_के_माटी #छत्तीसगढ़_महतारी #छत्तीसगढ़ #LocalNews #BreakingNews #BigBreakingNews #todaynews #IndiaNews #NationalNews #ViralNewsUpdate #BigBreaking #LatestUpdates #LatestNews न्यूज़ के लिए कृपया फॉलो करें धन्यवाद👇👇👇 https://www.facebook.com/LORMIMUNGELINEWS?sk=followers

Lormi, Mungeli | Aug 5, 2026

MORE NEWS

#पीएम #मोदी की #वीडियो हटाने पर बढ़ा विवाद, #meta को #सेफहार्बर बंद करने की चेतावनी, जानिए क्या है यह क्लॉज

#technology #Desk #प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा एक वीडियो फेसबुक से हटाए जाने के बाद विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। इस मामले ने अब राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तर पर गंभीर रूप ले लिया है। संसद की सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने इस घटना को गंभीर बताते हुए मेटा (Meta) के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। बताया जा रहा है कि उन्हें इसके लिए तीन दिन का समय दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार, यदि तय समय के भीतर उचित जवाब नहीं मिलता है, तो दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति सोशल मीडिया कंपनियों को मिलने वाले सेफ हार्बर संरक्षण पर विचार कर सकती है। इसी वजह से एक बार फिर सेफ हार्बर क्लॉज चर्चा का विषय बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से हटा दिया गया, जिसके बाद इसे लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे। आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने बिना पर्याप्त कारण बताए वीडियो हटाया। इस घटना को लेकर संसदीय समिति ने कड़ा रुख अपनाया है और मेटा से स्पष्टीकरण मांगा है।

क्या होता है सेफ हार्बर क्लॉज?
सेफ हार्बर प्रावधान सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत दिया गया कानूनी संरक्षण है। इसके तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उनके यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना जाता।

इसका मतलब यह है कि यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट, फोटो, वीडियो या टिप्पणी साझा करता है, तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होती है, न कि प्लेटफॉर्म की। प्लेटफॉर्म केवल एक मध्यस्थ (Intermediary) की भूमिका निभाता है।

आसान भाषा में समझें
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने फेसबुक पर आपत्तिजनक या कानून का उल्लंघन करने वाला कोई पोस्ट किया। मौजूदा सेफ हार्बर प्रावधान के अनुसार, उस पोस्ट के लिए जिम्मेदार वही व्यक्ति होगा जिसने उसे साझा किया है। फेसबुक पर सीधे कार्रवाई नहीं होगी, जब तक कि वह कानून के अनुसार आवश्यक कदम उठाने में विफल न रहे।

लेकिन यदि सेफ हार्बर का संरक्षण हटा दिया जाता है, तो ऐसे मामलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यानी यूजर के साथ-साथ प्लेटफॉर्म के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

किन कंपनियों पर पड़ेगा असर?
यदि सेफ हार्बर क्लॉज हटाया जाता है, तो इसका सबसे अधिक असर फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पड़ेगा। इसके अलावा क्लाउड कंप्यूटिंग, मेटावर्स, ब्लॉकचेन, क्रिप्टोकरेंसी, डीपफेक और डॉक्सिंग जैसी डिजिटल सेवाओं से जुड़ी कंपनियों के लिए भी कानूनी जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं।

ऐसी स्थिति में कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट की अधिक निगरानी करनी पड़ सकती है और नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।

सरकार का क्या कहना है?
सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को पूरी तरह कानूनी छूट नहीं मिलनी चाहिए। यदि किसी प्लेटफॉर्म पर हानिकारक, गलत या नियमों का उल्लंघन करने वाला कंटेंट मौजूद रहता है और समय पर उस पर कार्रवाई नहीं होती, तो केवल सेफ हार्बर का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचना उचित नहीं माना जा सकता।

इसी कारण सरकार इस मामले में मेटा से जवाब और माफी की मांग कर रही है। यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो सेफ हार्बर से मिलने वाले कानूनी संरक्षण पर कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों की राय
कई विशेषज्ञों का मानना है कि सेफ हार्बर प्रावधान के कारण कई बार सोशल मीडिया कंपनियां कंटेंट मॉडरेशन, तथ्य-जांच और आपत्तिजनक सामग्री को समय पर हटाने में पर्याप्त सक्रिय नहीं रहतीं। उनका कहना है कि यदि प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी तय होगी, तो वे गलत और हानिकारक कंटेंट पर अधिक तेजी से कार्रवाई करेंगे।

वहीं दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि प्लेटफॉर्म पर कानूनी जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ा दी जाती है, तो कंपनियां विवाद से बचने के लिए बड़ी संख्या में पोस्ट हटाने लगेंगी, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी असर पड़ सकता है।

2021 के आईटी नियम क्या कहते हैं?
सरकार ने वर्ष 2021 में लागू किए गए आईटी नियमों के तहत बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए कुछ जिम्मेदारियां तय की थीं। इन नियमों के अनुसार कंपनियों को भारत में एक मुख्य अनुपालन अधिकारी (Chief Compliance Officer – CCO), निवासी शिकायत अधिकारी (Resident Grievance Officer – RGO) और नोडल संपर्क व्यक्ति (Nodal Contact Person) नियुक्त करना अनिवार्य किया गया है। इन अधिकारियों का उद्देश्य शिकायतों का समाधान करना, कानून का पालन सुनिश्चित करना और सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय बनाए रखना है। 

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Lormi, Mungeli | Aug 6, 2026

#भारत #म्यांमार #जमीन की अदला-बदली करेंगेः सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम, इधर मणिपुर में सुलगने लगी विरोध की चिंगारी

India-Myanmar Border Dispute: भारत-म्यांमार सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत-म्यांमार जमीन की अदला-बदली करेंगे। वर्षों से लंबित सीमा सीमांकन का मामला सुलझाने की दिशा में बातचीत शुरू भी हो गई है। हालांकि इस प्रस्ताव ने मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक विरोध की आहट पैदा कर दी है। जमीन की अदला-बदली की लेकर मणिपुर में विरोध की चिंगारी सुलगने लगी है। पहले ही 2 साल से अधिक दिनों से हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर के लिए यह फैसला आग में घी डालने का काम कर सकती है और स्थिति विध्वंसक हो सकती है।

दरअसल भारत-म्यांमार सीमा विवाद पर 4 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि सीमा पर कुछ ऐसे इलाके हैं जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है. उन हिस्सों पर बातचीत चल रही है। हालांकि उन्होंने इन खबरों की पुष्टि नहीं की कि दोनों देशों के बीच जमीन की अदला-बदली हो सकती है।

वहीं प्रस्तावित योजना का मणिपुर में पहले ही विरोध शुरू हो गया है। ‘कोऑर्डिनेटिंग कमिटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (COCOMI) ने भारत सरकार को चेतावनी दी है कि वह राज्य के इलाके का एक छोटा सा हिस्सा भी म्यांमार को न सौंपे। संगठन ने कहा कि अगर ऐसा कोई प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो वे इसके खिलाफ जबरदस्त जन-विरोध करेंगे। संगठन ने आगे चेतावनी दी कि नई दिल्ली को मणिपुर के लोगों की सहमति के बिना उसकी क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाला कोई भी फैसला लेकर ‘आग से नहीं खेलना’ चाहिए। COCOMI संगठनन ने तर्क दिया कि 1949 में भारतीय संघ में विलय के बाद से मणिपुर ने अपने ऐतिहासिक इलाके के कुछ हिस्से पहले ही खो दिए हैं। चेतावनी दी कि राज्य की भौगोलिक सीमाओं में और कोई भी कटौती मंज़ूर नहीं होगी, जैसा कि ‘द इम्फाल टाइम्स’ ने रिपोर्ट किया। मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को ऐसा मुद्दा बताते हुए जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता, संगठन ने कहा कि राज्य की मौजूदा सीमाएँ पिछली पीढ़ियों से विरासत में मिली हैं और समय-समय पर उनकी रक्षा की गई है।इतिहास

भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा इतिहास

बता दें कि भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है और फिर म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र और चिन राज्य में जाती है। सीमा का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी, जंगली और खुला है, जो उन जातीय समुदायों के इलाकों से होकर गुजरता है जो दोनों तरफ रहते आए हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार, सीमा के लगभग 1,472 किलोमीटर हिस्से को बॉर्डर पिलर के जरिए तय किया गया है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर हिस्सा अभी भी अनसुलझा है। यह मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी में है।

अमेरिकी मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ ने किया है दावा

बता दें कि यह दावा अमेरिका की मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ (The Diplomat) ने की है। अमेरिकी मैगज़ीन की रिपोर्ट के मुताबिक अदला-बदली के लिए प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में है, जो म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र में काबाव घाटी से सटा हुआ है। 17 जुलाई की रिपोर्ट में मैगजीन ने कहा कि भारत सरकार म्यांमार के साथ मणिपुर की सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 और 68 के बीच सीमा तय करने के लिए लगभग 1.4 वर्ग मील जमीन की अदला-बदली के ‘प्रस्ताव’ की जांच कर रही है. पिलर 65 और 68 के बीच की दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर है। सीमा तय करने का काम तीन महीने के भीतर, यानी अगस्त के आसपास पूरा होने की उम्मीद थी। मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन की अदला-बदली के संभावित प्रस्ताव के पीछे मुख्य मकसद भारत-म्यांमार सीमा के अनसुलझे हिस्से को तय करने की प्रक्रिया में तेजी लाना है। जिससे नई दिल्ली सीमा पर बाड़ लगा सके और अवैध आप्रवासन, उग्रवादियों की आवाजाही और सीमा पार होने वाले अन्य अपराधों को रोका जा सके।

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#भारत #म्यांमार #जमीन की अदला-बदली करेंगेः सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम, इधर मणिपुर में सुलगने लगी विरोध की चिंगारी India-Myanmar Border Dispute: भारत-म्यांमार सीमा विवाद सुलझाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सीमा विवाद सुलझाने के लिए भारत-म्यांमार जमीन की अदला-बदली करेंगे। वर्षों से लंबित सीमा सीमांकन का मामला सुलझाने की दिशा में बातचीत शुरू भी हो गई है। हालांकि इस प्रस्ताव ने मणिपुर में राजनीतिक और सामाजिक विरोध की आहट पैदा कर दी है। जमीन की अदला-बदली की लेकर मणिपुर में विरोध की चिंगारी सुलगने लगी है। पहले ही 2 साल से अधिक दिनों से हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर के लिए यह फैसला आग में घी डालने का काम कर सकती है और स्थिति विध्वंसक हो सकती है। दरअसल भारत-म्यांमार सीमा विवाद पर 4 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि सीमा पर कुछ ऐसे इलाके हैं जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है. उन हिस्सों पर बातचीत चल रही है। हालांकि उन्होंने इन खबरों की पुष्टि नहीं की कि दोनों देशों के बीच जमीन की अदला-बदली हो सकती है। वहीं प्रस्तावित योजना का मणिपुर में पहले ही विरोध शुरू हो गया है। ‘कोऑर्डिनेटिंग कमिटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ (COCOMI) ने भारत सरकार को चेतावनी दी है कि वह राज्य के इलाके का एक छोटा सा हिस्सा भी म्यांमार को न सौंपे। संगठन ने कहा कि अगर ऐसा कोई प्रस्ताव लागू किया जाता है, तो वे इसके खिलाफ जबरदस्त जन-विरोध करेंगे। संगठन ने आगे चेतावनी दी कि नई दिल्ली को मणिपुर के लोगों की सहमति के बिना उसकी क्षेत्रीय अखंडता को प्रभावित करने वाला कोई भी फैसला लेकर ‘आग से नहीं खेलना’ चाहिए। COCOMI संगठनन ने तर्क दिया कि 1949 में भारतीय संघ में विलय के बाद से मणिपुर ने अपने ऐतिहासिक इलाके के कुछ हिस्से पहले ही खो दिए हैं। चेतावनी दी कि राज्य की भौगोलिक सीमाओं में और कोई भी कटौती मंज़ूर नहीं होगी, जैसा कि ‘द इम्फाल टाइम्स’ ने रिपोर्ट किया। मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता को ऐसा मुद्दा बताते हुए जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता, संगठन ने कहा कि राज्य की मौजूदा सीमाएँ पिछली पीढ़ियों से विरासत में मिली हैं और समय-समय पर उनकी रक्षा की गई है।इतिहास भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा इतिहास बता दें कि भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है और फिर म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र और चिन राज्य में जाती है। सीमा का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी, जंगली और खुला है, जो उन जातीय समुदायों के इलाकों से होकर गुजरता है जो दोनों तरफ रहते आए हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार, सीमा के लगभग 1,472 किलोमीटर हिस्से को बॉर्डर पिलर के जरिए तय किया गया है, जबकि लगभग 171 किलोमीटर हिस्सा अभी भी अनसुलझा है। यह मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी में है। अमेरिकी मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ ने किया है दावा बता दें कि यह दावा अमेरिका की मैगज़ीन ‘द डिप्लोमैट’ (The Diplomat) ने की है। अमेरिकी मैगज़ीन की रिपोर्ट के मुताबिक अदला-बदली के लिए प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में है, जो म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र में काबाव घाटी से सटा हुआ है। 17 जुलाई की रिपोर्ट में मैगजीन ने कहा कि भारत सरकार म्यांमार के साथ मणिपुर की सीमा पर बॉर्डर पिलर 65 और 68 के बीच सीमा तय करने के लिए लगभग 1.4 वर्ग मील जमीन की अदला-बदली के ‘प्रस्ताव’ की जांच कर रही है. पिलर 65 और 68 के बीच की दूरी लगभग 2.8 किलोमीटर है। सीमा तय करने का काम तीन महीने के भीतर, यानी अगस्त के आसपास पूरा होने की उम्मीद थी। मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन की अदला-बदली के संभावित प्रस्ताव के पीछे मुख्य मकसद भारत-म्यांमार सीमा के अनसुलझे हिस्से को तय करने की प्रक्रिया में तेजी लाना है। जिससे नई दिल्ली सीमा पर बाड़ लगा सके और अवैध आप्रवासन, उग्रवादियों की आवाजाही और सीमा पार होने वाले अन्य अपराधों को रोका जा सके। @followers #Myanmar #MyanmarNews #InternationalNews #america #IndiaMyanmarBorder #indiamyanmarfriendship #छत्तीसगढ़ #chhattisgarh #ChhattisgarhNews #लोरमी_को_सौगात #लोरमी_के_गौरव #लोरमीमुंगेलीन्यूज़ #lormimungelinews #छत्तीसगढ़_के_माटी #छत्तीसगढ़_महतारी #छत्तीसगढ़ #LocalNews #BreakingNews #BigBreakingNews #todaynews #IndiaNews #NationalNews #ViralNewsUpdate #BigBreaking #LatestUpdates #LatestNews न्यूज़ के लिए कृपया फॉलो करें धन्यवाद👇👇👇 https://www.facebook.com/LORMIMUNGELINEWS?sk=followers

Lormi, Mungeli | Aug 6, 2026

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#PM #मोदी का वीडियो हटाने पर जुकरबर्ग ने #माफी #मांगी  #भारतसरकार ने 3 दिन का अल्टीमेटम दिया था; जंतर-मंतर प्रदर्शन के समय पोस्ट हुआ था वीडियो

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आज ही संसदीय समिति ने 3 दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने को कहा था। साथ ही चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो मेटा को भारत में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और कुछ छूट वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।

इसी मामले में आईटी मंत्रालय और मेटा के अधिकारियों के बीच दो दिन की बैठक चल रही है। सरकार ने मेटा की ग्लोबल टीम को दिल्ली बुलाया है। 5 अगस्त को बैठक का पहला दिन था।

पीएम मोदी ने 23 जुलाई को यह वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने पेपर लीक को बड़ी समस्या बताया था। उन्होंने ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की भी बात कही थी।

यह वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक से हटा दिया गया था। बाद में मेटा ने इसे फिर से फेसबुक पर डाल दिया।

 सवालों के जवाब से जानिए विवाद से जुड़ी जरूरी बातें

सवाल 1. संसदीय समिति ने मार्क जुकरबर्ग और मेटा को लेकर क्या निर्देश दिया है?

जवाब: समिति ने मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग से तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने को कहा है। समिति ने कहा है कि अगर तय समय में माफी नहीं मांगी गई, तो मेटा को आईटी कानून के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और छूट वापस ली जा सकती है। इसके बाद कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

सवाल 2. IT मंत्रालय ने मेटा के अधिकारियों को क्यों तलब किया है?

जवाब: IT मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने बताया कि बैठक में मंत्रालय यह जांचेगा कि मेटा भारतीय कानूनों का कितना पालन कर रही हैे। वीआईपी अकाउंट की सुरक्षा के लिए बनाए गए उसके 'सेफगार्ड्स' क्यों फेल हुए। इसके अलावा वॉट्सऐप की यूजरनेम पॉलिसी और इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) की मौजूदगी को लेकर भी सवाल पूछे जाएंगे।

सवाल 3. इस विवाद की मुख्य वजह क्या है?

जवाब: 23 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम और फेसबुक पर युवाओं के नाम एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने पेपर लीक के मामलों में सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। कुछ समय बाद मेटा ने यह पोस्ट हटा दी।

बाद में कंपनी ने पोस्ट फिर से बहाल कर दी और कहा कि यह तकनीकी गड़बड़ी की वजह से हुआ था। मेटा ने इस पर माफी भी मांगी, लेकिन आईटी मंत्रालय ने कंपनी की सफाई को संतोषजनक नहीं माना।

सवाल 4. सरकार इस मामले में क्या कह रही है?

जवाब: आईटी सचिव एस. कृष्णन ने 4 अगस्त को कहा कि मेटा दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक है, इसलिए उसके सिस्टम इतने मजबूत होने चाहिए कि ऐसी गलती दोबारा न हो। उन्होंने कहा कि सरकार यह जानना चाहती है कि मेटा भारतीय कानूनों को कितना समझती है और उनका पालन कराने के लिए उसके पास क्या व्यवस्था है।

सवाल 5. पीएम मोदी के पोस्ट हटाने के मामले पर मेटा का पक्ष क्या है?

जवाब: मेटा ने कहा कि पोस्ट गलती से हट गई थी। यह तकनीकी समस्या थी, किसी नीति या जानबूझकर की गई कार्रवाई का हिस्सा नहीं था। पोस्ट बाद में बहाल कर दी गई।

सवाल 6. इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है?

जवाब: हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाकर बनाए गए मॉर्फ्ड और AI-जनरेटेड पोस्ट के मामले में मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कुछ फेसबुक व इंस्टाग्राम अकाउंट्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

सवाल 7. इस मीटिंग में और क्या मुद्दे हैं?

जवाब: 5 और 6 अगस्त की मीटिंग में केवल पीएम मोदी की पोस्ट का मुद्दा ही नहीं है। मंत्रालय मेटा से वॉट्सऐप की नई यूजरनेम पॉलिसी और इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े यौन शोषण वाले कंटेंट की मौजूदगी पर जारी किए गए पुराने नोटिसों का भी ब्योरा और जवाब मांगेगा।

सवाल 8. इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब: भारत मेटा का सबसे बड़ा बाजार है। देश में वाट्सएप के 60 करोड़ से ज्यादा, इंस्टाग्राम के करीब 48 करोड़ और फेसबुक के करीब 40 करोड़ यूजर हैं। इसलिए मेटा के किसी भी फैसले का असर सीधे करोड़ों भारतीयों पर पड़ता है।

सोशल मीडिया कंपनियों के कंटेंट हटाने के नियमों पर ज्यादा निगरानी हो सकती है।
गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट या अकाउंट के मामलों में कंपनियों पर जवाबदेही बढ़ सकती है।
भारत में काम कर रही बड़ी टेक कंपनियों को कंटेंट मॉडरेशन के नियम और सख्ती से लागू करने पड़ सकते हैं।

23 जुलाई की रात 12 बजे X हैंडल पर पोस्ट किए गए 2.56 मिनट के वीडियो मैसेज में मोदी ने कहा-

पेपर लीक कोई मामूली विषय नहीं है। लाखों छात्रों, उनके माता-पिता के लिए पीड़ादायक है। इसलिए पेपर लीक से अब तक, पिछले ढाई महीनों में कई कदम उठाए हैं। गुनहगारों को पकड़ा है, वे जेल में हैं। हमारी जिम्मेदारी थी कि छात्रों का साल बर्बाद न हो, इसलिए कम समय में 22 लाख छात्रों का एग्जाम कराया। 19 जुलाई को रिजल्ट भी आ गया।

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फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया…

उन्होंने यह भी कहा- हम इतने से संतोष करने वाले नहीं हैं। इसलिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया है।दरअसल, यह पूरा मामला 3 मई को हुए NEET UG पेपर लीक से जुड़ा है।

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#BigBreakingNews #PM #मोदी का वीडियो हटाने पर जुकरबर्ग ने #माफी #मांगी #भारतसरकार ने 3 दिन का अल्टीमेटम दिया था; जंतर-मंतर प्रदर्शन के समय पोस्ट हुआ था वीडियो #प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक #वीडियो #फेसबुक से हटाने और डीपफेक कंटेंट के मामले में मेटा प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने माफी मांगी है। यह जानकारी न्यूज एजेंसी PTI ने सूत्रों के हवाले से दी है। आज ही संसदीय समिति ने 3 दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने को कहा था। साथ ही चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो मेटा को भारत में मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और कुछ छूट वापस लेने पर विचार किया जा सकता है। इसी मामले में आईटी मंत्रालय और मेटा के अधिकारियों के बीच दो दिन की बैठक चल रही है। सरकार ने मेटा की ग्लोबल टीम को दिल्ली बुलाया है। 5 अगस्त को बैठक का पहला दिन था। पीएम मोदी ने 23 जुलाई को यह वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने पेपर लीक को बड़ी समस्या बताया था। उन्होंने ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की भी बात कही थी। यह वीडियो कुछ समय के लिए फेसबुक से हटा दिया गया था। बाद में मेटा ने इसे फिर से फेसबुक पर डाल दिया। सवालों के जवाब से जानिए विवाद से जुड़ी जरूरी बातें सवाल 1. संसदीय समिति ने मार्क जुकरबर्ग और मेटा को लेकर क्या निर्देश दिया है? जवाब: समिति ने मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग से तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने को कहा है। समिति ने कहा है कि अगर तय समय में माफी नहीं मांगी गई, तो मेटा को आईटी कानून के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और छूट वापस ली जा सकती है। इसके बाद कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। सवाल 2. IT मंत्रालय ने मेटा के अधिकारियों को क्यों तलब किया है? जवाब: IT मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने बताया कि बैठक में मंत्रालय यह जांचेगा कि मेटा भारतीय कानूनों का कितना पालन कर रही हैे। वीआईपी अकाउंट की सुरक्षा के लिए बनाए गए उसके 'सेफगार्ड्स' क्यों फेल हुए। इसके अलावा वॉट्सऐप की यूजरनेम पॉलिसी और इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) की मौजूदगी को लेकर भी सवाल पूछे जाएंगे। सवाल 3. इस विवाद की मुख्य वजह क्या है? जवाब: 23 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम और फेसबुक पर युवाओं के नाम एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने पेपर लीक के मामलों में सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। कुछ समय बाद मेटा ने यह पोस्ट हटा दी। बाद में कंपनी ने पोस्ट फिर से बहाल कर दी और कहा कि यह तकनीकी गड़बड़ी की वजह से हुआ था। मेटा ने इस पर माफी भी मांगी, लेकिन आईटी मंत्रालय ने कंपनी की सफाई को संतोषजनक नहीं माना। सवाल 4. सरकार इस मामले में क्या कह रही है? जवाब: आईटी सचिव एस. कृष्णन ने 4 अगस्त को कहा कि मेटा दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक है, इसलिए उसके सिस्टम इतने मजबूत होने चाहिए कि ऐसी गलती दोबारा न हो। उन्होंने कहा कि सरकार यह जानना चाहती है कि मेटा भारतीय कानूनों को कितना समझती है और उनका पालन कराने के लिए उसके पास क्या व्यवस्था है। सवाल 5. पीएम मोदी के पोस्ट हटाने के मामले पर मेटा का पक्ष क्या है? जवाब: मेटा ने कहा कि पोस्ट गलती से हट गई थी। यह तकनीकी समस्या थी, किसी नीति या जानबूझकर की गई कार्रवाई का हिस्सा नहीं था। पोस्ट बाद में बहाल कर दी गई। सवाल 6. इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है? जवाब: हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाकर बनाए गए मॉर्फ्ड और AI-जनरेटेड पोस्ट के मामले में मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कुछ फेसबुक व इंस्टाग्राम अकाउंट्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। सवाल 7. इस मीटिंग में और क्या मुद्दे हैं? जवाब: 5 और 6 अगस्त की मीटिंग में केवल पीएम मोदी की पोस्ट का मुद्दा ही नहीं है। मंत्रालय मेटा से वॉट्सऐप की नई यूजरनेम पॉलिसी और इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़े यौन शोषण वाले कंटेंट की मौजूदगी पर जारी किए गए पुराने नोटिसों का भी ब्योरा और जवाब मांगेगा। सवाल 8. इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: भारत मेटा का सबसे बड़ा बाजार है। देश में वाट्सएप के 60 करोड़ से ज्यादा, इंस्टाग्राम के करीब 48 करोड़ और फेसबुक के करीब 40 करोड़ यूजर हैं। इसलिए मेटा के किसी भी फैसले का असर सीधे करोड़ों भारतीयों पर पड़ता है। सोशल मीडिया कंपनियों के कंटेंट हटाने के नियमों पर ज्यादा निगरानी हो सकती है। गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट या अकाउंट के मामलों में कंपनियों पर जवाबदेही बढ़ सकती है। भारत में काम कर रही बड़ी टेक कंपनियों को कंटेंट मॉडरेशन के नियम और सख्ती से लागू करने पड़ सकते हैं। 23 जुलाई की रात 12 बजे X हैंडल पर पोस्ट किए गए 2.56 मिनट के वीडियो मैसेज में मोदी ने कहा- पेपर लीक कोई मामूली विषय नहीं है। लाखों छात्रों, उनके माता-पिता के लिए पीड़ादायक है। इसलिए पेपर लीक से अब तक, पिछले ढाई महीनों में कई कदम उठाए हैं। गुनहगारों को पकड़ा है, वे जेल में हैं। हमारी जिम्मेदारी थी कि छात्रों का साल बर्बाद न हो, इसलिए कम समय में 22 लाख छात्रों का एग्जाम कराया। 19 जुलाई को रिजल्ट भी आ गया। QuoteImage फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया… उन्होंने यह भी कहा- हम इतने से संतोष करने वाले नहीं हैं। इसलिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का निर्देश दिया है।दरअसल, यह पूरा मामला 3 मई को हुए NEET UG पेपर लीक से जुड़ा है। @followers #markjukerberg #markjukarburg #facebookreels #facebookviral #facebookpost #facebookreelsviral #FacebookPage #facebookvideo #छत्तीसगढ़ #chhattisgarh #ChhattisgarhNews #लोरमी_को_सौगात #लोरमी_के_गौरव #लोरमीमुंगेलीन्यूज़ #lormimungelinews #छत्तीसगढ़_के_माटी #छत्तीसगढ़_महतारी #छत्तीसगढ़ #LocalNews #BreakingNews #BigBreakingNews #todaynews #IndiaNews #NationalNews #ViralNewsUpdate #BigBreaking #LatestUpdates #LatestNews न्यूज़ के लिए कृपया फॉलो करें धन्यवाद👇👇👇 https://www.facebook.com/LORMIMUNGELINEWS?sk=followers

Lormi, Mungeli | Aug 5, 2026

#बारकाउंसिल पुरुषों का क्लब बनकर रह गई है…, Bar Council में महिला वकीलों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

Supreme Court On Bar Council Women Reservation: देश के बार काउंसिलों में वर्षों से चले आ रहे पुरुष एकाधिकार को तोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। बार काउंसिल में महिला वकीलों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश सुनाया है। देश के शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल को आदमियों का क्लब बताते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को हर राज्य में 2 महिला सदस्यों को नामित करने का निर्देश दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया है कि वे अपने राज्य की बार काउंसिल में दो महिला सदस्यों की नियुक्ति करें। इस दौरान शीर्ष न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार काउंसिलें अब आदमियों का क्लब बन चुकी हैं और किसी एक समूह का यह दबदबा तुरंत खत्म होना चाहिए। यह पूरा मामला राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला काउंसिल ऑफ इंडिया और विभिन्न राज्य बार काउंसिलों के चुनाव व प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान दिया। साथ ही वकीलों के संगठनों में असंतुलित प्रतिनिधित्व पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट के मुताबिक इस फैसले का मकसद केवल कागजों पर संख्या बढ़ाना नहीं है बल्कि बार काउंसिलों के प्रशासनिक फैसलों में महिलाओं की हकीकी भागीदारी पुख्ता करना है।

देश के शीर्ष न्यायालय ने कहा कि बार काउंसिलों का ढांचा समावेशी होना चाहिए ताकि महिला वकीलों को नीति-निर्माण में बराबर का स्थान मिल सके। निर्देश के अनुसार प्रत्येक राज्य के हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अपने विवेक से दो महिला सदस्यों का नामांकन करेंगे। इनमें पहली सदस्य हाई कोर्ट की एक पूर्व महिला न्यायाधीश होंगी और दूसरी सदस्य बार में अच्छी प्रतिष्ठा रखने वाली एक सीनियर महिला वकील होंगी। अदालत ने यह भी शर्त रखी है कि इन दोनों सदस्यों का बार काउंसिल की चुनावी राजनीति या गुटबाजी से कोई संबंध नहीं होगा। इस व्यवस्था से दोनों महिला सदस्य किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर पूरी निष्पक्षता के साथ वकीलों के हित और संस्थागत सुधारों पर काम कर सकेंगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी तय कर दिया कि चुनाव में हारने वाली महिला उम्मीदवार को भी योग्यता के आधार पर सह-नामित किया जा सकेगा।

राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण

यह संपूर्ण मामला राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने से जुड़ा हुआ है। तय फार्मूले के अनुसार बार काउंसिल में 20 प्रतिशत सीटें सीधे चुनाव के माध्यम से भरी जानी हैं, जबकि शेष 10 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं को सह-नामित किया जाएगा। सुनवाई के दौरान आरक्षित सीटों पर ट्रांसफरेबल वोट (हस्तांतरणीय वोट) की गणना के तकनीकी विषय पर भी कानूनी बहस हुई। इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय पर्यवेक्षण समिति को सौंप दिया गया है। अदालत ने समिति को निर्देश दिया है कि वह देश भर के वकील संगठनों से सुझाव आमंत्रित करे, उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दे और मतदान पद्धति की नई सिफारिश जल्द कोर्ट के सामने पेश करें।

अदालतों में महिलाओं की संख्या 40 प्रतिशत के करीब पहुंची

बता दें कि भारतीय अदालतों में पंजीकरण कराने वाले नए वकीलों में महिलाओं की संख्या 40 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है। जबकि राज्य बार काउंसिलों के कार्यकारी पदों पर महिलाओं की मौजूदगी अब भी 5 प्रतिशत से कम है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश बार काउंसिलों के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है, जो पुरुष एकाधिकार को समाप्त कर संस्थागत संतुलन बनाएगा।

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#बारकाउंसिल पुरुषों का क्लब बनकर रह गई है…, Bar Council में महिला वकीलों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश Supreme Court On Bar Council Women Reservation: देश के बार काउंसिलों में वर्षों से चले आ रहे पुरुष एकाधिकार को तोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। बार काउंसिल में महिला वकीलों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश सुनाया है। देश के शीर्ष न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल को आदमियों का क्लब बताते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को हर राज्य में 2 महिला सदस्यों को नामित करने का निर्देश दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया है कि वे अपने राज्य की बार काउंसिल में दो महिला सदस्यों की नियुक्ति करें। इस दौरान शीर्ष न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कई बार काउंसिलें अब आदमियों का क्लब बन चुकी हैं और किसी एक समूह का यह दबदबा तुरंत खत्म होना चाहिए। यह पूरा मामला राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला काउंसिल ऑफ इंडिया और विभिन्न राज्य बार काउंसिलों के चुनाव व प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों पर सुनवाई के दौरान दिया। साथ ही वकीलों के संगठनों में असंतुलित प्रतिनिधित्व पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट के मुताबिक इस फैसले का मकसद केवल कागजों पर संख्या बढ़ाना नहीं है बल्कि बार काउंसिलों के प्रशासनिक फैसलों में महिलाओं की हकीकी भागीदारी पुख्ता करना है। देश के शीर्ष न्यायालय ने कहा कि बार काउंसिलों का ढांचा समावेशी होना चाहिए ताकि महिला वकीलों को नीति-निर्माण में बराबर का स्थान मिल सके। निर्देश के अनुसार प्रत्येक राज्य के हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अपने विवेक से दो महिला सदस्यों का नामांकन करेंगे। इनमें पहली सदस्य हाई कोर्ट की एक पूर्व महिला न्यायाधीश होंगी और दूसरी सदस्य बार में अच्छी प्रतिष्ठा रखने वाली एक सीनियर महिला वकील होंगी। अदालत ने यह भी शर्त रखी है कि इन दोनों सदस्यों का बार काउंसिल की चुनावी राजनीति या गुटबाजी से कोई संबंध नहीं होगा। इस व्यवस्था से दोनों महिला सदस्य किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर पूरी निष्पक्षता के साथ वकीलों के हित और संस्थागत सुधारों पर काम कर सकेंगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी तय कर दिया कि चुनाव में हारने वाली महिला उम्मीदवार को भी योग्यता के आधार पर सह-नामित किया जा सकेगा। राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण यह संपूर्ण मामला राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने से जुड़ा हुआ है। तय फार्मूले के अनुसार बार काउंसिल में 20 प्रतिशत सीटें सीधे चुनाव के माध्यम से भरी जानी हैं, जबकि शेष 10 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं को सह-नामित किया जाएगा। सुनवाई के दौरान आरक्षित सीटों पर ट्रांसफरेबल वोट (हस्तांतरणीय वोट) की गणना के तकनीकी विषय पर भी कानूनी बहस हुई। इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय पर्यवेक्षण समिति को सौंप दिया गया है। अदालत ने समिति को निर्देश दिया है कि वह देश भर के वकील संगठनों से सुझाव आमंत्रित करे, उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दे और मतदान पद्धति की नई सिफारिश जल्द कोर्ट के सामने पेश करें। अदालतों में महिलाओं की संख्या 40 प्रतिशत के करीब पहुंची बता दें कि भारतीय अदालतों में पंजीकरण कराने वाले नए वकीलों में महिलाओं की संख्या 40 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है। जबकि राज्य बार काउंसिलों के कार्यकारी पदों पर महिलाओं की मौजूदगी अब भी 5 प्रतिशत से कम है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश बार काउंसिलों के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है, जो पुरुष एकाधिकार को समाप्त कर संस्थागत संतुलन बनाएगा। @followers #delhi #DelhiNews #BarCouncil #SupremeCourt #Adalat #advocate #advocateforyourself #advocatenews #mahilamorcha #female #femaleequality #women #womenadvocate #छत्तीसगढ़ #chhattisgarh #ChhattisgarhNews #लोरमी_को_सौगात #लोरमी_के_गौरव #लोरमीमुंगेलीन्यूज़ #lormimungelinews #छत्तीसगढ़_के_माटी #छत्तीसगढ़_महतारी #छत्तीसगढ़ #LocalNews #BreakingNews #BigBreakingNews #todaynews #IndiaNews #NationalNews #ViralNewsUpdate #BigBreaking #LatestUpdates #LatestNews न्यूज़ के लिए कृपया फॉलो करें धन्यवाद👇👇👇 https://www.facebook.com/LORMIMUNGELINEWS?sk=followers

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