#बलिया खनवर से अंतिम यात्रा:
“कंधे पर अर्थी, आंखों में आंसू और सड़कों पर जनसैलाब… खनवर ने बता दिया कि उमाशंकर सिंह का जनता से रिश्ता कितना गहरा था।”
“अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब बना गवाह: उमाशंकर सिंह सिर्फ विधायक नहीं, जनता के दिलों में बसने वाले जननेता थे।”
‘जनसैलाब ने बता दिया उमाशंकर सिंह की असली ताकत क्या थी’: वरिष्ठ #पत्रकार #ओंकार_सिंह
बलिया: रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब केवल एक जनप्रतिनिधि को अंतिम विदाई देने के लिए जुटी भीड़ नहीं थी, बल्कि यह उस रिश्ते की तस्वीर थी, जो एक नेता ने वर्षों में जनता के बीच रहकर बनाया था। नगरा के खनवर गांव से निकली अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ ने यह सवाल भी छोड़ दिया कि आखिर महज 55 वर्ष की उम्र में उमाशंकर सिंह ने ऐसा क्या हासिल कर लिया था कि अंतिम विदाई के लिए हर वर्ग के लोग अपने आप घरों से निकल पड़े?
बलिया के वरिष्ठ पत्रकार ओंकार सिंह के अनुसार, इस भीड़ को केवल संख्या के नजरिए से देखना उमाशंकर सिंह की राजनीति को छोटा करके देखना होगा। यह जनसैलाब उनके जमीनी जुड़ाव, सहज उपलब्धता और आम आदमी के साथ बने आत्मीय रिश्ते की गवाही दे रहा था। उन्होंने कहा कि उमाशंकर सिंह की राजनीति केवल चुनाव और विधानसभा तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी पहचान गांव-गली में लोगों के सुख-दुख में खड़े रहने वाले नेता की थी।
ओंकार सिंह कहते हैं कि राजनीति में पद मिलना आसान हो सकता है, लेकिन जनता के दिल में जगह बनाना आसान नहीं होता। उमाशंकर सिंह ने कम उम्र में जिस मुकाम को हासिल किया, उसके पीछे उनकी जमीन से जुड़ी कार्यशैली और लोगों के बीच बनी स्वीकार्यता बड़ी वजह थी। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उनके जाने का दर्द केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा।
उन्होंने कहा कि बलिया की धरती ने देश को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जैसा कद्दावर नेता दिया, जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके बाद बलिया में आम जनता के बीच जिस नेता को लेकर इतना व्यापक अपनापन और जनस्वीकार्यता दिखाई दी, उनमें उमाशंकर सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। इसे अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उनकी अंतिम यात्रा में उमड़े जनसैलाब के आईने में देखी गई जमीनी सच्चाई कहा जा सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि उमाशंकर सिंह की राजनीतिक यात्रा का मूल्यांकन आने वाले समय में केवल उनके पद, चुनावी जीत या राजनीतिक दल के आधार पर नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि उनके जाने के बाद कितने लोग उन्हें अपना मानकर रोए और कितने लोग उनकी कमी महसूस कर रहे हैं। खनवर से निकली अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ ने इस कसौटी पर उनका कद खुद बयां कर दिया।
उन्होंने कहा कि किसी नेता की सबसे बड़ी विरासत उसकी कुर्सी नहीं, बल्कि जनता की स्मृतियों में बचा उसका चेहरा और लोगों के दिलों में कायम उसका स्थान होता है। उमाशंकर सिंह की अंतिम यात्रा ने शायद इसी विरासत की सबसे मार्मिक तस्वीर सामने रखी—एक ऐसा नेता, जो राजनीति से निकलकर लोगों के बीच पहुंचा और अंततः लोगों के बीच ही अपनी अमिट छाप छोड़ गया।
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