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#चैत्र_नवरात्री के महापर्व एवं #हिंदू_नववर्ष पर आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

4.9k views | Hardoi, Hardoi | Mar 21, 2023

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फंदे से लटकता मिला विवाहिता का शव,खेड़ा बीबीजई में मचा हड़कंप;जांच में जुटी पुलिस

#हरदोई:शाहाबाद कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला खेड़ा बीबीजई में शुक्रवार उस समय सनसनी फैल गई, जब एक विवाहिता का शव घर के अंदर फांसी के फंदे से लटका मिला। घटना की खबर कुछ ही देर में पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई। आसपास के लोगों की भीड़ मौके पर जुट गई और परिजनों में चीख-पुकार मच गई। पुलिस के अनुसार,मृतका की पहचान अनीश कुरैशी की पुत्री के रूप में हुई है। उसका विवाह लगभग 12 वर्ष पूर्व पड़ोस के ही एक युवक से हुआ था। घटना की सूचना मिलते ही कोतवाल अरविंद कुमार राय और सरदारगंज चौकी प्रभारी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और मौजूद लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई। इसके बाद शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरते हुए पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।घटनास्थल पर फॉरेंसिक टीम भी मौके पर पहुंची
#रिपोर्ट:द टेलीकास्ट न्यूज/सरवन कुमार

फंदे से लटकता मिला विवाहिता का शव,खेड़ा बीबीजई में मचा हड़कंप;जांच में जुटी पुलिस #हरदोई:शाहाबाद कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला खेड़ा बीबीजई में शुक्रवार उस समय सनसनी फैल गई, जब एक विवाहिता का शव घर के अंदर फांसी के फंदे से लटका मिला। घटना की खबर कुछ ही देर में पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई। आसपास के लोगों की भीड़ मौके पर जुट गई और परिजनों में चीख-पुकार मच गई। पुलिस के अनुसार,मृतका की पहचान अनीश कुरैशी की पुत्री के रूप में हुई है। उसका विवाह लगभग 12 वर्ष पूर्व पड़ोस के ही एक युवक से हुआ था। घटना की सूचना मिलते ही कोतवाल अरविंद कुमार राय और सरदारगंज चौकी प्रभारी भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और मौजूद लोगों से घटना के संबंध में जानकारी जुटाई। इसके बाद शव को कब्जे में लेकर पंचनामा भरते हुए पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।घटनास्थल पर फॉरेंसिक टीम भी मौके पर पहुंची #रिपोर्ट:द टेलीकास्ट न्यूज/सरवन कुमार

Hardoi, Hardoi | Jul 18, 2026

चीन में बंदरों की डिमांड हाई, एक की कीमत 30 लाख. बीजिंग में अचानक क्यों महंगा हुए मंकी?

अगर कोई कहे कि चीन में आजकल बंदर करोड़ों के बिजनेस का हिस्सा बन गए हैं तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन हकीकत यही है. चीन में लैब में इस्तेमाल होने वाले मकाक बंदरों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी है कि उनकी कीमत कोविड काल के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है.

कुछ मामलों में एक स्वस्थ और रिसर्च के लिए तैयार बंदर की कीमत 2 लाख युआन (करीब 24-30 लाख रुपये) तक बताई जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह है चीन की तेजी से बढ़ती दवा और बायोटेक इंडस्ट्री. दरअसल, चीन अब सिर्फ दुनिया की फैक्ट्री नहीं रह गया है. वह नई दवाएं और बायोलॉजिकल मेडिसिन विकसित करने की ग्लोबल दौड़ में भी अमेरिका को कड़ी चुनौती दे रहा है. इसी वजह से रिसर्च लैब में इस्तेमाल होने वाले बंदरों की मांग अचानक बढ़ गई है. आइए आपको इन बंदरों के बारे में डिटेल में बताते हैं.

सबसे पहले आपको यह जानना चाहिए कि इन बंदरों में ऐसा क्या है जो इनकी मार्केट में इतनी ज्यादा डिमांड है. किसी भी नई दवा को बाजार में लाने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है. पहले लैब में परीक्षण होते हैं, फिर जानवरों पर प्रीक्लीनिकल ट्रायल और उसके बाद इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू होते हैं. रिसर्च में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले रीसस और सिनोमोल्गस मकाक बंदरों का डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है. इसलिए कैंसर, मोटापा, मधुमेह, न्यूरोलॉजिकल और इम्यून सिस्टम से जुड़ी नई दवाओं की सुरक्षा और प्रभाव का आकलन करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि हर नई दवा के लिए बंदर जरूरी नहीं होते. कई दवाओं का परीक्षण केवल चूहों या दूसरे पशु मॉडल पर भी किया जाता है. लेकिन जटिल बायोलॉजिकल दवाओं और एंटीबॉडी आधारित इलाज में प्राइमेट्स की जरूरत अभी भी बनी हुई है.

चीन में दवा अनुसंधान क्यों बढ़ गया?

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है. इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है. 2025 में चीन में 5,215 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल दर्ज किए गए. इनमें करीब 57.5 प्रतिशत ट्रायल नई दवाओं से जुड़े थे. यह आंकड़ा 2020 के मुकाबले लगभग दोगुना है. इससे पता चलता है कि चीन में नई दवाओं पर रिसर्च कितनी तेजी से बढ़ रही है. इतना ही नहीं, वैश्विक दवा कंपनियां भी चीनी बायोटेक कंपनियों के साथ लाइसेंसिंग और रिसर्च डील कर रही हैं. चीन अब कैंसर, मोटापा और ऑटोइम्यून बीमारियों की दवा विकसित करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो चुका है.

बंदरों की कीमत आसमान पर क्यों पहुंच गई?

दवा अनुसंधान की रफ्तार जितनी तेज हुई, बंदरों की सप्लाई उतनी नहीं बढ़ सकी. एक लैब में इस्तेमाल होने योग्य मकाक बंदर तैयार करने में करीब चार साल लग जाते हैं. पहले उसका जन्म, फिर पालन-पोषण, स्वास्थ्य परीक्षण और संक्रमण मुक्त प्रमाणन किया जाता है. इसलिए अचानक मांग बढ़ने पर सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकती. कोविड महामारी के दौरान चीन ने लैब बंदरों के निर्यात पर भी कई प्रतिबंध लगाए थे. इससे घरेलू बाजार में उपलब्धता और कम हो गई. अब जब बायोटेक उद्योग तेजी से बढ़ रहा है तो मांग सप्लाई से कहीं आगे निकल गई है. नतीजा, कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं.

डेटाक्या बताता है5,2152025 में चीन में दर्ज क्लीनिकल ड्रग ट्रायल57.5%इनमें नई दवाओं के ट्रायल2 गुना2020 के मुकाबले ट्रायल की संख्या49,000-52,4002025-27 में हर साल अनुमानित लैब बंदरों की सप्लाईकरीब 10,000हर साल अनुमानित बंदरों की कमी

उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक चीन में 2025 से 2027 के बीच हर साल लगभग 49 हजार से 52 हजार लैब बंदरों की उपलब्धता रहने का अनुमान है. लेकिन बायोटेक रिसर्च की रफ्तार को देखते हुए यह संख्या पर्याप्त नहीं मानी जा रही है. कई रिसर्च संस्थानों को महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है. यही वजह है कि बंदर अब सिर्फ वैज्ञानिक रिसर्च का हिस्सा नहीं, बल्कि एक महंगी जैविक संपत्ति बन चुके हैं.

क्या भविष्य में बंदरों की जरूरत कम होगी?

दुनियाभर में पशु परीक्षण कम करने की दिशा में काम हो रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑर्गन-ऑन-चिप, थ्री-डी सेल कल्चर और कंप्यूटर मॉडल जैसी नई तकनीकें विकसित की जा रही हैं ताकि जानवरों पर निर्भरता घटाई जा सके. इसके बावजूद जानकारों का कहना है कि फिलहाल कई जटिल दवाओं, खासकर बायोलॉजिकल और इम्यूनोलॉजी आधारित दवाओं के लिए प्राइमेट्स का विकल्प पूरी तरह उपलब्ध नहीं है. इसलिए आने वाले कुछ वर्षों तक लैब बंदरों की मांग ऊंची बनी रह सकती है.

कुल मिलाकर, चीन में बंदरों की बढ़ती कीमत किसी वन्यजीव बाजार की कहानी नहीं, बल्कि दुनिया की बदलती दवा अर्थव्यवस्था की कहानी है. जितनी तेजी से चीन नई दवाओं के विकास में आगे बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से रिसर्च के लिए जरूरी जैविक संसाधनों की मांग भी बढ़ रही है. लैब में इस्तेमाल होने वाला एक बंदर आज सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि अरबों डॉलर के फार्मा उद्योग की अहम कड़ी बन चुका है. इसी बंदर के बलबूते पर ही चीन इस सेक्टर में लगातार तेजी से बढ़ भी रहा है.

चीन में बंदरों की डिमांड हाई, एक की कीमत 30 लाख. बीजिंग में अचानक क्यों महंगा हुए मंकी? अगर कोई कहे कि चीन में आजकल बंदर करोड़ों के बिजनेस का हिस्सा बन गए हैं तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन हकीकत यही है. चीन में लैब में इस्तेमाल होने वाले मकाक बंदरों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी है कि उनकी कीमत कोविड काल के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है. कुछ मामलों में एक स्वस्थ और रिसर्च के लिए तैयार बंदर की कीमत 2 लाख युआन (करीब 24-30 लाख रुपये) तक बताई जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह है चीन की तेजी से बढ़ती दवा और बायोटेक इंडस्ट्री. दरअसल, चीन अब सिर्फ दुनिया की फैक्ट्री नहीं रह गया है. वह नई दवाएं और बायोलॉजिकल मेडिसिन विकसित करने की ग्लोबल दौड़ में भी अमेरिका को कड़ी चुनौती दे रहा है. इसी वजह से रिसर्च लैब में इस्तेमाल होने वाले बंदरों की मांग अचानक बढ़ गई है. आइए आपको इन बंदरों के बारे में डिटेल में बताते हैं. सबसे पहले आपको यह जानना चाहिए कि इन बंदरों में ऐसा क्या है जो इनकी मार्केट में इतनी ज्यादा डिमांड है. किसी भी नई दवा को बाजार में लाने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है. पहले लैब में परीक्षण होते हैं, फिर जानवरों पर प्रीक्लीनिकल ट्रायल और उसके बाद इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल शुरू होते हैं. रिसर्च में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले रीसस और सिनोमोल्गस मकाक बंदरों का डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है. इसलिए कैंसर, मोटापा, मधुमेह, न्यूरोलॉजिकल और इम्यून सिस्टम से जुड़ी नई दवाओं की सुरक्षा और प्रभाव का आकलन करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि हर नई दवा के लिए बंदर जरूरी नहीं होते. कई दवाओं का परीक्षण केवल चूहों या दूसरे पशु मॉडल पर भी किया जाता है. लेकिन जटिल बायोलॉजिकल दवाओं और एंटीबॉडी आधारित इलाज में प्राइमेट्स की जरूरत अभी भी बनी हुई है. चीन में दवा अनुसंधान क्यों बढ़ गया? पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है. इसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है. 2025 में चीन में 5,215 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल दर्ज किए गए. इनमें करीब 57.5 प्रतिशत ट्रायल नई दवाओं से जुड़े थे. यह आंकड़ा 2020 के मुकाबले लगभग दोगुना है. इससे पता चलता है कि चीन में नई दवाओं पर रिसर्च कितनी तेजी से बढ़ रही है. इतना ही नहीं, वैश्विक दवा कंपनियां भी चीनी बायोटेक कंपनियों के साथ लाइसेंसिंग और रिसर्च डील कर रही हैं. चीन अब कैंसर, मोटापा और ऑटोइम्यून बीमारियों की दवा विकसित करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो चुका है. बंदरों की कीमत आसमान पर क्यों पहुंच गई? दवा अनुसंधान की रफ्तार जितनी तेज हुई, बंदरों की सप्लाई उतनी नहीं बढ़ सकी. एक लैब में इस्तेमाल होने योग्य मकाक बंदर तैयार करने में करीब चार साल लग जाते हैं. पहले उसका जन्म, फिर पालन-पोषण, स्वास्थ्य परीक्षण और संक्रमण मुक्त प्रमाणन किया जाता है. इसलिए अचानक मांग बढ़ने पर सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकती. कोविड महामारी के दौरान चीन ने लैब बंदरों के निर्यात पर भी कई प्रतिबंध लगाए थे. इससे घरेलू बाजार में उपलब्धता और कम हो गई. अब जब बायोटेक उद्योग तेजी से बढ़ रहा है तो मांग सप्लाई से कहीं आगे निकल गई है. नतीजा, कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं. डेटाक्या बताता है5,2152025 में चीन में दर्ज क्लीनिकल ड्रग ट्रायल57.5%इनमें नई दवाओं के ट्रायल2 गुना2020 के मुकाबले ट्रायल की संख्या49,000-52,4002025-27 में हर साल अनुमानित लैब बंदरों की सप्लाईकरीब 10,000हर साल अनुमानित बंदरों की कमी उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक चीन में 2025 से 2027 के बीच हर साल लगभग 49 हजार से 52 हजार लैब बंदरों की उपलब्धता रहने का अनुमान है. लेकिन बायोटेक रिसर्च की रफ्तार को देखते हुए यह संख्या पर्याप्त नहीं मानी जा रही है. कई रिसर्च संस्थानों को महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है. यही वजह है कि बंदर अब सिर्फ वैज्ञानिक रिसर्च का हिस्सा नहीं, बल्कि एक महंगी जैविक संपत्ति बन चुके हैं. क्या भविष्य में बंदरों की जरूरत कम होगी? दुनियाभर में पशु परीक्षण कम करने की दिशा में काम हो रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑर्गन-ऑन-चिप, थ्री-डी सेल कल्चर और कंप्यूटर मॉडल जैसी नई तकनीकें विकसित की जा रही हैं ताकि जानवरों पर निर्भरता घटाई जा सके. इसके बावजूद जानकारों का कहना है कि फिलहाल कई जटिल दवाओं, खासकर बायोलॉजिकल और इम्यूनोलॉजी आधारित दवाओं के लिए प्राइमेट्स का विकल्प पूरी तरह उपलब्ध नहीं है. इसलिए आने वाले कुछ वर्षों तक लैब बंदरों की मांग ऊंची बनी रह सकती है. कुल मिलाकर, चीन में बंदरों की बढ़ती कीमत किसी वन्यजीव बाजार की कहानी नहीं, बल्कि दुनिया की बदलती दवा अर्थव्यवस्था की कहानी है. जितनी तेजी से चीन नई दवाओं के विकास में आगे बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से रिसर्च के लिए जरूरी जैविक संसाधनों की मांग भी बढ़ रही है. लैब में इस्तेमाल होने वाला एक बंदर आज सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि अरबों डॉलर के फार्मा उद्योग की अहम कड़ी बन चुका है. इसी बंदर के बलबूते पर ही चीन इस सेक्टर में लगातार तेजी से बढ़ भी रहा है.

Hardoi, Hardoi | Jul 18, 2026