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1866 में टिहरी नरेश ने की थी शुरुआत, आज भी 114 से अधिक गांवों के हजारों लोग निभा रहे परंपरा; पर्यावरण संरक्षण और लोक संस्कृति का अनूठा संगम मसूरी। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो आज भी आधुनिकता के बीच अपनी मूल पहचान के साथ जीवित हैं। जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक मौण मेला भी ऐसी ही एक अनूठी परंपरा है, जहां धर्म, प्रकृति, लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। करीब 160 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा यह मेला शनिवार को एक बार फिर अगलाड़ नदी के तट पर पूरे उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। सुबह से ही अगलाड़ नदी के मौणकोट क्षेत्र में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। मसूरी सहित 114 से अधिक गांवों के बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-दमाऊ और रणसिंघा की गूंज के बीच मेले में पहुंचे। जैसे ही टिमरू की छाल से तैयार श्मौणश् (औषधीय पाउडर) नदी में प्रवाहित किया गया, वैसे ही हजारों ग्रामीण पारंपरिक उपकरण लेकर नदी में उतर पड़े। पूरे नदी क्षेत्र में उत्साह, लोकगीत और सांस्कृतिक उल्लास का अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। 1866 में टिहरी नरेश ने डाली थी इस परंपरा की नींव स्थानीय निवासी राजेश नौटियाल और सूरज सिंह रावत ने बताया कि इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत वर्ष 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने की थी। तब से यह परंपरा हर वर्ष बिना किसी व्यवधान के निभाई जा रही है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष कांडी तल्ला, कांडी मल्ला, मेलेंगढ़, सड़ब तल्ला, सड़ब मल्ला, बेल, परोगी सहित कई गांवों के लोगों ने टिमरू की छाल से मौण तैयार करने की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने कहा कि यह केवल मछली पकड़ने का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक भाईचारे, सामूहिक श्रम और लोक संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण से छेड़छाड़ नहीं, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश मौण मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया जाता। टिमरू की छाल को सुखाकर घराट में पीसा जाता है और उससे तैयार प्राकृतिक पाउडर नदी में डाला जाता है। इससे मछलियां कुछ समय के लिए अचेत हो जाती हैं, लेकिन जल प्रदूषण नहीं होता। जो मछलियां पकड़ी नहीं जातीं, वे कुछ देर बाद फिर सामान्य होकर नदी में तैरने लगती हैं। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी पर्यावरण संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमी लोक संस्कृति मेले में जौनपुर और जौनसार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी देखने को मिली। ढोल-दमाऊ की थाप पर युवाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक नृत्य किए, जबकि महिलाओं ने लोकगीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत किया। ग्रामीणों ने कुंडियाड़ा, फटियाड़ा, जाल और हाथों से मछलियां पकड़ीं। शाम होते ही लोग अपने गांव लौटे और सामूहिक भोज के साथ इस ऐतिहासिक पर्व का उत्सव मनाया। नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ रहा मेला ग्रामीणों का कहना है कि मौण मेला केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोक ज्ञान और प्रकृति के प्रति सम्मान का पाठ पढ़ाने का माध्यम है। बदलते दौर में भी हजारों युवाओं की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि जौनपुर की सांस्कृतिक विरासत आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी 160 वर्ष पहले थी।

Mussoorie, Dehradun | Jun 27, 2026

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1866 में टिहरी नरेश ने की थी शुरुआत, आज भी 114 से अधिक गांवों के हजारों लोग निभा रहे परंपरा; पर्यावरण संरक्षण और लोक संस्कृति का अनूठा संगम मसूरी। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं, जो आज भी आधुनिकता के बीच अपनी मूल पहचान के साथ जीवित हैं। जौनपुर क्षेत्र का ऐतिहासिक मौण मेला भी ऐसी ही एक अनूठी परंपरा है, जहां धर्म, प्रकृति, लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। करीब 160 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा यह मेला शनिवार को एक बार फिर अगलाड़ नदी के तट पर पूरे उल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। सुबह से ही अगलाड़ नदी के मौणकोट क्षेत्र में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। मसूरी सहित 114 से अधिक गांवों के बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-दमाऊ और रणसिंघा की गूंज के बीच मेले में पहुंचे। जैसे ही टिमरू की छाल से तैयार श्मौणश् (औषधीय पाउडर) नदी में प्रवाहित किया गया, वैसे ही हजारों ग्रामीण पारंपरिक उपकरण लेकर नदी में उतर पड़े। पूरे नदी क्षेत्र में उत्साह, लोकगीत और सांस्कृतिक उल्लास का अद्भुत दृश्य दिखाई दिया। 1866 में टिहरी नरेश ने डाली थी इस परंपरा की नींव स्थानीय निवासी राजेश नौटियाल और सूरज सिंह रावत ने बताया कि इस ऐतिहासिक मेले की शुरुआत वर्ष 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने की थी। तब से यह परंपरा हर वर्ष बिना किसी व्यवधान के निभाई जा रही है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष कांडी तल्ला, कांडी मल्ला, मेलेंगढ़, सड़ब तल्ला, सड़ब मल्ला, बेल, परोगी सहित कई गांवों के लोगों ने टिमरू की छाल से मौण तैयार करने की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने कहा कि यह केवल मछली पकड़ने का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक भाईचारे, सामूहिक श्रम और लोक संस्कृति का सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण से छेड़छाड़ नहीं, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संदेश मौण मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया जाता। टिमरू की छाल को सुखाकर घराट में पीसा जाता है और उससे तैयार प्राकृतिक पाउडर नदी में डाला जाता है। इससे मछलियां कुछ समय के लिए अचेत हो जाती हैं, लेकिन जल प्रदूषण नहीं होता। जो मछलियां पकड़ी नहीं जातीं, वे कुछ देर बाद फिर सामान्य होकर नदी में तैरने लगती हैं। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी पर्यावरण संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमी लोक संस्कृति मेले में जौनपुर और जौनसार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत भी देखने को मिली। ढोल-दमाऊ की थाप पर युवाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक नृत्य किए, जबकि महिलाओं ने लोकगीतों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत किया। ग्रामीणों ने कुंडियाड़ा, फटियाड़ा, जाल और हाथों से मछलियां पकड़ीं। शाम होते ही लोग अपने गांव लौटे और सामूहिक भोज के साथ इस ऐतिहासिक पर्व का उत्सव मनाया। नई पीढ़ी को विरासत से जोड़ रहा मेला ग्रामीणों का कहना है कि मौण मेला केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, लोक ज्ञान और प्रकृति के प्रति सम्मान का पाठ पढ़ाने का माध्यम है। बदलते दौर में भी हजारों युवाओं की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि जौनपुर की सांस्कृतिक विरासत आज भी उतनी ही मजबूत है, जितनी 160 वर्ष पहले थी। - Mussoorie News