अब चुप रहने का समय नहीं है। आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि जब सेब के बागीचे पतझड़, फंगस और सेंटरोग जैसी समस्याओं की चपेट में खत्म हो गये तब हमने आवाज़ क्यों नहीं उठाई?
यह सरकार और संबंधित संस्थाओं के लिए जांच का विषय है कि आखिर जुलाई के महीने में हर साल यह असामान्य पतझड़ और रोगों का प्रकोप क्यों बढ़ जाता है। इस बार तो ऊंचाई वाले क्षेत्रों के बागीचे भी इसकी चपेट में आ गए हैं।
लगातार दो वर्षों से बागीचों में फंगस, और समय से पहले पत्ते झड़ने की समस्या दिखाई दे रही है, लेकिन इसकी विस्तृत रिपोर्ट और स्थायी समाधान अब तक सामने क्यों नहीं आया?
हजारों करोड़ रुपये की बागवानी अर्थव्यवस्था को चलाने वाले बागवान आज पूछ रहे हैं कि आखिर जवाबदेही किसकी है?
क्या यह सरकार की जिम्मेदारी है?
क्या यह बागवानी विभाग की जिम्मेदारी है?
क्या यह शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है?
या फिर बागवान को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है?
बागवानों को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कारणों की पहचान, वैज्ञानिक जांच और ठोस समाधान चाहिए।