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मंडी के सराज में हुआ द. र्दनाक हा. दसा तीन युवकों की मौ. त, एक गम्भीर रूप से घा||य| ल #Seraj #Mandi #AccidentNews #RoadA...

Mandi, Mandi | Feb 15, 2026

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सराज का काला अध्याय,एक साल बाद भी नहीं भरे ज़ख्म, 30 जून की वह भयावह रात आज भी लोगों की रूह कंपा देती है

गोहर:-संजीव कुमार

30 जून की वह मनहूस रात आज भी सराज की वादियों में एक ऐसे दर्द की कहानी बनकर गूंजती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं। देखते ही देखते प्रकृति ने ऐसा रौद्र रूप धारण किया कि थुनाग, लंबाथाच, जरोल, कूथाह, संगलवाड़ा, बालीचौकी, शिकावरी  बगस्याड सहित दर्जनों गांवों में तबाही का ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसे याद कर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
इस भीषण आपदा में 30 जून की रात को 33 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि कई परिवार आज भी अपने अपनों के लौट आने की आस लगाए बैठे हैं। सबसे अधिक दर्द उन मासूम बच्चों का है, जिनके सिर से हमेशा के लिए माता-पिता का साया उठ गया। कई बच्चे अनाथ होकर रिश्तेदारों और दूसरों के सहारे अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर हो गए। आज भी उनके मासूम चेहरे एक ही सवाल पूछते हैं आखिर उनका कसूर क्या था?
उस भयावह रात को जिसने भी देखा, उसके मन में आज भी यही सवाल उठता है कि "हे भगवान, ऐसा मंजर आखिर क्यों बना? सराज के भोले-भाले लोगों को किस बात की इतनी बड़ी सजा मिली कि उन्हें अपना घर, अपनी जमीन, अपने अपनों और अपनी पूरी जिंदगी उजड़ती हुई देखनी पड़ी?"
इस त्रासदी ने सराज की पहचान ही बदल दी। शायद ही कोई नाला, कोई पहाड़ी या कोई ढलान बची हो, जहां प्रकृति का कहर न टूटा हो। कभी हरियाली से लहलहाने वाले पहाड़ आज भी कई जगह जख्मों के निशान समेटे हुए हैं। हजारों बीघा उपजाऊ जमीन, सेब और अन्य फलों के बागीचे, खेत-खलिहान, मलबे में इस तरह दफन हो गए कि उनका नामोनिशान तक मिट गया। कई परिवारों के लिए तो न घर बचा, न जमीन और न ही जीवनभर की कमाई।
उस रात बारिश की बूंदों से कहीं अधिक डरावनी आवाज पहाड़ों से टूटकर गिरते विशाल पत्थरों और मलबे की थी। पूरी घाटी उनकी गड़गड़ाहट से कांप उठी थी। यह दृश्य आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है और बारिश की हर बूंद उन भयावह यादों को फिर ताजा कर देती है।
हालांकि इस दर्द के बीच इंसानियत की सबसे खूबसूरत तस्वीर भी देखने को मिली। त्रासदी की खबर फैलते ही हिमाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से लाखों मददगार सराज की ओर उमड़ पड़े। सैकड़ों जीपें और वाहन राशन, दवाइयां, कपड़े, कंबल और अन्य जरूरी सामान लेकर प्रभावित गांवों तक पहुंचे। अनेक सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने महीनों तक लंगर सेवा चलाकर पीड़ित परिवारों का सहारा बनकर मानवता की मिसाल पेश की।
एक वर्ष बीत जाने के बावजूद कई घाव अब भी नहीं भर सके हैं। कई संपर्क सड़कें अब तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं। खारसी से जंजैहली तक सड़क मार्ग आज भी कई स्थानों पर बदहाल स्थिति में है। जगह-जगह सड़कें राम भरोसे हैं। गांवों को जोड़ने वाले कई रास्तों का आज भी नामोनिशान नहीं बचा है। ग्रामीण वैकल्पिक मार्गों से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर हैं और हर दिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
सरकार द्वारा पुनर्वास और विकास कार्य किए गए हैं, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कई परिवार आज भी न्याय, पुनर्वास और बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। सराज विधानसभा क्षेत्र से विधायक एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर भी पुनर्निर्माण कार्यों की धीमी गति को लेकर विधानसभा में लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
आज, जब वर्ष 2026 की बरसात शुरू हो चुकी है, तो सराज के लोगों के दिलों में फिर वही डर लौट आया है। बादलों की गर्जना और तेज बारिश उन्हें एक साल पहले की उस भयावह रात में वापस ले जाती है।
30 जून केवल एक तारीख नहीं, बल्कि सराज के इतिहास का वह काला दिन है जिसने सैकड़ों परिवारों के सपने, खुशियां और आशियाने हमेशा के लिए छीन लिए। यह दर्द शायद समय के साथ कम हो जाए, लेकिन उस रात की चीखें और मलबे में दफन हुई यादें कभी नहीं मिटेंगी।

सराज का काला अध्याय,एक साल बाद भी नहीं भरे ज़ख्म, 30 जून की वह भयावह रात आज भी लोगों की रूह कंपा देती है गोहर:-संजीव कुमार 30 जून की वह मनहूस रात आज भी सराज की वादियों में एक ऐसे दर्द की कहानी बनकर गूंजती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं। देखते ही देखते प्रकृति ने ऐसा रौद्र रूप धारण किया कि थुनाग, लंबाथाच, जरोल, कूथाह, संगलवाड़ा, बालीचौकी, शिकावरी बगस्याड सहित दर्जनों गांवों में तबाही का ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसे याद कर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। इस भीषण आपदा में 30 जून की रात को 33 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि कई परिवार आज भी अपने अपनों के लौट आने की आस लगाए बैठे हैं। सबसे अधिक दर्द उन मासूम बच्चों का है, जिनके सिर से हमेशा के लिए माता-पिता का साया उठ गया। कई बच्चे अनाथ होकर रिश्तेदारों और दूसरों के सहारे अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर हो गए। आज भी उनके मासूम चेहरे एक ही सवाल पूछते हैं आखिर उनका कसूर क्या था? उस भयावह रात को जिसने भी देखा, उसके मन में आज भी यही सवाल उठता है कि "हे भगवान, ऐसा मंजर आखिर क्यों बना? सराज के भोले-भाले लोगों को किस बात की इतनी बड़ी सजा मिली कि उन्हें अपना घर, अपनी जमीन, अपने अपनों और अपनी पूरी जिंदगी उजड़ती हुई देखनी पड़ी?" इस त्रासदी ने सराज की पहचान ही बदल दी। शायद ही कोई नाला, कोई पहाड़ी या कोई ढलान बची हो, जहां प्रकृति का कहर न टूटा हो। कभी हरियाली से लहलहाने वाले पहाड़ आज भी कई जगह जख्मों के निशान समेटे हुए हैं। हजारों बीघा उपजाऊ जमीन, सेब और अन्य फलों के बागीचे, खेत-खलिहान, मलबे में इस तरह दफन हो गए कि उनका नामोनिशान तक मिट गया। कई परिवारों के लिए तो न घर बचा, न जमीन और न ही जीवनभर की कमाई। उस रात बारिश की बूंदों से कहीं अधिक डरावनी आवाज पहाड़ों से टूटकर गिरते विशाल पत्थरों और मलबे की थी। पूरी घाटी उनकी गड़गड़ाहट से कांप उठी थी। यह दृश्य आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है और बारिश की हर बूंद उन भयावह यादों को फिर ताजा कर देती है। हालांकि इस दर्द के बीच इंसानियत की सबसे खूबसूरत तस्वीर भी देखने को मिली। त्रासदी की खबर फैलते ही हिमाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से लाखों मददगार सराज की ओर उमड़ पड़े। सैकड़ों जीपें और वाहन राशन, दवाइयां, कपड़े, कंबल और अन्य जरूरी सामान लेकर प्रभावित गांवों तक पहुंचे। अनेक सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने महीनों तक लंगर सेवा चलाकर पीड़ित परिवारों का सहारा बनकर मानवता की मिसाल पेश की। एक वर्ष बीत जाने के बावजूद कई घाव अब भी नहीं भर सके हैं। कई संपर्क सड़कें अब तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं। खारसी से जंजैहली तक सड़क मार्ग आज भी कई स्थानों पर बदहाल स्थिति में है। जगह-जगह सड़कें राम भरोसे हैं। गांवों को जोड़ने वाले कई रास्तों का आज भी नामोनिशान नहीं बचा है। ग्रामीण वैकल्पिक मार्गों से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर हैं और हर दिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। सरकार द्वारा पुनर्वास और विकास कार्य किए गए हैं, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कई परिवार आज भी न्याय, पुनर्वास और बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। सराज विधानसभा क्षेत्र से विधायक एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर भी पुनर्निर्माण कार्यों की धीमी गति को लेकर विधानसभा में लगातार सवाल उठाते रहे हैं। आज, जब वर्ष 2026 की बरसात शुरू हो चुकी है, तो सराज के लोगों के दिलों में फिर वही डर लौट आया है। बादलों की गर्जना और तेज बारिश उन्हें एक साल पहले की उस भयावह रात में वापस ले जाती है। 30 जून केवल एक तारीख नहीं, बल्कि सराज के इतिहास का वह काला दिन है जिसने सैकड़ों परिवारों के सपने, खुशियां और आशियाने हमेशा के लिए छीन लिए। यह दर्द शायद समय के साथ कम हो जाए, लेकिन उस रात की चीखें और मलबे में दफन हुई यादें कभी नहीं मिटेंगी।

Mandi, Mandi | Jun 29, 2026

एकादश रुद्र मंदिर घाट में सजी भव्य व्यास आरती
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं ने किया दीपदान, उमड़ी आस्था

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Mandi, Mandi | Jun 29, 2026

मुख्यमंत्री बड़ा भंगाल के दौरे के दौरान क्या क्या घोषणा की और जोड़ने के लिए अधिकारियों से फोन पर बात करते हुए क्या बोले सुने

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Mandi, Mandi | Jun 29, 2026

बड़ा भंगाल से मुख्यमंत्री अपने अधिकारियों को आदेश देते हुए कि मुख्यमंत्री के पहुंचने का क्षेत्रवासियों को मिले लाभ

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Mandi, Mandi | Jun 29, 2026

छोटी मच्छयाल मेले में के.के. सकलानी ने बतौर मुख्य अतिथि की शिरकत

लडभड़ोल।छोटी मच्छयाल मेले' के सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम में जोगिन्दर नगर विकास मंच के संस्थापक केके सकलानी ने अपनी कार्यकारिणी के साथ मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। इस अवसर पर श्री सकलानी ने भगवान मच्छिंद्र देवता के ऐतिहासिक मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की और प्रदेश व क्षेत्रवासियों की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की। उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मेले केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता के जीवंत प्रतीक हैं, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। उन्होंने मेला आयोजन समिति की निस्वार्थ सेवा और सफल आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। केके सकलानी ने युवाओं से विशेष आह्वान किया कि वे नशे जैसी भयंकर सामाजिक बुराइयों से दूर रहें और राष्ट्र निर्माण व नैतिक मूल्यों को अपनाएं। इसके साथ ही, अपनी धार्मिक व सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने मंदिर समिति को विकास कार्यों और मेला आयोजन के लिए सहयोग राशि भी भेंट की। अंत में, उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में भी जनहित और मंदिर के विकास कार्यों में वे सदैव तत्पर रहेंगे। उन्होंने सभी नागरिकों से एक सशक्त, संस्कारित एवं नशामुक्त समाज बनाने में सहयोग की अपील की।

छोटी मच्छयाल मेले में के.के. सकलानी ने बतौर मुख्य अतिथि की शिरकत लडभड़ोल।छोटी मच्छयाल मेले' के सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम में जोगिन्दर नगर विकास मंच के संस्थापक केके सकलानी ने अपनी कार्यकारिणी के साथ मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। इस अवसर पर श्री सकलानी ने भगवान मच्छिंद्र देवता के ऐतिहासिक मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की और प्रदेश व क्षेत्रवासियों की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की। उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मेले केवल उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्था और सामाजिक समरसता के जीवंत प्रतीक हैं, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। उन्होंने मेला आयोजन समिति की निस्वार्थ सेवा और सफल आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की। केके सकलानी ने युवाओं से विशेष आह्वान किया कि वे नशे जैसी भयंकर सामाजिक बुराइयों से दूर रहें और राष्ट्र निर्माण व नैतिक मूल्यों को अपनाएं। इसके साथ ही, अपनी धार्मिक व सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने मंदिर समिति को विकास कार्यों और मेला आयोजन के लिए सहयोग राशि भी भेंट की। अंत में, उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में भी जनहित और मंदिर के विकास कार्यों में वे सदैव तत्पर रहेंगे। उन्होंने सभी नागरिकों से एक सशक्त, संस्कारित एवं नशामुक्त समाज बनाने में सहयोग की अपील की।

Mandi, Mandi | Jun 29, 2026