सराज का काला अध्याय,एक साल बाद भी नहीं भरे ज़ख्म, 30 जून की वह भयावह रात आज भी लोगों की रूह कंपा देती है
गोहर:-संजीव कुमार
30 जून की वह मनहूस रात आज भी सराज की वादियों में एक ऐसे दर्द की कहानी बनकर गूंजती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं। देखते ही देखते प्रकृति ने ऐसा रौद्र रूप धारण किया कि थुनाग, लंबाथाच, जरोल, कूथाह, संगलवाड़ा, बालीचौकी, शिकावरी बगस्याड सहित दर्जनों गांवों में तबाही का ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसे याद कर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
इस भीषण आपदा में 30 जून की रात को 33 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि कई परिवार आज भी अपने अपनों के लौट आने की आस लगाए बैठे हैं। सबसे अधिक दर्द उन मासूम बच्चों का है, जिनके सिर से हमेशा के लिए माता-पिता का साया उठ गया। कई बच्चे अनाथ होकर रिश्तेदारों और दूसरों के सहारे अपनी जिंदगी बिताने को मजबूर हो गए। आज भी उनके मासूम चेहरे एक ही सवाल पूछते हैं आखिर उनका कसूर क्या था?
उस भयावह रात को जिसने भी देखा, उसके मन में आज भी यही सवाल उठता है कि "हे भगवान, ऐसा मंजर आखिर क्यों बना? सराज के भोले-भाले लोगों को किस बात की इतनी बड़ी सजा मिली कि उन्हें अपना घर, अपनी जमीन, अपने अपनों और अपनी पूरी जिंदगी उजड़ती हुई देखनी पड़ी?"
इस त्रासदी ने सराज की पहचान ही बदल दी। शायद ही कोई नाला, कोई पहाड़ी या कोई ढलान बची हो, जहां प्रकृति का कहर न टूटा हो। कभी हरियाली से लहलहाने वाले पहाड़ आज भी कई जगह जख्मों के निशान समेटे हुए हैं। हजारों बीघा उपजाऊ जमीन, सेब और अन्य फलों के बागीचे, खेत-खलिहान, मलबे में इस तरह दफन हो गए कि उनका नामोनिशान तक मिट गया। कई परिवारों के लिए तो न घर बचा, न जमीन और न ही जीवनभर की कमाई।
उस रात बारिश की बूंदों से कहीं अधिक डरावनी आवाज पहाड़ों से टूटकर गिरते विशाल पत्थरों और मलबे की थी। पूरी घाटी उनकी गड़गड़ाहट से कांप उठी थी। यह दृश्य आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है और बारिश की हर बूंद उन भयावह यादों को फिर ताजा कर देती है।
हालांकि इस दर्द के बीच इंसानियत की सबसे खूबसूरत तस्वीर भी देखने को मिली। त्रासदी की खबर फैलते ही हिमाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों से लाखों मददगार सराज की ओर उमड़ पड़े। सैकड़ों जीपें और वाहन राशन, दवाइयां, कपड़े, कंबल और अन्य जरूरी सामान लेकर प्रभावित गांवों तक पहुंचे। अनेक सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने महीनों तक लंगर सेवा चलाकर पीड़ित परिवारों का सहारा बनकर मानवता की मिसाल पेश की।
एक वर्ष बीत जाने के बावजूद कई घाव अब भी नहीं भर सके हैं। कई संपर्क सड़कें अब तक पूरी तरह बहाल नहीं हो पाई हैं। खारसी से जंजैहली तक सड़क मार्ग आज भी कई स्थानों पर बदहाल स्थिति में है। जगह-जगह सड़कें राम भरोसे हैं। गांवों को जोड़ने वाले कई रास्तों का आज भी नामोनिशान नहीं बचा है। ग्रामीण वैकल्पिक मार्गों से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर हैं और हर दिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
सरकार द्वारा पुनर्वास और विकास कार्य किए गए हैं, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। कई परिवार आज भी न्याय, पुनर्वास और बेहतर सुविधाओं की उम्मीद में सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। सराज विधानसभा क्षेत्र से विधायक एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर भी पुनर्निर्माण कार्यों की धीमी गति को लेकर विधानसभा में लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
आज, जब वर्ष 2026 की बरसात शुरू हो चुकी है, तो सराज के लोगों के दिलों में फिर वही डर लौट आया है। बादलों की गर्जना और तेज बारिश उन्हें एक साल पहले की उस भयावह रात में वापस ले जाती है।
30 जून केवल एक तारीख नहीं, बल्कि सराज के इतिहास का वह काला दिन है जिसने सैकड़ों परिवारों के सपने, खुशियां और आशियाने हमेशा के लिए छीन लिए। यह दर्द शायद समय के साथ कम हो जाए, लेकिन उस रात की चीखें और मलबे में दफन हुई यादें कभी नहीं मिटेंगी।
Mandi, Mandi | Jun 29, 2026