#बालाघाट
गांव की साधारण बहू से बनी महिला सशक्तिकरण की मिसाल: निशा उईके की प्रेरक सफलता की कहानी
कहते हैं कि यदि हौसले बुलंद हों तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह नहीं रोक सकते। यह बात बालाघाट जिले के लांजी विकासखंड की अति संवेदनशील ग्राम पंचायत खुर्सीटोला के ग्राम वालेगांव की रहने वाली निशा नरेंद्र उईके ने सच कर दिखाया है। कभी कृषि मजदूरी कर परिवार चलाने वाली निशा आज अपनी मेहनत, ईमानदारी और लगन के दम पर न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन गई हैं।
लांजी मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर और जिला मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर बसे वालेगांव में आजीविका के सीमित साधन हैं। अधिकांश परिवार खेती और मजदूरी पर निर्भर हैं तथा कई परिवार रोजगार के लिए पलायन भी करते हैं। निशा का परिवार भी इन्हीं परिस्थितियों में जीवनयापन कर रहा था। कम कृषि भूमि और सीमित आय के कारण परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था।
स्व-सहायता समूह से बदली जिंदगी
10 फरवरी 2022 को मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गांव में शक्ति आजीविका स्व-सहायता समूह का गठन हुआ। निशा उईके इस समूह से जुड़ीं और अन्य महिलाओं की तरह प्रति सप्ताह 20 रुपये की बचत शुरू की। स्नातक शिक्षित होने के कारण उन्होंने समूह की बैठकों में सक्रिय भूमिका निभाई और समूह के रिकॉर्ड एवं लेखा-जोखा का जिम्मा संभाल लिया।
उनकी कार्यशैली और जिम्मेदारी देखकर ग्राम संगठन ने उन्हें बुक कीपर नियुक्त किया। इसके बाद वे गांव के अन्य 11 स्व-सहायता समूहों के दस्तावेजों के संधारण और लेखा कार्य में भी सहयोग करने लगीं।
30 हजार के ऋण से शुरू किया कारोबार
समूह की पहली सीसीएल (कैश क्रेडिट लिमिट) से 30 हजार रुपये का ऋण लेकर निशा ने गांव में साड़ियों का छोटा व्यवसाय शुरू किया। उन्होंने व्यापार के साथ लेखा-जोखा भी व्यवस्थित रखा, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी।
कंप्यूटर ऑपरेटर से बनीं आत्मनिर्भर
जब निर्भया संकुल स्तरीय संगठन (CLF) में कंप्यूटर ऑपरेटर की आवश्यकता हुई तो समूह की महिलाओं ने निशा का नाम प्रस्तावित किया। चयन प्रक्रिया के बाद 30 सितंबर 2024 को उन्हें कंप्यूटर ऑपरेटर का दायित्व मिला।
शुरुआत में उन्हें केवल 2 हजार रुपये मासिक मानदेय मिला, लेकिन उन्होंने इसे सीखने का अवसर माना। निशा का कहना है कि "आजीविका मिशन ऐसा मंच है, जहां इंसान सीखकर काम नहीं करता, बल्कि काम करके सीखता है।"सीमित संसाधनों के बावजूद वे कभी साइकिल से तो कभी अन्य लोगों के साथ कार्यालय पहुंचती रहीं। उन्होंने लगातार प्रशिक्षण लिए, ऑडिट का कार्य सीखा और अपने कार्यों से अधिकारियों तथा संकुल स्तरीय संगठन का विश्वास जीता। उनकी मेहनत को देखते हुए उनका मानदेय बढ़कर 2250, फिर 2500 और बाद में 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया।
स्कूटी खरीदी, बढ़ा सम्मान
लगातार मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर निशा ने अपने पति के सहयोग से स्कूटी खरीदी। अब वे स्वयं स्कूटी चलाकर समय पर कार्यालय पहुंचती हैं। आज गांव में उनका सम्मान बढ़ चुका है और लोग उन्हें एक सफल एवं आत्मनिर्भर महिला के रूप में पहचानते हैं। निशा की सफलता में उनके पति का सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा। परिवार ने हर कदम पर उनका साथ दिया, जिससे वे अपने सपनों को साकार कर सकीं।
महिला सशक्तिकरण की बनीं प्रेरणा
निशा उईके मानती हैं कि यदि वे आजीविका मिशन से नहीं जुड़तीं, तो शायद उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पाती। आज वे स्व-सहायता समूहों के संचालन, लेखा-जोखा, ऑडिट और कंप्यूटर कार्यों में दक्ष हैं तथा अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।उनका कहना है, "मैं जीवन में कहीं भी रहूं, लेकिन यह कभी नहीं भूलूंगी कि मेरे जीवन को नई दिशा और पहचान आजीविका मिशन ने दी है। "निशा उईके की यह कहानी बताती है कि जब महिलाओं को अवसर, विश्वास और सही मार्गदर्शन मिलता है तो वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे समाज के विकास की मजबूत आधारशिला बन जाती हैं।
"नारी बढ़ेगी, विकास गढ़ेगी"
निशा उईके की सफलता इस बात का जीवंत उदाहरण है कि स्व-सहायता समूह केवल बचत का माध्यम नहीं, बल्कि महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और आत्मिक सशक्तिकरण का मजबूत मंच हैं। गांव की एक साधारण महिला का यह सफर आज हजारों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।
#CMMadhyaPradesh
#JansamparkMP
#mp_wcdmp
Balaghat, Madhya Pradesh | Jul 12, 2026