चार साल... सैकड़ों आवेदन... कई कलेक्टर बदले... सीमांकन हुआ... न्यायालय से 250 का दावा भी जीत लिया... लेकिन आज भी डोंगरा पछार का एक गरीब किसान अपनी ही दो बीघा जमीन पर कब्जा नहीं पा सका। क्या यही है न्याय व्यवस्था? क्या एक गरीब किसान को अपनी ही जमीन पाने के लिए जिंदगी भर सरकारी दफ्तरों की चौखट घिसनी पड़ेगी? सब कुछ होने के बाद भी यदि सरकारी आदेश सिर्फ फाइलों और कागजों तक सीमित रह जाए, तो सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर खड़ा होता है। आखिर आदेश का पालन कौन कराएगा? यदि न्याय मिलने के बाद भी न्याय जमीन पर नहीं उतरता, तो ऐसे आदेशों का क्या महत्व रह जाता है? एक ओर सरकार किसानों को देश का अन्नदाता बताती है, दूसरी ओर वही अन्नदाता अपनी ही जमीन के लिए चार वर्षों से दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। यह केवल एक किसान की पीड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जहां दबंगों का कब्जा मजबूत और गरीब का अधिकार कमजोर दिखाई देता है। यदि शासन-प्रशासन समय रहते ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई नहीं करेगा, तो आम आदमी का कानून और शासन पर विश्वास धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। न्याय केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए।उम्मीद है कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को गंभीरता से लेकर पीड़ित किसान को उसकी जमीन जल्द दिलाएंगे।
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