
धान की खेती में अच्छी पैदावार केवल अच्छी किस्म या महंगे उर्वरकों से नहीं मिलती, बल्कि सही समय पर सही कृषि कार्य करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। रोपाई के बाद किसानों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि पहले खाद डालें या पहले खरपतवारनाशी (Weedicide) का प्रयोग करें। कई किसान जल्दबाजी या जानकारी के अभाव में पहले यूरिया या अन्य उर्वरक डाल देते हैं, जबकि कुछ पहले खरपतवारनाशी का छिड़काव करते हैं। सही क्रम का चुनाव फसल की शुरुआती बढ़वार और अंतिम उत्पादन दोनों पर सीधा प्रभाव डालता है।
धान की रोपाई के बाद शुरुआती 25 से 40 दिन फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी अवधि में पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं, नई कल्लियां (Tillers) बनती हैं और फसल की आगे की उत्पादक क्षमता तय होती है। यदि इस समय खरपतवारों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो वे धान के पौधों से पहले पानी, पोषक तत्व, धूप और जगह का उपयोग करने लगते हैं। परिणामस्वरूप धान की बढ़वार प्रभावित होती है और उत्पादन घट सकता है।
रोपाई के तुरंत बाद धान की जड़ें लगभग 4–5 सेंटीमीटर या उससे अधिक गहराई तक स्थापित होने लगती हैं, जबकि नए खरपतवारों की जड़ें मिट्टी की ऊपरी सतह पर ही रहती हैं। यदि किसान इस अवस्था में पहले यूरिया या अन्य उर्वरक डाल देता है, तो ऊपरी सतह पर मौजूद खरपतवार सबसे पहले उन पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेते हैं। इससे खरपतवार तेजी से बढ़ते हैं और धान के पौधों के साथ प्रतिस्पर्धा शुरू कर देते हैं।
इसी कारण अधिकांश कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि खेत में खरपतवार निकलने की संभावना अधिक है, तो रोपाई के बाद सबसे पहले खरपतवारनाशी का प्रयोग करें और उसके कुछ दिन बाद उर्वरक दें। इससे पहले खरपतवार कमजोर होंगे और बाद में डाला गया उर्वरक सीधे धान की फसल को अधिक लाभ पहुंचाएगा।
खरपतवारनाशी मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं। पहला प्री-इमर्जेंस (Pre-emergence), जिसे खरपतवार उगने से पहले प्रयोग किया जाता है। दूसरा पोस्ट-इमर्जेंस (Post-emergence), जिसे खरपतवार निकल आने के बाद प्रयोग किया जाता है। यदि किसान प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशी का उपयोग कर रहा है, तो सामान्यतः रोपाई के 3–4 दिनों के भीतर उसका प्रयोग किया जाता है। अलग-अलग खरपतवारनाशियों की समयावधि और उपयोग विधि अलग हो सकती है, इसलिए हमेशा लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए।
खरपतवारनाशी का प्रभाव तभी अच्छा मिलता है जब खेत में लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर पानी मौजूद हो और खेत पूरी तरह समतल हो। इससे दवा पूरे खेत में समान रूप से फैलती है। साथ ही दवा डालने के बाद कम से कम 24 घंटे तक खेत का पानी बाहर नहीं निकलना चाहिए। यदि इस दौरान तेज बारिश हो जाए या पानी दूसरे खेत में बह जाए, तो दवा का प्रभाव कम हो सकता है और किसान का खर्च भी व्यर्थ चला जाता है।
खरपतवारनाशी के प्रयोग के लगभग 4 से 5 दिन बाद, जब खरपतवार कमजोर होने लगें, तब यूरिया या अन्य टॉप ड्रेसिंग उर्वरक देना अधिक लाभकारी माना जाता है। इस समय पोषक तत्वों का अधिक उपयोग धान के पौधे करते हैं, जिससे उनकी बढ़वार और कल्ले बनने की क्षमता बेहतर होती है।
यदि आपने रोपाई के समय ही बेसल डोज के रूप में डीएपी या अन्य उर्वरक खेत में डाल दिए हैं, तो यह सामान्य और सही कृषि पद्धति का हिस्सा है। यहां चर्चा केवल रोपाई के बाद दी जाने वाली टॉप ड्रेसिंग के बारे में है।
कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां भी हमेशा ध्यान रखें। खरपतवारनाशी को यूरिया के साथ मिलाकर कभी न डालें, क्योंकि इससे दवा का प्रभाव प्रभावित हो सकता है। हमेशा अनुशंसित मात्रा का ही प्रयोग करें। अधिक मात्रा देने से फसल को नुकसान भी हो सकता है। साथ ही दवा डालने के बाद खेत में पर्याप्त पानी बनाए रखें और दवा के निर्देशों का पालन करें।
हालांकि हर खेत की स्थिति एक जैसी नहीं होती। यदि आपका खेत अच्छी तरह तैयार है और रोपाई के बाद 10–15 दिनों तक खरपतवार दिखाई ही नहीं देते, तो बिना आवश्यकता के खरपतवारनाशी का प्रयोग करना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में फसल की निगरानी करते रहें और आवश्यकता होने पर ही खरपतवार नियंत्रण करें। अनावश्यक रसायनों का प्रयोग न केवल लागत बढ़ाता है बल्कि पर्यावरण और मिट्टी के लिए भी उचित नहीं माना जाता।
याद रखें, सफल धान उत्पादन का आधार केवल खाद की मात्रा नहीं बल्कि सही समय, सही क्रम और सही निर्णय है। यदि खेत में खरपतवार की समस्या है तो पहले उसका नियंत्रण करें, फिर उर्वरक दें। लेकिन यदि खरपतवार नगण्य हैं, तो केवल दवा डालने के लिए दवा न डालें। खेत की वास्तविक स्थिति देखकर ही निर्णय लें।
सही कृषि प्रबंधन से न केवल खरपतवार नियंत्रण बेहतर होगा, बल्कि धान की बढ़वार, कल्ले बनने की क्षमता और अंततः उत्पादन में भी सकारात्मक सुधार देखने को मिलेगा।
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