
ये बिहार के पत्रकार प्रिंस हैं। आप इन्हें यूट्यूबर कह सकते हैं, लेकिन मेरी नजर में ऐसे लोग ही असली पत्रकार हैं।
वैशाली के रहने वाले प्रिंस पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ है और उनको जेल भेज दिया गया है। जेल जाते वक्त उन्होंने कहा कि उनके द्वारा करीब 200 लोगों को राशन नहीं मिलने की खबर चलाई थी। खबर के बाद डीलर पर कार्रवाई हुई और उसका लाइसेंस रद्द कर दिया गया। अब उसी मामले का बदला लेने के लिए उनके खिलाफ झूठा SC-ST एक्ट के तहत केस किया गया है।
यह कोई नई बात नहीं है। पत्रकारों को एक्सर ऐसे फंसाया या परेशान किया जाता है।
लेकिन मेरा सवाल सिर्फ प्रिंस को लेकर नहीं है। आखिर इस देश में एक स्वतंत्र पत्रकार भ्रष्ट सिस्टम से लड़े तो कैसे लड़े?
जनता को खबर चाहिए, वह भी मुफ्त में। फेसबुक पर पोस्ट पढ़ लेंगे, यूट्यूब पर वीडियो देख लेंगे, लाइक-शेयर भी कर देंगे। लेकिन जिस पत्रकार ने खबर निकाली, उसके ऊपर मुकदमा हो जाए, उसे वकील करना पड़े, कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ें, तब उसके साथ कितने लोग खड़े होते हैं?
प्रिंस का भी परिवार है। उनका भी घर चलता है। उनके भी मां-बाप, पत्नी-बच्चे या अपने लोग होंगे जिनकी जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। सोशल मीडिया मॉनेटाइजेशन से कितनी कमाई होती है, यह इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं।
न कोई सरकारी सुरक्षा, न कोई संस्थागत समर्थन, न कोई बड़ा मीडिया हाउस पीछे खड़ा। फिर भी लोग उम्मीद करते हैं कि पत्रकार हर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता रहे, हर दबाव का सामना करता रहे और हर कीमत पर सच सामने लाता रहे।
सवाल प्रिंस का नहीं है। सवाल यह है कि अगर स्वतंत्र पत्रकारों को अकेले ही लड़ना है, तो कल कोई नया पत्रकार किसी गरीब का राशन, किसी पंचायत का घोटाला या किसी अधिकारी की मनमानी उजागर करने का जोखिम क्यों उठाएगा?
जनता अक्सर खबर को मुफ्त समझती है, लेकिन उसके पीछे किसी पत्रकार का समय, पैसा, मेहनत और कई बार उसका पूरा भविष्य दांव पर लगा होता है। यह मैंने भी महसूस किया है जब किसी बड़े भ्रष्टचारियों के खिलाफ आप खबर चलाते हैं तो कितना दबाव रहता है।
जनता से इतना कहूंगा कि कम खा लीजिए। किसी निष्पक्ष - स्वतंत्र पत्रकार को जरूर आर्थिक सहयोग कीजिए। तब आपको हक मिलता है कि वह गलत करे तो सवाल आप भी उससे पूछ सके।
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