भरत तिवारी के एनकाउंटर के बाद सोशल मीडिया पर समर्थन की बाढ़ आ गई है। हर कोई खुद को उसका शुभचिंतक और हमदर्द साबित करने में लगा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भरत तिवारी जीवित था, अपनी लड़ाई लड़ रहा था, तब उसके साथ कितने लोग खड़े थे? तब उसकी आवाज़ को बुलंद करने वाले हाथ गिने-चुने थे, लेकिन आज उसके नाम पर रील, पोस्ट और भावुक संदेशों की होड़ लगी हुई है।
यह हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है कि हम अक्सर किसी व्यक्ति की कीमत उसके जाने के बाद समझते हैं। जीवित इंसान संघर्ष करता रहता है, न्याय और समर्थन की उम्मीद करता रहता है, लेकिन भीड़ तब जागती है जब वह इस दुनिया में नहीं रहता। आज जो लोग सोशल मीडिया पर उसके समर्थन में आवाज़ उठा रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि अगर यही समर्थन समय रहते मिलता, तो शायद परिस्थितियां कुछ और होतीं। असली साथ वही है जो संघर्ष के समय दिया जाए, श्रद्धांजलि के समय नहीं।
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