
#हीरो_से_खलनायक_तक_का_सफ़र:
#सीतापुर_संस्करण
जनता तो डीएम साहब के प्रशासनिक 'स्वैग' पर इस कदर लट्टू थी कि हमें ही 'नकारात्मक सोच' वाला घोषित कर दिया गया।
और आज? आज वही भोली-भाली जनता अपनी छाती पीट रही है, घबराई हुई है, और खुद को ऐसे ठगा महसूस कर रही है जैसे किसी ने 25 दिन में पैसा डबल करने वाली स्कीम में फंसा दिया हो।
#सिंघम_अचानक #मोगैंबो..
कल तक जो साहब जनता के दरबार में बैठकर न्याय की गंगा बहा रहे थे, आज उन्होंने एक ही झटके में 'नजूल' का ऐसा ब्रह्मास्त्र चलाया कि लोगों के आशियाने ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
जनता सोच रही है "वाह! हमारे डीएम साहब कितने जमीन से जुड़े हैं।"
प्रशासन की सोच: "जमीन से तो जुड़े हो, लेकिन बेटा, ये जमीन तो नजूल की है!"
साहब ने ऐसा यू-टर्न मारा है कि खुद बॉलीवुड के विलेन शर्मा जाएं। जनता बेचारी कल तक जिस बुल्डोजर के स्वागत में फूल मालाएं तैयार रख रही थी, आज उसी बुल्डोजर के आगे हाथ जोड़े खड़ी है।
"अरे हुजूर, पहले क्यों नहीं बताया?"
अब भोली जनता का सबसे बड़ा दर्द यह है कि जब सालों-साल से वो उस जमीन पर आशियाना बना रहे थे, टैक्स भर रहे थे, बिजली का बिल दे रहे थे, तब प्रशासन शायद कुंभकर्ण की नींद सो रहा था। लेकिन जैसे ही आशियाने पक्के हो गए, साहब की अंतरात्मा जागी और उन्होंने फाइलों के पीले पन्नों से 'नजूल' शब्द ढूंढ निकाला।
#राजनीति_और_प्रशासन_में_हीरो की एंट्री जितनी धमाकेदार होती है, #विलेन वाला क्लाइमेक्स उससे कहीं ज्यादा दर्दनाक होता है।
खैर, सीतापुर वालों, घबराओ मत। यह लोकतंत्र है। यहाँ आज जो विलेन बनकर आशियाने तोड़ रहा है, कल वही फिर से किसी नई योजना का फीता काटकर 'हीरो' बनने की कोशिश करेगा। तब तक के लिए, अपनी आंखों के आंसू पोंछिए और अगली बार किसी प्रशासनिक अधिकारी को 'भगवान' मानने से पहले हमारी यह बात याद रखिएगा—#कुछ_तो_गड़बड़ #है #भाया
एक छोटा सा सवाल सीतापुर की जनता से: अब जब 'हीरो' साहब विलेन बन ही चुके हैं, तो क्या आपको लगता है कि इस क्लाइमेक्स के बाद कोई नया 'ट्विस्ट' आना बाकी है, या जनता सिर्फ मूकदर्शक बनकर रह जाएगी?
#sitapurnewsservice #SitapurNews