
मुझको मालूम है। आप इसे नहीं पढ़ेंगे।
कमाल का दौर है!
अब झगड़े इंसानों के बीच नहीं होते, सीधे समुदायों के बीच घोषित कर दिए जाते हैं। दो व्यक्तियों में कहासुनी हो जाए तो मिनटों में उसे हिंदू-मुसलमान, दलित-सवर्ण, सिख-स्थानीय या किसी और पहचान की लड़ाई बना दिया जाता है।
विकासनगर के बैरागीवाला में दो लोग आपस भिड़े दोनों के हाथ में हथियार थे उसमें से की जान चली गई, तो पूरा हिंदू-मुस्लिम विमर्श खड़ा हो गया। टिहरी के प्रतापनगर में हत्या की बात करें तो, तो मामला सीधे सवर्ण बनाम दलित के खांचे में डाल दिया गया। कर्णप्रयाग की घटना हुई, तो उसे सिख बनाम स्थानीय युवकों का संघर्ष बना दिया गया।
ऐसा लगता है कि अब व्यक्ति नाम की कोई इकाई बची ही नहीं। किसी की गलती उसकी व्यक्तिगत नहीं रहती, वह पूरे समाज, पूरे धर्म, पूरी जाति और पूरे समुदाय के माथे मढ़ दी जाती है।
और फिर शुरू होता है राजनीति का महोत्सव—कुछ लोग आग लगाते हैं, कुछ लोग उसमें घी डालते हैं, कुछ लोग राख समेटकर वोट तलाशते हैं। समाधान किसी की प्राथमिकता नहीं होता, क्योंकि विवाद जितना बड़ा होगा, राजनीतिक लाभ की संभावनाएँ भी उतनी ही बड़ी होंगी।
वास्तव में आज का सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि लोग लड़ रहे हैं, बल्कि यह है कि हर लड़ाई को पहचान की लड़ाई में बदल देने का एक संगठित सामाजिक और राजनीतिक कौशल विकसित हो चुका है। व्यक्ति गायब है, भीड़ उपस्थित है; तथ्य गायब हैं, नैरेटिव उपस्थित है।
कमाल की बात है—दो लोगों का झगड़ा सुलझाने में किसी की रुचि नहीं, लेकिन उसे दो समुदायों की जंग साबित करने में पूरा तंत्र जुट जाता है।