
क्या किसानों को मिलेगा उनका कानूनी हक?
उत्तर प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों के लिए एक बार फिर उम्मीद की किरण दिखाई दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 1996 से गन्ना भुगतान में हुई देरी पर वैधानिक ब्याज के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए गन्ना आयुक्त को 3 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने साफ कहा है कि वर्षवार पूरा रिकॉर्ड पेश किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसानों को समय पर भुगतान हुआ या नहीं, और यदि भुगतान में देरी हुई तो कानून के अनुसार मिलने वाला ब्याज आखिर क्यों नहीं दिया गया।
यह मामला कोई नया नहीं है। लगभग तीन दशक से गन्ना किसान अपनी मेहनत की कमाई के साथ-साथ उस वैधानिक ब्याज का भी इंतजार कर रहे हैं, जो कानून के तहत उन्हें मिलना चाहिए था। गन्ना किसान अपनी फसल समय पर चीनी मिलों को सौंप देते हैं, लेकिन भुगतान में महीनों और कई बार वर्षों की देरी हो जाती है। ऐसी स्थिति में कानून किसानों के हितों की रक्षा के लिए देरी पर ब्याज देने का प्रावधान करता है। सवाल यह है कि यदि यह प्रावधान पहले से मौजूद था, तो लाखों किसानों को उसका लाभ क्यों नहीं मिला?
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले की जांच तीन चरणों में करने का फैसला किया है। पहला चरण वर्ष 1996 से 2006, दूसरा 2007 से 2013 और तीसरा 2014 से पेराई सत्र 2025-26 तक का होगा। अदालत का मानना है कि यदि इतने वर्षों तक किसानों को वैधानिक ब्याज नहीं मिला है, तो यह राशि सैकड़ों या हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। इसलिए अदालत हर तथ्य और हर रिकॉर्ड की विस्तार से जांच करना चाहती है।
अदालत ने वर्ष 2021 के अपने उस महत्वपूर्ण फैसले का भी उल्लेख किया है, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि गन्ने का भुगतान 14 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए। यदि भुगतान में देरी होती है तो संबंधित चीनी मिल को 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। इस फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है। अब हाईकोर्ट यह जानना चाहता है कि इस फैसले के बाद जारी रिकवरी प्रमाणपत्रों में वास्तव में 15 प्रतिशत ब्याज जोड़ा गया था या नहीं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के हलफनामे पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट का कहना था कि पहले भी वर्षवार आंकड़े मांगे गए थे, लेकिन सरकार की ओर से दाखिल हलफनामा अदालत के सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं देता। अदालत ने पहली नजर में यह भी टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे स्पष्ट जानकारी देने से बचने की कोशिश की गई हो। यही कारण है कि अब गन्ना आयुक्त को स्वयं रिकॉर्ड लेकर अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया गया है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन ने अदालत में दलील दी कि यदि वर्षों का ब्याज किसानों को देना पड़ा तो चीनी मिलों पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आ जाएगा और कई मिलें बंद होने की स्थिति में पहुंच सकती हैं। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल चीनी मिलों के हितों को नहीं देखा जा सकता। कानून सभी के लिए समान है और गरीब गन्ना किसानों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है जितनी उद्योगों की आर्थिक स्थिति।
किसान मजदूर संगठन के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने भी इस आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अदालत के निर्देशों से वर्षों से लंबित ब्याज मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी अदालत ने ब्याज भुगतान का अंतिम आदेश नहीं दिया है, बल्कि रिकॉर्ड की जांच के बाद ही आगे का फैसला होगा। उन्होंने किसानों से अपील की है कि वे अपनी-अपनी गन्ना समितियों और सहकारी समितियों से भुगतान और ब्याज से संबंधित रिकॉर्ड निकलवाकर सुरक्षित रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।
वीएम सिंह ने अपने वीडियो संदेश में वर्ष 2012-13, 2013-14 और 2014-15 के पेराई सत्र से जुड़े ब्याज माफी के मुद्दे का भी जिक्र किया है। उनका कहना है कि इस विषय को भी अदालत के सामने रखा गया है और संबंधित रिकॉर्ड तलब किए गए हैं। हालांकि इस मुद्दे पर अभी अंतिम फैसला आना बाकी है।
किसानों के दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला केवल ब्याज का नहीं, बल्कि न्याय का प्रश्न भी है। यदि किसी किसान को अपनी फसल का भुगतान वर्षों बाद मिलता है, तो उस दौरान उसकी आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। खेती की अगली फसल, बच्चों की पढ़ाई, परिवार का खर्च और कृषि निवेश-सब कुछ प्रभावित होता है। ऐसे में वैधानिक ब्याज केवल अतिरिक्त राशि नहीं बल्कि उस नुकसान की आंशिक भरपाई है, जो भुगतान में देरी के कारण किसान को उठाना पड़ता है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि अभी किसानों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि ब्याज मिलना तय हो गया है। फिलहाल हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड तलब किया है और जांच प्रक्रिया शुरू की है। अंतिम निर्णय अदालत की आगामी सुनवाई और प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों के आधार पर होगा। इसलिए अफवाहों से बचना और आधिकारिक जानकारी पर ही भरोसा करना जरूरी है।
अब पूरे प्रदेश के लाखों गन्ना किसानों की निगाहें 3 अगस्त की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि रिकॉर्ड किसानों के दावों की पुष्टि करते हैं और अदालत आगे कोई महत्वपूर्ण आदेश देती है, तो यह उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए ऐतिहासिक फैसला साबित हो सकता है। आने वाले दिनों में यह मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं रहेगा, बल्कि किसानों के अधिकारों और समय पर भुगतान की व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
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