
बरसात का मौसम शुरू होते ही किसानों की सबसे बड़ी चिंता फसलों में बढ़ने वाले रोग, कीट और खरपतवार बन जाते हैं। ऐसे समय में अधिकांश किसान महंगे फफूंदनाशी (Fungicide), कीटनाशी (Insecticide) और खरपतवारनाशी (Herbicide) खरीदकर समय पर छिड़काव भी करते हैं। लेकिन कई बार लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद परिणाम उम्मीद के अनुसार नहीं मिलते। रोग बढ़ते रहते हैं, कीट पूरी तरह नियंत्रित नहीं होते और खरपतवार भी जीवित रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसान अक्सर दवा की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं, जबकि कई बार असली समस्या दवा नहीं बल्कि स्प्रे में इस्तेमाल होने वाला पानी होता है।
बहुत कम किसान जानते हैं कि किसी भी कृषि रसायन की प्रभावशीलता केवल उसकी गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि जिस पानी में उसे घोलकर छिड़का जा रहा है, उसकी गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि पानी का pH अधिक क्षारीय (Alkaline) हो या उसमें घुले हुए लवण (TDS) ज्यादा हों, तो कई कीटनाशक और फफूंदनाशी अपना असर खोने लगते हैं। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस (Alkaline Hydrolysis) कहा जाता है।
अल्कलाइन हाइड्रोलिसिस का अर्थ है कि क्षारीय पानी में मौजूद तत्व कई रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करके उनकी रासायनिक संरचना को बदल देते हैं। परिणामस्वरूप दवा की सक्रिय शक्ति (Active Ingredient) कम हो जाती है और खेत में उसका प्रभाव घट जाता है। किसान पूरी मात्रा में दवा डालते हैं, लेकिन पौधों पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता।
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश कृषि रसायन तब बेहतर काम करते हैं जब स्प्रे के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी का pH लगभग 6.5 से 7.5 के बीच हो। यह लगभग न्यूट्रल स्थिति होती है। लेकिन यदि पानी का pH इससे काफी अधिक हो जाए, तो कई रसायनों का प्रभाव तेजी से कम होने लगता है।
बरसात के मौसम में यह समस्या और बढ़ जाती है। लगातार वर्षा के कारण मिट्टी और अन्य स्रोतों से घुले हुए लवण पानी में मिल जाते हैं। कई स्थानों पर कुएं, बोरवेल या तालाब का पानी सामान्य दिनों की तुलना में अधिक क्षारीय हो जाता है। ऐसे पानी में दवा मिलाने से उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
कई किसानों ने यह अनुभव भी किया होगा कि स्प्रे टैंक के अंत में बचा हुआ घोल सामान्य से अधिक गाढ़ा या चिपचिपा दिखाई देता है। कई बार टैंक खाली होने के बाद अंतिम हिस्से का घोल पौधों पर सफेद परत छोड़ देता है या कुछ फसलों में पत्तियों पर जलन (Scorching) जैसी समस्या भी दिखाई देती है। यह भी संकेत हो सकता है कि पानी और रसायन के बीच अवांछित रासायनिक प्रतिक्रिया हुई है।
इसी कारण कृषि विशेषज्ञ हमेशा सलाह देते हैं कि स्प्रे घोल तैयार करने के बाद उसे लंबे समय तक टैंक में रखकर अगली सुबह उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि पानी क्षारीय है तो रातभर में रसायनों का विघटन और अधिक हो सकता है, जिससे अगले दिन स्प्रे का असर काफी कम हो सकता है।
बारिश के मौसम में फफूंद और बैक्टीरिया तेजी से फैलते हैं क्योंकि वातावरण में नमी अधिक होती है और पत्तियां लंबे समय तक गीली रहती हैं। ऐसे समय में यदि स्प्रे की प्रभावशीलता ही कम हो जाए, तो रोग नियंत्रण और भी कठिन हो जाता है। इसलिए केवल महंगी दवा खरीदना पर्याप्त नहीं है, सही पानी का उपयोग भी उतना ही आवश्यक है।
ऐसी स्थिति में एक सरल और कम लागत वाला उपाय वर्षा जल (Rainwater) का उपयोग हो सकता है। सामान्यतः साफ छत से एकत्र किया गया वर्षा जल कम TDS और लगभग न्यूट्रल pH वाला होता है। यदि इसे स्वच्छ टंकी में संग्रहित किया जाए, तो कई परिस्थितियों में यह स्प्रे घोल तैयार करने के लिए बेहतर विकल्प बन सकता है। हालांकि यदि छत पर धूल, पक्षियों की बीट या अन्य गंदगी हो तो पानी को साफ तरीके से संग्रहित करना जरूरी है।
आज बाजार में ऐसे कई Water Conditioner, pH Corrector और Spray Adjuvant भी उपलब्ध हैं जो स्प्रे घोल की गुणवत्ता सुधारने के लिए बनाए गए हैं। इनका उद्देश्य पानी के pH को संतुलित करना, दवा के घुलने की क्षमता बढ़ाना तथा पत्तियों पर फैलाव (Spreading) और चिपकाव (Adhesion) में सुधार करना होता है। लेकिन इनका उपयोग हमेशा उत्पाद के लेबल और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।
यदि आपको संदेह है कि आपके क्षेत्र का पानी क्षारीय हो सकता है, तो समय-समय पर उसका pH और TDS परीक्षण कराना लाभदायक रहेगा। आज कई कृषि सेवा केंद्रों पर कम लागत में पानी की जांच उपलब्ध है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि स्प्रे से पहले पानी में किसी सुधार की आवश्यकता है या नहीं।
ध्यान रखें कि दवा की मात्रा बढ़ा देने से समस्या का समाधान नहीं होता। यदि पानी की गुणवत्ता खराब है, तो अधिक मात्रा में दवा डालने पर भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और पर्यावरण पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
बरसात के मौसम में सफल रोग और कीट प्रबंधन के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें हमेशा ध्यान रखें। साफ और उपयुक्त pH वाला पानी उपयोग करें, स्प्रे घोल तैयार करने के तुरंत बाद उसका उपयोग करें, अनुशंसित मात्रा से अधिक दवा न डालें, लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें और यदि संभव हो तो समय-समय पर पानी की जांच अवश्य कराएं।
खेती में छोटी-छोटी तकनीकी बातें ही कई बार बड़े आर्थिक नुकसान से बचा सकती हैं। इसलिए यदि बार-बार दवा बदलने के बावजूद परिणाम नहीं मिल रहे हैं, तो केवल दवा को दोष देने से पहले एक बार अपने स्प्रे के पानी की गुणवत्ता पर भी जरूर ध्यान दें। सही पानी, सही दवा और सही समय पर किया गया छिड़काव ही बेहतर परिणाम और अधिक लाभ की कुंजी है।
#कृषिसलाह #फसलसुरक्षा #Fungicide #SmartFarming #भारतीयकिसान