
खेती हमेशा से मौसम पर निर्भर रही है। एक तरफ किसान पूरे सीजन भर मेहनत करता है, महंगे बीज, खाद, सिंचाई और दवाइयों पर हजारों रुपये खर्च करता है, वहीं दूसरी तरफ एक ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा, तेज आंधी या अत्यधिक बारिश कुछ ही घंटों में पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है। ऐसी परिस्थितियों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा बनती है। अब इस योजना को और अधिक पारदर्शी, तेज और तकनीक आधारित बनाने के लिए केंद्र सरकार ने कई बड़े बदलाव किए हैं। सरकार का दावा है कि नई डिजिटल तकनीकों की मदद से फसल नुकसान का अधिक सटीक आकलन होगा और किसानों को बीमा क्लेम पहले की तुलना में जल्दी मिल सकेगा।
कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में आधुनिक तकनीकों को तेजी से जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल बीमा योजना चलाना नहीं, बल्कि किसानों को समय पर न्याय दिलाना भी है। वर्षों से किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि फसल खराब होने के बाद सर्वे में देरी होती है, नुकसान का सही आकलन नहीं हो पाता और क्लेम मिलने में कई महीने लग जाते हैं। नई तकनीकों के जरिए इन्हीं समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पहल WINDS (Weather Information Network and Data System) है। इसके तहत देशभर में स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) और स्वचालित वर्षामापी यंत्र (ARG) लगाए जा रहे हैं। इन उपकरणों से गांव और क्षेत्र स्तर तक का हाइपरलोकल मौसम डेटा उपलब्ध होगा। इसका फायदा यह होगा कि बारिश, तापमान, आंधी या अन्य मौसम संबंधी घटनाओं का सटीक रिकॉर्ड तैयार होगा और फसल नुकसान के दावों में मौसम संबंधी विवाद काफी हद तक कम होंगे।
सरकार के अनुसार फिलहाल असम, हिमाचल प्रदेश, केरल, ओडिशा, पुडुचेरी, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित सात राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में इस परियोजना पर काम चल रहा है। 16,843 स्थानों पर उपकरण लगाने की मंजूरी दी जा चुकी है, जिनमें सैकड़ों स्थानों पर उपकरण स्थापित भी किए जा चुके हैं। आने वाले समय में इसका दायरा और बढ़ाया जाएगा।
फसल उत्पादन का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए सरकार ने YS-Tech (Yield Estimation System Technology) को भी योजना में शामिल किया है। पहले उत्पादन का अनुमान मुख्य रूप से फसल कटाई प्रयोग (Crop Cutting Experiment) पर आधारित होता था, जिसमें कई बार मानवीय त्रुटियां या देरी की शिकायतें सामने आती थीं। अब रिमोट सेंसिंग और आधुनिक तकनीक की मदद से उपज का वैज्ञानिक आकलन किया जा रहा है।
इस तकनीक की शुरुआत खरीफ 2023 में धान और गेहूं से हुई थी। बाद में सोयाबीन को भी इसमें शामिल किया गया। सरकार ने यह भी तय किया कि YS-Tech से प्राप्त आंकड़ों को उपज निर्धारण में 30 प्रतिशत वेटेज दिया जाएगा। वर्ष 2025-26 में इसका उपयोग 12 राज्यों के 344 जिलों में किया गया। मध्य प्रदेश ने इसे पूरी तरह अपनाते हुए 100 प्रतिशत वेटेज दिया, जबकि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक ने भी इसे बड़े स्तर पर लागू किया है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पूरे संचालन को डिजिटल बनाने के लिए राष्ट्रीय फसल बीमा पोर्टल (NCIP) को मजबूत किया गया है। अब किसान पंजीकरण, प्रीमियम, सब्सिडी, बीमित किसानों का रिकॉर्ड और क्लेम से जुड़ी अधिकांश प्रक्रियाएं इसी पोर्टल के माध्यम से संचालित की जा रही हैं। इससे रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है और प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी बनती है।
क्लेम भुगतान की निगरानी के लिए सरकार ने DigiClaim मॉड्यूल भी लागू किया है। यह प्रणाली राष्ट्रीय फसल बीमा पोर्टल, सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) और बीमा कंपनियों की लेखा प्रणाली को आपस में जोड़ती है। इससे दावा स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया पर लगातार निगरानी रखी जा सकती है।
सरकार ने केवल नई तकनीक ही नहीं जोड़ी, बल्कि जवाबदेही भी तय करने की कोशिश की है। खरीफ 2024 से यदि कोई बीमा कंपनी समय पर क्लेम का भुगतान नहीं करती है तो उस पर 12 प्रतिशत ब्याज के बराबर जुर्माना लगाया जाएगा। इसी प्रकार खरीफ 2025 से यदि कोई राज्य सरकार अपने हिस्से की प्रीमियम सब्सिडी समय पर जारी नहीं करती है तो उस पर भी 12 प्रतिशत का दंड लगाया जाएगा। यह व्यवस्था किसानों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है क्योंकि पहले कई बार क्लेम भुगतान में महीनों की देरी होती थी।
वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए सभी राज्यों के लिए ESCROW Account खोलना भी अनिवार्य कर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकारें पहले से ही अपने हिस्से की प्रीमियम राशि सुरक्षित रखें ताकि भुगतान में अनावश्यक देरी न हो।
फसल नुकसान के सर्वे को अधिक सटीक बनाने के लिए CCE Agri-App और Crop Loss Assessment App (CLAP) को भी लागू किया गया है। इन ऐप्स के माध्यम से खेत स्तर पर डिजिटल सर्वे किया जा सकेगा। स्थानीय आपदा, ओलावृष्टि, बाढ़ या कटाई के बाद हुए नुकसान का रिकॉर्ड सीधे ऑनलाइन दर्ज किया जाएगा। इससे कागजी प्रक्रिया कम होगी और किसानों को क्लेम मिलने की संभावना अधिक तेज होगी।
हालांकि इन सभी तकनीकी सुधारों के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। देश के अनेक छोटे और सीमांत किसानों के पास आज भी स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल सेवाओं तक आसान पहुंच नहीं है। कई गांवों में नेटवर्क की समस्या बनी रहती है और तकनीकी जानकारी का भी अभाव है। यदि किसानों को इन नई व्यवस्थाओं की पूरी जानकारी नहीं मिलेगी, तो आधुनिक तकनीक का लाभ सीमित रह सकता है।
इसके अलावा केवल डिजिटल सिस्टम बनाना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह भी है कि राज्यों के कृषि विभाग, बीमा कंपनियां और स्थानीय प्रशासन समयबद्ध तरीके से इन तकनीकों का उपयोग करें। यदि सर्वे में देरी होगी या डेटा अपलोड समय पर नहीं होगा, तो तकनीक होने के बावजूद किसानों को राहत मिलने में देरी हो सकती है।
सरकार द्वारा किए जा रहे ये सुधार निश्चित रूप से सकारात्मक दिशा में उठाए गए कदम हैं। मौसम आधारित डेटा, रिमोट सेंसिंग, डिजिटल पोर्टल, मोबाइल ऐप और जवाबदेही तय करने जैसी व्यवस्थाएं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को पहले की तुलना में अधिक मजबूत बना सकती हैं। लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब प्रत्येक पात्र किसान तक योजना की जानकारी पहुंचे, पंजीकरण प्रक्रिया सरल हो, स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण मिले और क्लेम का भुगतान वास्तव में समय पर किसानों के खाते में पहुंचे।
खेती आज जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी मार झेल रही है। ऐसे समय में केवल बीमा योजना होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। यदि सरकार द्वारा शुरू की गई ये नई तकनीकी व्यवस्थाएं जमीन पर पूरी ईमानदारी और दक्षता के साथ लागू होती हैं, तो आने वाले वर्षों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए और अधिक भरोसेमंद सुरक्षा कवच बन सकती है।
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