
20 साल में करोड़ों पौधे लगाने के दावे, फिर भी उन्नाव जंगल क्यों नहीं बना? आखिर करोड़ों पौधे गए कहाँ?
विशेष खोजी रिपोर्ट
उन्नाव।
उत्तर प्रदेश में पिछले दो दशकों से हर वर्ष बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के सरकारी लक्ष्य घोषित होते हैं और जिलों को लाखों पौधे लगाने का लक्ष्य दिया जाता है। उन्नाव भी उन जिलों में शामिल है जहाँ लगभग हर वर्ष लाखों पौधे लगाने का दावा किया जाता रहा है।
वर्ष 2026 में भी उन्नाव जिले के लिए लगभग 50 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यदि पिछले लगभग 20 वर्षों का औसत देखें और मान लें कि प्रत्येक वर्ष औसतन 20 लाख पौधे भी लगाए गए हों, तो अब तक यह संख्या लगभग 4.5 करोड़ पौधों तक पहुँच जाती है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है।
क्या कहते हैं गणित के आंकड़े?
उन्नाव का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 4,558 वर्ग किलोमीटर यानी 4,55,800 हेक्टेयर है।जिले में 1,044 गांव हैं।
वन विभाग सामान्यतः 3×3 मीटर की दूरी पर पौधारोपण करता है। इस मानक के अनुसार एक हेक्टेयर में लगभग 1,100 पौधे लगाए जा सकते हैं।
यदि 4.5 करोड़ पौधों को इसी घनत्व से लगाया जाए, तो उन्हें लगभग 40 हजार हेक्टेयर (करीब 400 वर्ग किलोमीटर) भूमि की आवश्यकता होगी।
यह क्षेत्र उन्नाव जिले के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9 प्रतिशत है।
अर्थात यदि इन पौधों का बड़ा हिस्सा आज जीवित होता, तो जिले के नक्शे पर सैकड़ों वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त हरित क्षेत्र स्पष्ट दिखाई देना चाहिए।
लेकिन पूरी जमीन वृक्षारोपण के लिए उपलब्ध नहीं
उन्नाव की पूरी 4,558 वर्ग किलोमीटर भूमि खाली नहीं है।
इसी भूमि में शामिल हैं
लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि
1,044 गांव
नगर पालिकाएं और कस्बे
हजारों किलोमीटर सड़कें
रेलवे लाइन
गंगा, सई तथा अन्य नदियां
तालाब और जलाशय
चारागाह
गौशालाएं
विद्यालय, अस्पताल और सरकारी कार्यालय
औद्योगिक क्षेत्र
निजी एवं सरकारी आवासीय भूमि
ऐसी स्थिति में वृक्षारोपण के लिए उपलब्ध वास्तविक भूमि कुल क्षेत्रफल से काफी कम रह जाती है।
फिर सवाल उठना स्वाभाविक है...
यदि करोड़ों पौधे लगाए गए थे तो—
आज वे वृक्ष कहाँ हैं?
उनका जीवित रहने का प्रतिशत कितना है?
कितने पौधे एक वर्ष बाद जीवित मिले?
कितने पौधे पाँच वर्ष बाद वृक्ष बने?
क्या हर वर्ष लगाए गए पौधों का तीसरे पक्ष से सत्यापन कराया गया?
क्या प्रत्येक पौधे का जियो-टैग सार्वजनिक है?
क्या ग्राम पंचायतवार जीवित पौधों का रिकॉर्ड उपलब्ध है?
केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि वृक्षारोपण अभियान की सफलता का पैमाना पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनका जीवित रहना है।
यदि सिंचाई, सुरक्षा, पशुओं से बचाव और नियमित देखभाल नहीं हो तो पहले दो-तीन वर्षों में बड़ी संख्या में पौधे नष्ट हो जाते हैं।
यही कारण है कि आज अधिकांश विशेषज्ञ "Plantation" से अधिक "Survival Rate" पर जोर देते हैं।
क्या होना चाहिए?
यदि सरकार और संबंधित विभाग वास्तव में पारदर्शिता चाहते हैं तो प्रत्येक वर्ष सार्वजनिक किया जाये
कितने पौधे लगाए गए।
किस विभाग ने लगाए।
किस ग्राम पंचायत में लगाए।
कितने पौधे आज भी जीवित हैं।
किस स्थान का जियो-टैग उपलब्ध है।
ड्रोन और सैटेलाइट से सत्यापन रिपोर्ट।
तीसरे पक्ष द्वारा ऑडिट रिपोर्ट।
जनता का सवाल
यदि पिछले 20 वर्षों में करोड़ों पौधे लगाए गए हैं, तो उनका प्रभाव जिले की हरियाली में स्पष्ट क्यों नहीं दिखाई देता?
क्या समस्या पौधारोपण में है?
क्या समस्या रखरखाव में है?
या फिर समस्या दावों और वास्तविकता के बीच है?
इन सवालों का जवाब केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, बल्कि जमीनी सत्यापन, सार्वजनिक आंकड़ों और स्वतंत्र जांच से ही मिल सकता है।
Unnao, Unnao | Jul 11, 2026