
झगड़ा प्रथा का अंत हो!
झगड़ा प्रथा एक ऐसी सामाजिक कुरीति है, जो झालावाड़ सहित कई ग्रामीण अंचलों में आज भी प्रचलित है।
अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर परिवार जब अपनी बेटी के बचपन में ही उसके विवाह का वादा किसी परिवार से कर देते हैं। लेकिन जब बेटी बालिग होने पर अपनी इच्छा व्यक्त करती है, आगे पढ़ना चाहती है या उस विवाह के लिए सहमत नहीं होती, तो लड़की के परिवार पर लड़के पक्ष द्वारा धनराशि देने का दबाव बनाया जाता है। इस धनराशि को “झगड़ा” कहा जाता है।
इसी प्रकार, पति की मृत्यु या अन्य परिस्थितियों में यदि महिला या उसका परिवार पुनर्विवाह का निर्णय लेता है, तब भी कई स्थानों पर झगड़े की मांग की जाती है।
यह केवल पैसों का मामला नहीं है, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और उनके संवैधानिक अधिकारों पर आर्थिक दबाव डालने का एक माध्यम है। किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए बाध्य करना या उसकी स्वतंत्र पसंद के बदले धन की मांग करना न केवल अमानवीय है, बल्कि कानूनन भी गलत है।
झगड़ा प्रथा हमारी मातृशक्ति के सम्मान पर एक कलंक है।
कहा गया है
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।”
अर्थात, जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।
ऐसी कुरीतियों को समाप्त करने के लिए समाज, परिवार और युवाओं को मिलकर आगे आना होगा।
यदि किसी महिला या उसके परिवार से भय, दबाव या धमकी देकर धन की मांग की जाती है, तो यह अवैध वसूली (Extortion) की श्रेणी में आ सकता है, जिसके संबंध में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 308 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। प्रत्येक मामले के तथ्य और परिस्थितियों के आधार पर अन्य प्रासंगिक धाराएँ भी लागू हो सकती हैं।
आइए,
जिला प्रशासन की इस पहल के साथ हम सब मिलकर संकल्प लें कि झगड़ा प्रथा जैसी कुरीतियों को जड़ से समाप्त करेंगे और महिलाओं के सम्मान, स्वतंत्रता तथा अधिकारों की रक्षा करेंगे।