
धन जब ज्यादा होता है तो अपराधियों का अपराध भी छुप जाता है, खंभे से बांधकर पीट-पीटकर हत्या करने वाले की दुकान का फीता काटा गया, दुकान इसलिए कहेंगे क्योंकि माननीयों को छोड़कर बाकी सबकी नजर में वो बहुत छोटा इंसान है, अरे काटने वालों एक बार कुछ समय पहले के रिकार्ड पर नजर डाल लेते, तो शायद फीता काटने के लिए हाथ से कैंची न चलती, उस पिता से पूछों, जिसने अपने लाल को खो दिया, कुछ समय बाद उसकी शादी होने वाली थी, ये माननीयों ने साबित कर दिया, गरीब अपराध करे तो उससे हमेशा के लिए खतरा बन जाता है लेकिन जब वही अपराध अमीर करे तो धन की चमक से वाशिंग मशीन से धुलकर साफ सुथरा हो जाता है। यहां पर गलती फीता कटवाने वाले की नहीं कहेंगे, गलती तो उनकी कहेंगे जिनको फीता काटते समय वो खंभा नजर नहीं आया, जिसमें युवक को बांध रखा था, युवक के शरीर पर गहरे जख्म दिखाई नहीं दिए, कितनी बेरहमी से यातनाएं दी गयी थीं, तब तो माननीयों ने बेबस पिता के घर जाकर पहाड़ जैसे वादे किए थे, अब मुस्कुराते चेहरों से उन वादों के बारे पूछा जाए। ,,,,,,खैर बहुत कुछ लिखने का मन कर रहा था लेकिन अभी के लिए इतना काफी है। हो सकता इस लेख से बहुत से लोगों के विचार मेल न खाएं और बहुत से लोगो को ठीक भी लगे, लेकिन दिल आया तो लिख दिया। क्योंकि माननीयों से ऐसी उम्मीद नहीं थी।