
बेगूसराय में अपराध के बाद पुलिस पहुँचती है। उससे पहले सरकार कहाँ होती है?
Avinash Bhatt | The News Halt
बेगूसराय के किसी घर में बच्ची स्कूल से देर से लौटे, तो माँ की नज़र घड़ी पर टिक जाती है। बेटा फोन न उठाए, तो पिता रास्ते की तरफ़ देखने लगते हैं। डर का यही असर होता है—वह किसी एक पीड़ित परिवार तक सीमित नहीं रहता।
पिछले एक महीने की खबरें सामने रखिए। बखरी में सात साल की बच्ची से दुष्कर्म की शिकायत हुई। साहेबपुर कमाल में किशोरी से दुष्कर्म का मामला आया। बखरी की कोचिंग छात्रा के कथित यौन शोषण पर FIR दर्ज हुई। चकिया में नाबालिग से दुष्कर्म के प्रयास की रिपोर्ट आई। बखरी में ही एक किशोरी ने जबरन देह व्यापार कराने का आरोप लगाया। फिर शहर के एक होटल में महिला से कथित यौन हिंसा और मारपीट का मामला सामने आया। ये छह अलग-अलग शिकायतें और घटनाएँ हैं; हर आरोप की जाँच और न्यायिक पुष्टि जरूरी है। मगर हर नई शिकायत के साथ प्रशासन से यह पूछना भी जरूरी है कि पिछली शिकायत के बाद सुरक्षा में क्या बदला।
उधर तेघड़ा में छात्र समीर की गोली लगने से मौत हुई। भगवानपुर में मो. एहसान की पिटाई के बाद मौत हुई और साजन कुमार की गोली मारकर हत्या की खबर आई। बखरी में लालो महतो को गोली मारी गई। धनकौल में लापता पाँच साल के बच्चे का क्षत-विक्षत शव मिला, जिसकी मौत की परिस्थितियों पर जाँच का निष्कर्ष अभी चाहिए। इन घरों के लिए अपराध की चर्चा किसी टीवी बहस का विषय नहीं है। उनके लिए वह एक ऐसा दरवाज़ा है, जिस पर अब अपना आदमी लौटकर नहीं आएगा।
सरकार हर बार कहती है—कानून अपना काम करेगा। ठीक है। लेकिन उसका काम कब शुरू होता है? FIR दर्ज होने के बाद? शव मिलने के बाद? वीडियो वायरल होने के बाद? पुलिस की तत्परता का पैमाना केवल गिरफ्तारी नहीं हो सकता। पैमाना यह भी है कि शिकायत पहली बार लेकर पहुँचे व्यक्ति को कितनी गंभीरता से सुना गया, संवेदनशील जगहों पर निगरानी कैसी थी और पहले की घटनाओं से क्या सबक लिया गया।
मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से सीधा सवाल है: आखिर कब खत्म होगा बेगूसराय में यह जंगलराज जैसा डर? यदि सरकार इस सवाल को अतिशयोक्ति मानती है, तो बहस शब्दों पर नहीं, रिकॉर्ड पर करे। पिछले महीने की थाना-वार हत्या, दुष्कर्म, POCSO और मानव तस्करी संबंधी FIR सार्वजनिक करे। बताए कि कितने आरोपियों की गिरफ्तारी हुई, कितने आरोपपत्र दाखिल हुए, किन परिवारों को संरक्षण मिला और किन थानों में गंभीर शिकायतें लंबित रहीं।
प्रकाशित रिपोर्टों में कम से कम 12 अलग गंभीर मामले मिलते हैं। यह सरकारी अपराध आँकड़ा नहीं है; जिन घटनाओं की खबर नहीं बनी, वे इसमें नहीं हैं। फिर भी इतनी सीमित गिनती सरकार को असहज करती है, तो उसे आँकड़ों की पूरी तस्वीर खुद सामने रखनी चाहिए।
बेगूसराय के लोग असंभव वादा नहीं माँग रहे। वे इतना पूछ रहे हैं: अगली वारदात पर आप क्या बयान देंगे, यह तो मालूम है। अगली वारदात रोकने के लिए आज क्या कर रहे हैं?
Bihar, India | Sep 29, 2026