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धान की खेती में अधिक उत्पादन का सबसे मजबूत आधार अच्छी टिलरिंग (फुटाव) होती है। रोपाई के लगभग 25 से 45 दिन के बीच का समय धान की फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवस्था माना जाता है। इसी अवधि में पौधा सबसे अधिक नए कल्ले (Tillers) बनाता है और यही कल्ले आगे चलकर बालियों में परिवर्तित होते हैं। यदि इस समय पौधे का विकास रुक गया या टिलरिंग कम हुई, तो बाद में चाहे कितनी भी खाद, उर्वरक या दवा डाल दी जाए, उत्पादन में आई कमी की पूरी भरपाई करना संभव नहीं होता। इसलिए हर किसान को इस अवस्था में विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है। सही जल प्रबंधन, संतुलित पोषण, खरपतवार नियंत्रण और समय पर निगरानी करके धान की उपज में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। सबसे पहले बात करते हैं पानी के प्रबंधन की। अधिकांश किसान यह मानते हैं कि धान के खेत में हमेशा 6 से 8 सेंटीमीटर तक पानी भरा रहना चाहिए। लेकिन टिलरिंग अवस्था में यह सोच नुकसानदायक हो सकती है। लगातार गहरा पानी भरे रहने से जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती, जिससे नई जड़ों और कल्लों का विकास प्रभावित होता है। इस समय खेत में केवल 2 से 3 सेंटीमीटर पानी रखें। जब खेत की सतह से पानी पूरी तरह गायब हो जाए और मिट्टी में हल्की नमी दिखाई दे, तब दोबारा सिंचाई करें। इस तकनीक को Alternate Wetting and Drying (AWD) कहा जाता है। शोधों में पाया गया है कि इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, पौधे अधिक मजबूत बनते हैं, टिलरिंग बढ़ती है और पानी की भी बचत होती है। लगातार जलभराव की तुलना में यह तकनीक अधिक प्रभावी मानी जाती है। टिलरिंग अवस्था में सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व नाइट्रोजन होता है। यदि खेत की पहली टॉप ड्रेसिंग का समय है, तो प्रति एकड़ लगभग 45 किलोग्राम यूरिया (एक बोरी) का प्रयोग करें। यूरिया डालते समय खेत में हल्की नमी होनी चाहिए और बहुत अधिक पानी नहीं होना चाहिए। यदि यूरिया गहरे पानी में डाल दिया जाए तो नाइट्रोजन का बड़ा भाग वाष्पीकरण या बहाव के कारण नष्ट हो सकता है। आवश्यकता से अधिक यूरिया देने की गलती भी नहीं करनी चाहिए। अधिक नाइट्रोजन से पौधे बहुत कोमल हो जाते हैं, जिससे तना छेदक (Stem Borer), लीफ फोल्डर (Leaf Folder), शीथ ब्लाइट और ब्लास्ट जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए संतुलित मात्रा में ही यूरिया का उपयोग करें। यदि रोपाई से पहले जिंक का प्रयोग नहीं किया गया था, तो इस समय जिंक की पूर्ति अवश्य करें। प्रति एकड़ 33% जिंक सल्फेट लगभग 6 किलोग्राम की मात्रा में यूरिया के साथ मिलाकर डाल सकते हैं। जिंक पौधे के अंदर एंजाइम क्रियाओं, कोशिका विभाजन, नई जड़ों के विकास और टिलरिंग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिंक की कमी होने पर पत्तियों पर हल्की पीली धारियां दिखाई देती हैं, पौधे छोटे रह जाते हैं और कल्ले कम निकलते हैं। जिन खेतों में क्षारीय मिट्टी या लगातार धान की खेती होती है, वहां जिंक की कमी अधिक देखने को मिलती है। पोटाश भी टिलरिंग अवस्था में उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि खेत की तैयारी के समय म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) नहीं दिया गया था, तो प्रति एकड़ लगभग 25 किलोग्राम MOP का प्रयोग करें। यदि MOP उपलब्ध न हो, तो पोटाश डिराइव्ड फ्रॉम मोलेसिस (PDM) लगभग 100 किलोग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में दिया जा सकता है। पोटाश पौधों की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है, जल संतुलन बनाए रखता है, प्रकाश संश्लेषण को बेहतर बनाता है और पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। पर्याप्त पोटाश मिलने पर पौधे मजबूत रहते हैं और आगे चलकर बालियां भी अच्छी विकसित होती हैं। खरपतवार नियंत्रण इस अवस्था का एक और महत्वपूर्ण कार्य है। यदि खेत में खरपतवार मौजूद हैं, तो वे यूरिया, जिंक और पोटाश जैसे पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा स्वयं उपयोग कर लेते हैं। इससे धान के पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और टिलरिंग कम हो जाती है। इसलिए रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन के भीतर खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें। यदि आवश्यक हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपयुक्त शाकनाशी का प्रयोग करें या यांत्रिक निराई करें। खरपतवार हटाने के बाद दी गई खाद का पूरा लाभ धान के पौधों को मिलता है। टिलरिंग अवस्था में खेत का नियमित निरीक्षण भी बहुत जरूरी है। यदि पौधों की पत्तियां पीली दिखाई दें, बढ़वार रुक जाए, कल्ले कम निकलें या कीटों का प्रकोप दिखाई दे, तो तुरंत कारण पहचानकर उसका समाधान करें। प्रारंभिक अवस्था में समस्या का समाधान करने से उत्पादन पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, जबकि देर होने पर नुकसान अधिक हो सकता है। धान की अच्छी टिलरिंग के लिए मिट्टी में जैविक पदार्थ (Organic Matter) भी पर्याप्त होना चाहिए। यदि खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट का नियमित प्रयोग किया जाता है, तो मिट्टी की संरचना बेहतर रहती है और पोषक तत्वों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से होता है। लंबे समय तक केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए हर सीजन में जैविक खाद का भी उपयोग करें। यदि खेत में कीटों का प्रकोप दिखाई दे, जैसे तना छेदक या लीफ फोल्डर, तो केवल आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें। बिना आवश्यकता के बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करने से लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाना अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प है। याद रखें कि टिलरिंग के दौरान मजबूत जड़ें, संतुलित पोषण और पर्याप्त ऑक्सीजन ही अधिक उत्पादन की नींव रखते हैं। इस समय यदि खेत में लगातार गहरा पानी भरा रहेगा, पोषक तत्वों की कमी होगी या खरपतवार अधिक होंगे, तो पौधा पर्याप्त कल्ले नहीं बना पाएगा। बाद में बालियां भी कम निकलेंगी और उत्पादन घट जाएगा। यदि रोपाई के 25 से 45 दिन के बीच प्रति एकड़ 45 किलोग्राम यूरिया, 6 किलोग्राम 33% जिंक सल्फेट (यदि पहले न दिया हो), 25 किलोग्राम MOP या 100 किलोग्राम PDM का संतुलित प्रयोग करें, खेत में 2–3 सेंटीमीटर से अधिक पानी न रखें, Alternate Wetting and Drying तकनीक अपनाएं तथा समय पर खरपतवार नियंत्रण करें, तो धान की टिलरिंग में स्पष्ट सुधार दिखाई देगा। मजबूत कल्ले, अधिक बालियां और बेहतर दाना भराव अंततः अधिक उत्पादन और अधिक लाभ का आधार बनते हैं। खेती में सफलता केवल अधिक उर्वरक डालने से नहीं मिलती, बल्कि सही समय पर सही मात्रा और सही तकनीक अपनाने से मिलती है। धान की यह 20 दिन की महत्वपूर्ण अवस्था पूरे सीजन की सफलता तय करती है। यदि किसान इस अवधि में वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाते हैं, तो प्रति एकड़ उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ गुणवत्ता भी बेहतर होती है और खेती अधिक लाभकारी बनती है। #धान_की_खेती #RiceFarming #किसान_सलाह #उन्नत_खेती #Agriculture

Mariahu, Jaunpur | Jul 25, 2026
धान की खेती में अधिक उत्पादन का सबसे मजबूत आधार अच्छी टिलरिंग (फुटाव) होती है। रोपाई के लगभग 25 से 45 दिन के बीच का समय धान की फसल के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवस्था माना जाता है। इसी अवधि में पौधा सबसे अधिक नए कल्ले (Tillers) बनाता है और यही कल्ले आगे चलकर बालियों में परिवर्तित होते हैं। यदि इस समय पौधे का विकास रुक गया या टिलरिंग कम हुई, तो बाद में चाहे कितनी भी खाद, उर्वरक या दवा डाल दी जाए, उत्पादन में आई कमी की पूरी भरपाई करना संभव नहीं होता। इसलिए हर किसान को इस अवस्था में विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता है। सही जल प्रबंधन, संतुलित पोषण, खरपतवार नियंत्रण और समय पर निगरानी करके धान की उपज में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। सबसे पहले बात करते हैं पानी के प्रबंधन की। अधिकांश किसान यह मानते हैं कि धान के खेत में हमेशा 6 से 8 सेंटीमीटर तक पानी भरा रहना चाहिए। लेकिन टिलरिंग अवस्था में यह सोच नुकसानदायक हो सकती है। लगातार गहरा पानी भरे रहने से जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती, जिससे नई जड़ों और कल्लों का विकास प्रभावित होता है। इस समय खेत में केवल 2 से 3 सेंटीमीटर पानी रखें। जब खेत की सतह से पानी पूरी तरह गायब हो जाए और मिट्टी में हल्की नमी दिखाई दे, तब दोबारा सिंचाई करें। इस तकनीक को Alternate Wetting and Drying (AWD) कहा जाता है। शोधों में पाया गया है कि इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, पौधे अधिक मजबूत बनते हैं, टिलरिंग बढ़ती है और पानी की भी बचत होती है। लगातार जलभराव की तुलना में यह तकनीक अधिक प्रभावी मानी जाती है। टिलरिंग अवस्था में सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व नाइट्रोजन होता है। यदि खेत की पहली टॉप ड्रेसिंग का समय है, तो प्रति एकड़ लगभग 45 किलोग्राम यूरिया (एक बोरी) का प्रयोग करें। यूरिया डालते समय खेत में हल्की नमी होनी चाहिए और बहुत अधिक पानी नहीं होना चाहिए। यदि यूरिया गहरे पानी में डाल दिया जाए तो नाइट्रोजन का बड़ा भाग वाष्पीकरण या बहाव के कारण नष्ट हो सकता है। आवश्यकता से अधिक यूरिया देने की गलती भी नहीं करनी चाहिए। अधिक नाइट्रोजन से पौधे बहुत कोमल हो जाते हैं, जिससे तना छेदक (Stem Borer), लीफ फोल्डर (Leaf Folder), शीथ ब्लाइट और ब्लास्ट जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए संतुलित मात्रा में ही यूरिया का उपयोग करें। यदि रोपाई से पहले जिंक का प्रयोग नहीं किया गया था, तो इस समय जिंक की पूर्ति अवश्य करें। प्रति एकड़ 33% जिंक सल्फेट लगभग 6 किलोग्राम की मात्रा में यूरिया के साथ मिलाकर डाल सकते हैं। जिंक पौधे के अंदर एंजाइम क्रियाओं, कोशिका विभाजन, नई जड़ों के विकास और टिलरिंग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिंक की कमी होने पर पत्तियों पर हल्की पीली धारियां दिखाई देती हैं, पौधे छोटे रह जाते हैं और कल्ले कम निकलते हैं। जिन खेतों में क्षारीय मिट्टी या लगातार धान की खेती होती है, वहां जिंक की कमी अधिक देखने को मिलती है। पोटाश भी टिलरिंग अवस्था में उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि खेत की तैयारी के समय म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) नहीं दिया गया था, तो प्रति एकड़ लगभग 25 किलोग्राम MOP का प्रयोग करें। यदि MOP उपलब्ध न हो, तो पोटाश डिराइव्ड फ्रॉम मोलेसिस (PDM) लगभग 100 किलोग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में दिया जा सकता है। पोटाश पौधों की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है, जल संतुलन बनाए रखता है, प्रकाश संश्लेषण को बेहतर बनाता है और पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। पर्याप्त पोटाश मिलने पर पौधे मजबूत रहते हैं और आगे चलकर बालियां भी अच्छी विकसित होती हैं। खरपतवार नियंत्रण इस अवस्था का एक और महत्वपूर्ण कार्य है। यदि खेत में खरपतवार मौजूद हैं, तो वे यूरिया, जिंक और पोटाश जैसे पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा स्वयं उपयोग कर लेते हैं। इससे धान के पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और टिलरिंग कम हो जाती है। इसलिए रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन के भीतर खरपतवार नियंत्रण अवश्य करें। यदि आवश्यक हो तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार उपयुक्त शाकनाशी का प्रयोग करें या यांत्रिक निराई करें। खरपतवार हटाने के बाद दी गई खाद का पूरा लाभ धान के पौधों को मिलता है। टिलरिंग अवस्था में खेत का नियमित निरीक्षण भी बहुत जरूरी है। यदि पौधों की पत्तियां पीली दिखाई दें, बढ़वार रुक जाए, कल्ले कम निकलें या कीटों का प्रकोप दिखाई दे, तो तुरंत कारण पहचानकर उसका समाधान करें। प्रारंभिक अवस्था में समस्या का समाधान करने से उत्पादन पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है, जबकि देर होने पर नुकसान अधिक हो सकता है। धान की अच्छी टिलरिंग के लिए मिट्टी में जैविक पदार्थ (Organic Matter) भी पर्याप्त होना चाहिए। यदि खेत में गोबर की अच्छी तरह सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट का नियमित प्रयोग किया जाता है, तो मिट्टी की संरचना बेहतर रहती है और पोषक तत्वों का उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से होता है। लंबे समय तक केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए हर सीजन में जैविक खाद का भी उपयोग करें। यदि खेत में कीटों का प्रकोप दिखाई दे, जैसे तना छेदक या लीफ फोल्डर, तो केवल आवश्यकता होने पर ही अनुशंसित कीटनाशकों का प्रयोग करें। बिना आवश्यकता के बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करने से लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाना अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प है। याद रखें कि टिलरिंग के दौरान मजबूत जड़ें, संतुलित पोषण और पर्याप्त ऑक्सीजन ही अधिक उत्पादन की नींव रखते हैं। इस समय यदि खेत में लगातार गहरा पानी भरा रहेगा, पोषक तत्वों की कमी होगी या खरपतवार अधिक होंगे, तो पौधा पर्याप्त कल्ले नहीं बना पाएगा। बाद में बालियां भी कम निकलेंगी और उत्पादन घट जाएगा। यदि रोपाई के 25 से 45 दिन के बीच प्रति एकड़ 45 किलोग्राम यूरिया, 6 किलोग्राम 33% जिंक सल्फेट (यदि पहले न दिया हो), 25 किलोग्राम MOP या 100 किलोग्राम PDM का संतुलित प्रयोग करें, खेत में 2–3 सेंटीमीटर से अधिक पानी न रखें, Alternate Wetting and Drying तकनीक अपनाएं तथा समय पर खरपतवार नियंत्रण करें, तो धान की टिलरिंग में स्पष्ट सुधार दिखाई देगा। मजबूत कल्ले, अधिक बालियां और बेहतर दाना भराव अंततः अधिक उत्पादन और अधिक लाभ का आधार बनते हैं। खेती में सफलता केवल अधिक उर्वरक डालने से नहीं मिलती, बल्कि सही समय पर सही मात्रा और सही तकनीक अपनाने से मिलती है। धान की यह 20 दिन की महत्वपूर्ण अवस्था पूरे सीजन की सफलता तय करती है। यदि किसान इस अवधि में वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाते हैं, तो प्रति एकड़ उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ गुणवत्ता भी बेहतर होती है और खेती अधिक लाभकारी बनती है। #धान_की_खेती #RiceFarming #किसान_सलाह #उन्नत_खेती #Agriculture - Mariahu News