मार्केट में बिक रही यह टी-शर्ट सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक सवाल है।
इस पर लिखा है—
"विधायक, सांसद… लेकिन आंदोलनकारी संस्कारी चाहिए।"
इस एक लाइन के पीछे छिपा सवाल यह है कि जब कोई आंदोलनकारी गुस्से में अभद्र भाषा बोल देता है, तो उससे तुरंत कहा जाता है कि "संस्कारी बनो", "भाषा सुधारो"।
लेकिन दूसरी ओर, कई बार ऐसे प्रभावशाली लोग भी राजनीति में बने रहते हैं या चुनाव लड़ते हैं, जिन पर बलात्कार, हत्या या अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगे होते हैं। ऐसे मामलों में समाज और राजनीति की प्रतिक्रिया उतनी तीखी क्यों नहीं दिखती?
यह पोस्ट किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि हमारे दोहरे मापदंडों पर सवाल उठाती है।
अगर लोकतंत्र में शालीन भाषा ज़रूरी है, तो चरित्र, जवाबदेही और कानून के प्रति समान व्यवहार भी उतना ही ज़रूरी होना चाहिए।
भाषा पर सवाल उठाइए, लेकिन गंभीर आपराधिक आरोपों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाइए।
आख़िर लोकतंत्र में सबसे पहले संस्कार ज़रूरी हैं या चरित्र और कानून के प्रति जवाबदेही?
Bihar, India | Aug 3, 2026