
रावण वध के बाद जश्न नहीं, अंतिम संस्कार की बात! क्या भगवान राम पर लगा था ब्रह्महत्या का दोष? जानिए रावण दहन की परंपरा का रोचक इतिहास
**UT himachal NEWS | विशेष रिपोर्ट**
दशहरे पर हर साल रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। आतिशबाजी होती है और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रावण वध के बाद भगवान श्रीराम ने वास्तव में क्या किया था? क्या उन्होंने जीत का जश्न मनाया था? क्या रावण के ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण श्रीराम पर ब्रह्महत्या का दोष लगा था? और सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि रावण के पुतले जलाने की परंपरा आखिर शुरू कब हुई?
धार्मिक ग्रंथों, पौराणिक मान्यताओं और उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारियों में इन सवालों के ऐसे पहलू मिलते हैं, जो दशहरे की प्रचलित धारणाओं को एक अलग नजरिए से समझने का अवसर देते हैं।
### 1. रावण वध के बाद भगवान राम ने जश्न मनाया या अंतिम संस्कार का आदेश दिया?
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में रावण वध के बाद का एक बेहद महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है। रावण की मृत्यु के बाद उसका भाई विभीषण शोक में डूब जाता है। इसके बाद भगवान श्रीराम उसे रावण का अंतिम संस्कार करने के लिए कहते हैं।
इस प्रसंग में श्रीराम का प्रसिद्ध कथन है—
**“मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव॥”**
इसका भावार्थ है कि मृत्यु के साथ शत्रुता समाप्त हो जाती है। हमारा उद्देश्य पूरा हो चुका है। अब इसका अंतिम संस्कार किया जाए। वह तुम्हारे समान मेरे लिए भी है।
यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि वाल्मीकि रामायण में रावण की मृत्यु के बाद भगवान राम के उल्लासपूर्ण विजयोत्सव का वर्णन नहीं मिलता। इसके बजाय मृत शत्रु के प्रति भी अंतिम संस्कार की मर्यादा निभाने पर जोर दिया गया है।
इस प्रसंग का संदेश: विजय का अर्थ केवल शत्रु को पराजित करना नहीं, बल्कि उसके बाद भी धर्म और मर्यादा का पालन करना है।
### 2. रावण ब्राह्मण था, तो क्या भगवान राम पर ब्रह्महत्या का दोष लगा था?
रामायण की परंपराओं में रावण को ऋषि विश्रवा का पुत्र और महर्षि पुलस्त्य का वंशज बताया गया है। उसे वेदों का ज्ञाता, तपस्वी और भगवान शिव का भक्त भी माना जाता है।
स्कंद पुराण के ब्रह्मखंड के अध्याय 47 में इसी विषय पर सवाल उठाया गया है। इसमें ऋषि पूछते हैं कि रावण का वध करने के कारण भगवान राम पर ब्रह्महत्या का दोष कैसे लगा, जबकि रावण को राक्षस बताया जाता है।
धार्मिक परंपरा में रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा और शिवलिंग की स्थापना की कथा भी रावण वध तथा प्रायश्चित की मान्यता से जुड़ी हुई है। हालांकि, पौराणिक कथा में प्रायश्चित का प्रसंग मिलना और ऐतिहासिक रूप से किसी घटना का प्रमाणित होना दो अलग बातें हैं। भगवान राम पर ब्रह्महत्या का दोष लगने की बात को सभी धार्मिक परंपराओं में समान रूप से स्वीकार किया गया तथ्य नहीं माना जा सकता।
### 3. क्या रावण दहन की परंपरा वाल्मीकि रामायण में मिलती है?
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में रावण की मृत्यु के बाद विभीषण द्वारा उसके अंतिम संस्कार का वर्णन मिलता है। लेकिन इस प्रसंग में विजयादशमी पर रावण का पुतला बनाकर जलाने की परंपरा स्थापित करने का उल्लेख नहीं मिलता।
आज जिस स्वरूप में रावण दहन किया जाता है, वह रामलीला और दशहरा उत्सवों से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है। रावण के पुतले को सबसे पहले कब और किसने जलाया, इस संबंध में निर्णायक ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। रामलीला की परंपरा कई शताब्दियों में विकसित हुई।
### 4. क्या रावण दहन की शुरुआत 1948 में रांची से हुई थी?
एक दावा यह भी है कि वर्ष 1948 में रांची में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने रावण के पुतले जलाने की परंपरा शुरू की थी। लेकिन इस दावे को निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य मानने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आते। इसलिए यह कहना कि पूरे भारत में रावण दहन की शुरुआत निश्चित रूप से 1948 में रांची से ही हुई थी, उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित नहीं होगा।
### 5. दशहरा सिर्फ रावण वध का पर्व नहीं
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में विजयादशमी मनाने की परंपराएं अलग-अलग हैं। उत्तर भारत में यह मुख्य रूप से भगवान राम की रावण पर विजय और रामलीला से जुड़ा है। वहीं पश्चिम बंगाल में यह दुर्गा पूजा के समापन से संबंधित है।
### 6. कहां-कहां नहीं जलाया जाता रावण का पुतला?
भारत में कई जगह ऐसी हैं जहां रावण को बुराई का प्रतीक मानकर नहीं जलाया जाता, बल्कि विद्वान, शिवभक्त, पूर्वज या दामाद के रूप में सम्मान दिया जाता है:
- **बैजनाथ (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश)**: यहां मान्यता है कि रावण ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। स्थानीय लोग मानते हैं कि रावण का पुतला जलाने से शिव नाराज हो सकते हैं, इसलिए यहां दशहरे पर रावण दहन नहीं होता।
- **बिसरख (ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश)**: रावण की जन्मभूमि मानी जाती है। यहां यज्ञ और प्रार्थना होती है, शोक मनाया जाता है।
- **मंदसौर (मध्य प्रदेश)**: मंदोदरी का मायका माना जाता है, इसलिए रावण को दामाद समझकर सम्मान दिया जाता है।
- **रावनग्राम (विदिशा, मध्य प्रदेश)**, **कानपुर का दशानन मंदिर**, **जोधपुर का मंडोर क्षेत्र** और महाराष्ट्र के कुछ आदिवासी इलाकों में भी रावण दहन की परंपरा नहीं है।
### दशहरे पर सबसे बड़ा सवाल
धार्मिक ग्रंथों में रावण वध के बाद भगवान राम द्वारा अंतिम संस्कार की मर्यादा निभाने का प्रसंग एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। वहीं ब्रह्महत्या और प्रायश्चित से जुड़ी पौराणिक कथाएं धर्म, कर्म और उत्तरदायित्व पर विचार करने का अवसर देती हैं।
**आपका क्या विचार है?**
क्या हमें सिर्फ रावण का पुतला जलाना चाहिए या अपने भीतर की बुराइयों (अहंकार, अन्याय, अधर्म) को भी पहचानना चाहिए? रावण के विद्वान और शिवभक्त पहलू को कैसे देखना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें।
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