जिस पत्रकार के सवालों से सत्ता, जिम्मेदार अफ़सर असहज हों, समझिए उसकी पत्रकारिता अभी ज़िंदा है!
पत्रकारिता का मकसद किसी की छवि चमकाना नहीं, बल्कि उन सवालों को सामने लाना है जिनके जवाब जनता जानना चाहती है। जब माइक पर सवालों की जगह सिर्फ़ प्रशंसा सुनाई देने लगे और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें, तो मीडिया को आत्ममंथन ज़रूर करना चाहिए।
इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ता है, जो बिना किसी दबाव के तथ्यों के साथ खड़े रहते हैं, जनता के मुद्दे उठाते हैं और मुश्किल सवाल पूछने से पीछे नहीं हटते।
पत्रकारिता की पहचान किसी नेता, अधिकारी या सत्ता प्रतिष्ठान से नज़दीकी नहीं—उसकी स्वतंत्र सोच, निष्पक्षता और जवाब माँगने के साहस से होती है।
अब सवाल हम सबके सामने है: क्या पत्रकारिता जनता की आवाज़ बनी रहेगी, या सवालों से बचने की संस्कृति का हिस्सा बन जाएगी?
✍️ पोस्टर में दी गई ओंकार सिंह ढिल्लों की बेबाक टिप्पणी पर अपनी राय दें...
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