*“बिकती हुई नौकरियाँ”
खून-पसीना बहा रहा,
देश का हर इक नौजवान,
माँ की चूड़ी बिक रही,
गिरवी पड़ा है खेत-खलिहान।
दिन में किताबों से जंग,
रातों में टूटे असलाल,
फिर भी कुर्सी बेच रहे,
सत्ता के बैठे दलाल।
कहीं पेपर लीक हुआ,
कहीं सौदे की बोली है,
मेहनत आज सड़कों पर,
रिश्वत महलों में डोली है।
जिसने वर्षों तप किया,
वह दर-दर ठोकर खाता,
नोटों वाला रातों-रात,
अफसर बन कुर्सी पाता।
रोता है हर बाप यहाँ,
बेटी का गहना बिकता,
बेटे की उम्मीदों संग,
घर का उजियारा मिटता।
कानून भी चुप बैठा है,
न्याय हुआ लाचार,
ईमानों की चिताओं पर,
सजता भ्रष्टाचार।
कलमों का सौदा करके,
सपनों को मारा जाता,
भारत माँ के सीने पर,
हर दिन खंजर चलता।
हे युवा! अब जाग उठो,
यह समय नहीं चुप रहने का,
मेहनत के अधिकार हेतु,
अन्याय से लड़ने का।
वरना आने वाली नस्लें,
तुमको कायर कह जाएँगी,
बिकती रही जो नौकरियाँ,
इतिहास वही दोहराएंगी।
-राम रतन अवध्या, कोडरमा।