हिमाचल प्रदेश के सेब बागानों में पिछले तीन वर्षों से लगातार बड़े पैमाने पर पत्तों का झड़ना (Massive Leaf Fall) देखने को मिल रहा है। इस वर्ष तो ऊंचाई वाले लगभग सभी सेब क्षेत्रों में भी पतझड़ जैसी स्थिति दिखाई दे रही है। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर समस्या पर न तो बागवानी संगठन खुलकर बोल रहे हैं, न विपक्षी दल, न नौणी विश्वविद्यालय, न बागवानी विभाग और न ही सरकार।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि लगभग ₹5,000 करोड़ की अर्थव्यवस्था चलाने वाला बागवान समाज खुद भी इस मुद्दे पर चुप क्यों है? जो बागवान इस समस्या से सीधे प्रभावित हो रहा है, वह इसके कारणों और समाधान की आवाज उठाने के बजाय दवाइयों की दुकानों के चक्कर काट रहा है और बिना सही सलाह के तरह-तरह की दवाइयों का छिड़काव करके अपने बागों की स्थिति और खराब कर रहा है।
यदि समय रहते इस समस्या के वास्तविक कारणों की पहचान नहीं हुई और बागवानों ने संगठित होकर अपनी आवाज नहीं उठाई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सेब बागवानी का भविष्य गंभीर संकट में पड़ सकता है। मतलब सड़कों पर रुलेगी.....आज जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक संस्थान, बागवानी विभाग, सरकार और स्वयं बागवान मिलकर इस समस्या पर गंभीरता से काम करें, क्योंकि सेब बागवानी हिमाचल की अर्थव्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है।यदि आप इसे और अधिक तीखा, आक्रामक या सोशल मीडिया पोस्ट के अंदाज में चाहते हैं, तो मैं उस शैली में भी तैयार कर सकता हूँ।