#सिंधु #जल #संधि ने छीन ली #कश्मीर की सबसे बड़ी ताकत, अरबों का नुकसान, #पाकिस्तान ने बनाया हथियार
पाकिस्तान अक्सर दोनों देशों के बीच सीमा-पार नदी सहयोग के सफल उदाहरण के तौर पर इस संधि का जिक्र करता है और इस पर गर्व करता है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि सिंधु जल संधि 1960 से इसलिए कायम रहा क्योंकि भारत सद्भावना और उदारता दिखाई।
#इस्लामाबाद #नईदिल्ली पाकिस्तान ने हाल ही में इस्लामाबाद के जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया था। इसका शीर्षक था 'सिंधु जल संधि: शांति और क्षेत्रीय स्थिरता का एक साधन।' इसमें पाकिस्तान ने दुनिया के कुछ देशों के एक्सपर्ट्स को बुलाया था और इस दौरान पाकिस्तान के दर्जन भर से ज्यादा नेताओं ने अलग अलग लहजे में भारत को धमकियां दी। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत 'पानी को हथियार की तरह' इस्तेमाल कर रहा है।
पाकिस्तान ने इस सेमिनार को उसी तरह पेश करने की कोशिश की और अंतर्राष्ट्रीय दखल की मांग की जैसे वो 'परमाणु हथियारों' को टकराव का केन्द्र बनाकर दुनिया को दिखाता है। उसने सिंधु जल संधि को एशिया की स्थिरता और परमाणु टकराव से जोड़ दिया। लेकिन भारत का मानना है कि सिंधु जल संधि भले ही 1960 में हुई थी लेकिन अब यह आज की हाइड्रोलॉजिकल, तकनीकी और सुरक्षा से जुड़ी वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है।
पाकिस्तान की तरफ से भड़काऊ बयान
सिंधु जल को लेकर कार्यक्रम में पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. मुसादिक मलिक ने कहा 'हम उनके (भारत) हाथ काट देंगे।'
पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा कि 'या तो खून बहेगा या पानी'
पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (DG ISPR) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा 'अगर उन्होंने पानी रोका तो हम उनकी सांसें रोक देंगे।'
#भारत के रिसर्चर और जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट इमरान खुर्शिद ने लिखा है कि अहमद शरीफ चौधरी की यह बातें लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिद सईद के पहले के उस बयान से मिलती-जुलती है जिसमें उसने कहा था 'अगर तुम पानी रोकोगे तो खुदा ने चाहा तो हम तुम्हारी सांसें रोक देंगे और फिर इन नदियों में खून बहेगा।' इन बेहद भड़काऊ बयानों ने तनाव को और बढ़ाया है और पाकिस्तान के टकराव वाले रवैये को और मजबूत किया है।
इमरान खुर्शिद नई दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर फॉर पीस स्टडीज (ICPS) में एसोसिएट रिसर्च फेलो हैं। वे इंडिया अमेरिका रिलेशन, इंडो-पैसिफिक स्टडीज़ और साउथ एशियन सिक्योरिटी इशूज के स्पेशलिस्ट हैं। उन्होंने यूरेशियन टाइम्स में लिखा है कि '1960 में साइन की गई और वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता वाली इंडस वॉटर्स ट्रीटी असल में भारत के साथ बहुत गलत रही है।
उन्होंने लिखा है कि ऊपरी नदी किनारे का देश होने के बावजूद भारत को ट्रीटी के तहत पानी का बहुत कम हिस्सा दिया गया था।' इस संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की नदियों को दोनों देशों के बीच बांटा गया। भारत को पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज पर विशेष अधिकार मिले जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकार दिया गया।
भारत को सिंधु जल पर बहुत कम अधिकार कैसे मिला?
इमरान खुर्शिद ने लिखा है कि संधि में पानी का बंटवारा प्रतिशत के हिसाब से स्पष्ट रूप से नहीं किया गया था लेकिन नदियों के औसत सालाना बहाव के आधार पर असल में पाकिस्तान को 6 नदियों वाली सिंधु प्रणाली के पानी का लगभग 80.52 प्रतिशत हिस्सा मिला जबकि भारत को सिर्फ 19.48 प्रतिशत मिला।
इसके अलावा पश्चिमी नदियों पर भारत को सिर्फ सीमित घरेलू, कृषि और गैर-खपत वाले इस्तेमाल की इजाजत है और वह सिर्फ 'रन-ऑफ-द-रिवर' हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बना सकता है जिन पर डिजाइन और उनके ऑपरेशन को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गईं।
उन्होंने लिखा है कि इन पाबंदियों ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विकास की संभावनाओं को काफी सीमित कर दिया है खासकर पनबिजली उत्पादन, पानी के भंडारण, सिंचाई और व्यापक आर्थिक विकास के मामले में।
इसीलिए जम्मू-कश्मीर के #मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सिंधु जल समझौते को 'जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों के लिए सबसे अन्यायपूर्ण दस्तावेज' बताया है। उन्होंने बार-बार कहा है कि समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले इस क्षेत्र के लोगों से कभी सलाह नहीं ली गई और इसने उन्हें अपने जल संसाधनों का पूरा इस्तेमाल करने के मौके से वंचित कर दिया। अगर यह असमान समझौता न होता तो कई परियोजनाएं इन क्षेत्रों की किस्मत पूरी तरह बदल सकती थीं।
पाकिस्तान की आपत्तियों से रूकने वाले प्रोजेक्ट्स
तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट- ये योजना 1980 के दशक की शुरुआत में बनी थी और 1984 में शुरू हुआ था उसे 1987 में सिंधु जल समझौते के तहत पाकिस्तान की आपत्तियों के बाद रोक दिया गया था।
यह प्रोजेक्ट कश्मीर में जल परिवहन को बदल सकती थी जल प्रबंधन में सुधार कर सकती थी और निचले इलाकों में पनबिजली उत्पादन बढ़ा सकती थी। बाढ़ को भी इससे मैनेज किया जा सकता था।
#किशनगंगा #हाइड्रोइलेक्ट्रिक #प्रोजेक्ट इसे रोकने के लिए पाकिस्तान ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। उसने 2006 में इस प्रोजेक्ट के डिजाइन पर आपत्ति जताई और 2010 में हेग स्थित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (CoA) में मामला ले गया। 2011 में भारत को इस प्रोजेक्ट का काम रोकना पड़ा। फिर 2013 में कोर्ट ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया जिसके बाद काम दोबारा शुरू हुआ और यह प्रोजेक्ट 2018 में चालू हो सका
#रातले #हाइड्रोइलेक्ट्रिक #प्रोजेक्ट निर्माण में भारी देरी- चिनाब नदी पर बन रहे इस प्रोजेक्ट को भी पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय विवादों में उलझा कर रखा। पाकिस्तान ने इसके 'स्पिलवे' और पानी भंडारण की क्षमता के डिजाइन पर गंभीर तकनीकी आपत्तियां उठाईं। इसके चलते निजी डेवलपर्स (GVK ग्रुप) ने हाथ पीछे खींच लिए और प्रोजेक्ट पूरी तरह ठप हो गया था। हालांकि अब सरकार ने खुद जिम्मेदारी लेकर इसका काम तेज किया है।
इसके अलावा भी #बगलीहार #हाइड्रोप्रोजेक्ट #सलाल #डैम #प्रोजेक्ट #पाकल डुल, लोअर कलनाई और कीरू प्रोजेक्ट्स को भी पाकिस्तान वर्षों तक आपत्तियों के जरिए लटकाता रहा। लेकिन अब भारत ने पाकिस्तान की तरफ से होने वाले आतंकी हमलों से सिंधु जल संधि को साफ तौर पर जोड़ दिया है।
इमरान खुर्शिद ने लिखा है कि पाकिस्तान अक्सर दोनों देशों के बीच सीमा-पार नदी सहयोग के सफल उदाहरण के तौर पर इस संधि का जिक्र करता है और अक्सर इस पर गर्व करता है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि सिंधु जल संधि 1960 से इसलिए कायम है क्योंकि भारत ने ऊपरी तटवर्ती देश होने के नाते सद्भावना और उदारता दिखाई है। लेकिन अब सोचिए अगर पाकिस्तान ऊपरी तटवर्ती देश होता? यह यकीन करना मुश्किल है कि उसने शुरू से ही अपनी ऊपरी स्थिति का फायदा नहीं उठाया होता और संधि का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के हथियार के तौर पर नहीं किया होता।
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Lormi, Mungeli | Jul 6, 2026