कटनी ग्रामीण: रीठी रेलवे स्टेशन पर दिखा बचपन का संघर्ष, नन्हे हाथों में बेलन, परिवार की जिम्मेदारी
पढ़ाई-लिखाई की उम्र, सपनों को संवारने का समय… लेकिन जब हालात साथ न दें, तो वही मासूम हाथ जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही हकीकत से रूबरू कराएंगे, जहां बचपन खेल-कूद और किताबों में नहीं, बल्कि चूल्हे-चौके में सिमट कर रह गया है।