यह केजरीवाल जी के पंजाब में किसानों और कर्मचारियों की दुर्दशा बताई जा रही है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर इस देश को मोदी ने समझाया है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को दबाने का अधिकार किसी सरकार को नहीं है।
जो आम आदमी पार्टी कभी सड़कों पर संघर्ष और आंदोलनों की राजनीति का चेहरा बनकर उभरी थी, आज वही किसानों और कर्मचारियों की आवाज़ का जवाब वॉटर कैनन, आँसू गैस और लाठीचार्ज से दे रही है।
यदि अपनी ही जनता की मांगें सुनने का धैर्य सरकार में नहीं बचा, तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क क्या रह गया?
सरकारों की पहचान इस बात से होती है कि वे विरोध का सामना कैसे करती हैं ?
संवाद से या बल प्रयोग से। लोकतंत्र में असहमति को कुचलना नहीं, सुनना और समाधान निकालना सरकार का कर्तव्य है।
यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग हुआ है, तो सरकार को इसकी जवाबदेही तय करनी चाहिए और स्पष्ट करना चाहिए कि बातचीत के सभी रास्ते क्यों और कैसे समाप्त हो गए।
लोकतंत्र में डंडा नहीं, संवाद चलना चाहिए।
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