
कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर के पन्नों पर दर्ज नहीं होतीं, वे इंसान की रूह पर हमेशा के लिए लिखी जाती हैं। 9 जुलाई 2022 मेरे जीवन की ऐसी ही एक तारीख है। यह वह दिन है, जब मेरी मां अचानक हार्ट अटैक के कारण हमें छोड़कर गोलोकवासी हो गईं। उस दिन सिर्फ मेरी मां नहीं गईं, बल्कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी ताकत, सबसे सुरक्षित छांव और सबसे सच्ची दोस्त भी चली गई।
मां के रहते कभी एहसास ही नहीं हुआ कि उनके होने का मतलब क्या होता है। आज सब कुछ है—अपना परिवार है, बच्चे हैं, घर है, काम है, सम्मान है—लेकिन फिर भी लगता है कि सब कुछ अधूरा है। क्योंकि जिस घर में मां नहीं होती, वह घर नहीं, सिर्फ ईंट-पत्थरों का मकान रह जाता है।
बचपन से लेकर बड़े होने तक मां ने मुझे सबसे ज्यादा डांटा, सबसे ज्यादा रोका-टोका। उस समय उनकी हर बात मुझे बंधन लगती थी। कई बार मन में शिकायत भी होती थी कि आखिर मां मुझे ही इतना क्यों डांटती हैं? छोटे भाई-बहनों को तो इतना कुछ नहीं कहतीं। मुझे लगता था कि शायद मां मुझे सबसे कम प्यार करती हैं।
लेकिन मां के जाने के बाद जिंदगी ने सबसे बड़ा सच सिखाया—जिसे मां सबसे ज्यादा डांटती है, उसे ही सबसे ज्यादा चाहती भी है। उनकी हर डांट में मेरा भविष्य छिपा था, हर रोक-टोक में मेरी सुरक्षा और हर फटकार में मेरा भला।
जब भी मुझसे कोई गलती होती, पिताजी मुझे कम और मां को ज्यादा डांटते थे। अक्सर कहते थे, "तुमने ही विनीत को बिगाड़ दिया है।" मां मुस्कुरा देती थीं, लेकिन कभी मुझे अकेला नहीं पड़ने दिया। आज न कोई मेरी शिकायत करता है, न कोई मेरी तरफदारी करने वाला है। आज समझ आता है कि मां होना कितना बड़ा सौभाग्य होता है।
आज भी कई बार घर लौटते समय अनायास मन करता है कि मां दरवाजे पर खड़ी मिल जाएं और वही पुराना सवाल पूछें—"खाना खाया या नहीं?" आज भी मन चाहता है कि कोई डांट दे, कोई पूछे कि इतनी देर क्यों हो गई। लेकिन अब घर में सन्नाटा है, आवाजें नहीं।
मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मेरे दोनों बड़े बेटों को अपनी दादी का प्यार मिला। उन्होंने उन्हें गोद में खिलाया, दुलारा और अपना आशीर्वाद दिया। यह मेरे बच्चों की सबसे बड़ी पूंजी है। काश, मेरी मां आज मेरे सबसे छोटे बेटे को भी अपनी गोद में उठा पातीं...
शायद यही जिंदगी का सबसे बड़ा अफसोस रहेगा कि जब मां थीं, तब उनकी बहुत-सी छोटी-छोटी इच्छाओं को उतनी अहमियत नहीं दी, जितनी देनी चाहिए थी। आज वही बातें निभाते हुए हर कदम पर उनकी याद आती है। तब समझ आता है कि मां जो कहती थीं, वह अपने लिए नहीं, हमारे कल के लिए कहती थीं।
मां के जाने के बाद घर की रौनक जैसे कहीं खो गई। रसोई से आती उनकी आवाज, सुबह की पुकार, शाम की चिंता, त्योहारों की तैयारी, बिना कहे हमारी पसंद का खाना बनाना... सब कुछ यादों में सिमट गया। सच कहूं तो मां के जाने के बाद मैंने जाना कि घर की असली धड़कन मां होती है।
फिर वक्त ने एक नई खुशी भी दी। 27 अप्रैल 2026 को हमारे घर एक नन्हे मेहमान का जन्म हुआ और 22 जून 2026 को जब उसने पहली बार हमारे घर की चौखट पार की, तो लगा जैसे वर्षों बाद घर में फिर से मुस्कुराहट लौट आई हो। उसकी किलकारियों ने घर की खामोशी को तोड़ा। उसकी मासूम मुस्कान में मुझे मां की दुआएं दिखाई देती हैं।
मेरे प्यारे शेर, जुग-जुग जियो। तुम्हारी हर हंसी में मुझे अपनी मां का आशीर्वाद महसूस होता है। मुझे पूरा विश्वास है कि जहां भी मां होंगी, तुम्हें देखकर मुस्कुरा रही होंगी और हमेशा की तरह हम सबके लिए ईश्वर से दुआ कर रही होंगी।
आज मां को गए चार साल हो गए, लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब उनकी याद न आई हो। जिंदगी आगे बढ़ गई, लेकिन मां की जगह कभी कोई नहीं ले पाया।
मां... लोग कहते हैं कि वक्त सब कुछ बदल देता है, लेकिन आज भी मेरी हर खुशी आपको ढूंढती है और हर दुख में सबसे पहले आपकी ही याद आती है।
अगर इस दुनिया में एक बार फिर किसी की गोद में सिर रखकर सुकून से रोने का मौका मिले, तो मैं सिर्फ अपनी मां की गोद चुनूंगा।
मां, आप कहीं नहीं गईं... आप आज भी मेरी हर धड़कन, हर दुआ और हर सांस में ज़िंदा हैं।
ॐ शांति। 🙏🌹