
➡️*सरसों उत्पादन की उन्नत तकनीकी विधियाँ*
हनुमानगढ़, 23 सितम्बर। कृषि विभाग द्वारा जारी सरसों उत्पादन की उन्नत तकनीकी विधियाँ और सलाह।
*1. किस्में ——*
(अ) सिंचित क्षेत्र के लिए किस्में:
RH-1975, RH-0749, RH-1706, RGN-73, RGN-13, लक्ष्मी (RH-8812)
(ब) असिंचित क्षेत्र के लिए किस्में:
RH-1424, RH-725, RH-761
(स) सेम-ग्रस्त क्षेत्र के लिए किस्में:
CS-58, CS-60, CS-62
*RH-1975 की विशेषताएँ:*
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा सिंचित क्षेत्र हेतु विकसित यह किस्म लगभग 140-143 दिनों में पककर अनुकूल परिस्थितियों में औसतन 26-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार देने की क्षमता रखती है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 39.3 प्रतिशत तक होती है।
*RH-1424 की विशेषताएँ:*
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा असिंचित क्षेत्र (बारानी) हेतु विकसित यह किस्म लगभग 139 दिनों में पककर अनुकूल परिस्थितियों में औसतन 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार देने की क्षमता रखती है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 40.5 प्रतिशत तक होती है।
*RH-725 की विशेषताएँ:*
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा असिंचित क्षेत्र (बारानी) हेतु विकसित यह किस्म लगभग 141 दिनों में पककर अनुकूल परिस्थितियों में औसतन 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार देने की क्षमता रखती है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 40.2 प्रतिशत तक होती है।
*RH-761 की विशेषताएँ:*
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा असिंचित क्षेत्र (बारानी) हेतु विकसित यह किस्म लगभग 141 दिनों में पककर अनुकूल परिस्थितियों में औसतन 23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार देने की क्षमता रखती है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 40.4 प्रतिशत तक होती है।
*2. बिजाई का समय——*
बिजाई का उचित समय 5 अक्टूबर से 20 अक्टूबर है, परंतु सरसों की बिजाई पूरे अक्टूबर माह में की जा सकती है। देरी से बिजाई करने की अंतिम अवधि 10 नवंबर तक है। इसके बाद बिजाई करने पर उपज में निरंतर कमी आती जाती है।
*3. बीज एवं बिजाई ——*
बीज की मात्रा 600-700 ग्राम प्रति बीघा रखें तथा खुड से खुड की दूरी 45 सेंटीमीटर रखें।
*4. बीजोपचार ——*
सफेद रोली से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व बीज को मेटालेक्सिल 35 एसडी की 6 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज तथा पेंटेड बग की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें।
➡️*5. खाद एवं उर्वरक ——*
क्र.सं.| उर्वरक| मात्रा प्रति बीघा
1.| गोबर की खाद| 40 क्विंटल
2.| एसएसपी/सिंगल सुपर फास्फेट| 62.5 किलोग्राम
3.| यूरिया| 40 किलोग्राम
4.| जिप्सम| 75 किलोग्राम
नोट: सरसों की फसल में फास्फेटिक उर्वरक के रूप में सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग तुलनात्मक रूप से लाभप्रद है। गोबर की खाद, सुपर फास्फेट, जिप्सम की संपूर्ण मात्रा तथा 20 किलोग्राम यूरिया बिजाई से पूर्व प्रयोग करनी चाहिए। इसके लिए यूरिया तथा जिप्सम का बिजाई से पूर्व छिड़काव करें। सुपर फास्फेट की डबल टापा मशीन (सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल) से ड्रिल करें। यदि डबल टापा मशीन उपलब्ध नहीं है तो गेहूं बिजाई मशीन से सुपर फास्फेट की बिजाई करें। सुपर फास्फेट का छिड़काव नहीं करें, क्योंकि छिड़काव करने से इसका बहुत कम असर होता है। यूरिया की शेष मात्रा प्रथम सिंचाई के समय देनी चाहिए।
सिंगल सुपर फास्फेट एक फास्फोरसयुक्त उर्वरक है, जिसमें 16 प्रतिशत फास्फोरस, 11 प्रतिशत सल्फर तथा 21 प्रतिशत कैल्शियम की मात्रा पाई जाती है। इसमें उपलब्ध सल्फर के कारण यह उर्वरक तिलहनी फसलों के लिए अन्य उर्वरकों की अपेक्षा अधिक लाभदायक होता है।
डीएपी से पौधों को केवल दो पोषक तत्व—फास्फोरस एवं नत्रजन—प्राप्त होते हैं, जबकि सिंगल सुपर फास्फेट से पौधों को फास्फोरस के साथ-साथ सल्फर एवं कैल्शियम पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं। सिंगल सुपर फास्फेट के उपयोग से पौधों की वृद्धि के साथ-साथ जड़ों का विकास भी उत्तम होता है।
सिंगल सुपर फास्फेट में उपलब्ध सल्फर सरसों जैसी तिलहनी फसलों में तेल की गुणवत्ता और मात्रा में वृद्धि करता है। यह क्षारीय मिट्टी, जहां पीएच मान 8 से अधिक होता है, में सल्फर के माध्यम से पीएच को नियंत्रित करने में सहायक होता है। मिट्टी का पीएच सुधरने पर डीएपी और जिंक जैसे तत्व पौधों को आसानी से उपलब्ध होने लगते हैं। यह मिट्टी और पौधों में प्राकृतिक फफूंदनाशक के रूप में भी काम करता है।
सिंगल सुपर फास्फेट में उपलब्ध कैल्शियम पौधों की कोशिकाओं को मजबूत बनाता है। यह मिट्टी के कणों को आपस में बांधकर रखता है, जिससे हवा और पानी का संचार ठीक रहता है। यह पौधों की जड़ों के सामान्य विकास और उनकी लंबाई बढ़ाने में भी सहायता करता है। इसके साथ ही यह अत्यधिक अम्लीय मिट्टी के पीएच स्तर को सुधारने में सहायक होता है।
➡️*6. खरपतवार नियंत्रण ——*
फसल की बुवाई के तुरंत बाद पेंडीमेथालिन 38.7 प्रतिशत सीएस की 485 मिलीलीटर अथवा पेंडीमेथालिन 30 प्रतिशत की 600 मिलीलीटर मात्रा 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति बीघा की दर से जमीन पर स्प्रे करें।
अथवा उपरोक्त मात्रा को रोणी करने के बाद अंतिम जुताई से पहले जमीन पर स्प्रे कर पाटा लगाकर बिजाई करें। सिंचाई के बाद एक-दो बार गुड़ाई अवश्य करें।
➡️*7. पौधों की छंटाई/विरलीकरण ——*
आवश्यकता से अधिक पौधों की छंटाई अवश्य करें, जिससे फसल में वायु संचार एवं सूर्य की रोशनी पौधों के बीच पहुंच सके। उपज बढ़ाने एवं सरसों के तना गलन रोग के नियंत्रण के लिए पौधों की छंटाई करना जरूरी है।
छंटाई प्रथम सिंचाई से पूर्व या उसके बाद की जा सकती है। छंटाई करके पौधे से पौधे की दूरी आधा फीट रखें।
➡️*8. सिंचाई ——*
तीन सिंचाई उपलब्ध होने पर:
1. पहली सिंचाई—बुवाई के 35-40 दिन बाद (बढ़वार के समय)।
2. दूसरी सिंचाई—प्रथम सिंचाई के 35-40 दिन बाद (फूल आने के समय)।
3. तीसरी सिंचाई—दूसरी सिंचाई के 30-35 दिन बाद (फलियां बनने की शुरुआत पर)।
दो सिंचाई उपलब्ध होने पर/पानी की कमी होने पर:
1. पहली सिंचाई—बुवाई के 40-45 दिन बाद।
2. दूसरी सिंचाई—बुवाई के 90-100 दिन बाद।
भारी मिट्टी वाली जमीनों में दो से अधिक सिंचाई न करें, क्योंकि अधिक पानी देने से तना गलन रोग का प्रकोप बढ़ता है।
➡️*9. कीट नियंत्रण ——*
पेंटेड बग — इसके नियंत्रण हेतु 125 मिलीलीटर मैलाथियॉन 50 ईसी को 125 लीटर पानी में मिलाकर प्रति बीघा स्प्रे करें।
लीफ माइनर तथा काला तैला — इनके नियंत्रण हेतु 100 लीटर पानी में निम्नलिखित कीटनाशकों में से किसी एक को मिलाकर स्प्रे करें—
डाइमेथोएट — 30 ईसी| 250 मिलीलीटर
क्विनालफॉस — 25 ईसी| 250 मिलीलीटर
मैलाथियॉन — 50 ईसी| 300 मिलीलीटर
थायोमेथोक्साम — 25 डब्ल्यूजी| 50 ग्राम
➡️*10. रोग नियंत्रण ——*
सफेद रोली/व्हाइट रस्ट — फसल की बुवाई के 50-60 दिन बाद 200 ग्राम मेटालेक्सिल को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। इसके 15 दिन बाद मेटालेक्सिल 4 प्रतिशत + मैनकोजेब 64 प्रतिशत की 200 ग्राम मात्रा 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
रोग के मामूली प्रथम लक्षण दिखाई देते ही निर्धारित समय पर उपरोक्त स्प्रे करें। अन्यथा देरी से स्प्रे करने पर रोग का नियंत्रण करना संभव नहीं होगा।
झुलसा/ब्लाइट — इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही 200 ग्राम मैनकोजेब 75 डब्ल्यूपी को 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। आवश्यकता अनुसार 10-12 दिन बाद दूसरा स्प्रे करें।
➡️*11. तना गलन ——*
सरसों का तना गलन रोग फंगस से उत्पन्न होने वाला एक गंभीर रोग है, जिससे फसल को भारी नुकसान हो सकता है। इस रोग के लक्षण जनवरी माह में दिखाई देते हैं।
➡️इस रोग में शुरुआत में तने के निचले भाग पर जलासिक्त लंबे धब्बे बनते हैं। बाद में इन धब्बों पर रूई जैसी सफेद रंग की संरचना बन जाती है। यह रूई जैसी संरचना इस रोग की फंगस होती है। इस अवस्था में तने दूर से सफेद दिखाई देते हैं।
➡️इस बीमारी से प्रभावित पौधों की लंबाई स्वस्थ पौधों से थोड़ी कम हो जाती है तथा पौधे मुरझाने लगते हैं और समय से पूर्व पक जाते हैं। अंत में तने फटने के कारण टूट जाते हैं और पौधे मुरझाकर सूख जाते हैं।
➡️तनों की सतह पर तथा तनों के अंदर भूरे-काले रंग की सरसों के दाने जैसी आकृतियां दिखाई देती हैं, जो इस फंगस के बीजाणु होते हैं। फसल की कटाई के बाद फंगस के ये बीजाणु जमीन पर गिर जाते हैं तथा पौधों के तनों व शाखाओं में पड़े रहते हैं, जो भूमि की जुताई करते समय मिट्टी में मिल जाते हैं।
➡️इस रोग के बीजाणु जमीन में 7 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं तथा जैसे ही अनुकूल वातावरण मिलता है, फसल पर संक्रमण कर देते हैं। ये बीजाणु थ्रेसर से फसल निकालते समय बीज में भी मिल जाते हैं, जिसके कारण यह बीमारी नए क्षेत्रों में फैलती है।
➡️इस प्रकार यह बीमारी बीज के साथ मिले बीजाणुओं, जमीन में पड़े बीजाणुओं तथा पौधों के तनों व डंठलों में पड़े बीजाणुओं के कारण फैलती है।
➡️*तना गलन का नियंत्रण*
➡️*ट्राइकोडर्मा द्वारा भूमि उपचार —* जिन खेतों में सरसों की फसल में पिछले वर्षों में तना गलन का प्रकोप रहा है, उनमें जमीन में पड़े हुए फंगस के बीजाणुओं को नष्ट करने हेतु ट्राइकोडर्मा द्वारा भूमि उपचार अवश्य करना चाहिए।
➡️जमीन में पड़े हुए फंगस के इन हानिकारक बीजाणुओं को नष्ट किए बिना बिजाई के बाद इस बीमारी का नियंत्रण करना आसान नहीं है। जिन खेतों में गत वर्षों में तना गलन का प्रकोप नहीं रहा है, उनमें भी सावधानी के तौर पर ट्राइकोडर्मा द्वारा भूमि उपचार किया जा सकता है।
➡️ट्राइकोडर्मा एक प्रकार की लाभदायक फंगस है, जो रोग पैदा करने वाली हानिकारक फंगस की वृद्धि को रोककर उसे धीरे-धीरे नष्ट कर देती है, जिससे हानिकारक फंगस पौधों की जड़ों को संक्रमित कर रोग उत्पन्न करने में असमर्थ हो जाती है।
➡️भूमि उपचार की विधि ट्राइकोडर्मा जीवित फंगस होने के कारण इसे गोबर की खाद में मिलाकर ही प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि जैविक कार्बन इसका भोजन होता है। यदि इसे जैविक खाद में मिलाए बिना सीधे ही भूमि में मिलाया जाता है तो इसका कोई फायदा नहीं होगा।
➡️अतः ट्राइकोडर्मा विरिडी की 2.5 किलोग्राम मात्रा को 50-100 किलोग्राम सड़ी-गली नमीयुक्त गोबर की खाद में मिलाकर 15-45 दिन तक छाया में रखें।
➡️गोबर की 2 फुट चौड़ी तथा 2 फुट ऊंची और आवश्यकतानुसार लंबी त्रिकोणीय आकार की ढेरी बनाएं तथा नमी कायम रखने हेतु 5-7 दिनों में पानी का छिड़काव करते रहें। ढेरी छाया में बनाएं तथा बोरी/तिरपाल से ढककर रखें।
➡️गोबर की खाद को मुट्ठी में लेकर दबाने से अंगुलियों के बीच पानी आ जाए, परंतु बूंद न बने, इतनी नमी कायम रखनी चाहिए। अच्छी तरह सड़ी-गली खाद उपलब्ध न हो तो वर्मी-कम्पोस्ट का उपयोग भी किया जा सकता है।
➡️इस प्रकार गोबर की खाद में मिलाकर तैयार किए गए ट्राइकोडर्मा की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति बीघा भूमि में बिजाई से पूर्व मिलाएं।
➡️*संतुलित उर्वरक —* नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, जिंक सल्फेट तथा सल्फर वाले समस्त उर्वरकों का उपयोग उपरोक्त सिफारिश के अनुसार करें।
➡️*स्वस्थ बीजों का प्रयोग —* बुवाई हेतु स्वस्थ, स्वच्छ, रोगरहित (बीजाणुरहित) प्रमाणित बीजों का प्रयोग करें।
➡️*खुड से खुड की दूरी —* जिन खेतों में गत वर्षों में लगातार तना गलन रोग का प्रकोप हो रहा है, वहां खुड से खुड की दूरी 45 सेंटीमीटर (1.5 फुट) रखें।
➡️*विरलीकरण —* अधिक मात्रा में बीज का प्रयोग न करें तथा आवश्यकता से अधिक पौधों की छंटाई अवश्य करें, ताकि पौधे से पौधे की उचित दूरी बनी रहे एवं उनके मध्य वायु तथा रोशनी का संचार हो सके।
➡️*सिंचाई —* अधिक सिंचाई करने के कारण जमीन में नमी अधिक बनी रहती है, जो बीमारी फैलने में सहायक है। भारी मिट्टी में दो तथा रेतीली मिट्टी में तीन से अधिक सिंचाई न करें।
➡️*फफूंदनाशी स्प्रे —* कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यूपी की 2 ग्राम मात्रा अथवा प्रोपीकोनाजोल 25 ईसी की 1 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से मिलाकर बिजाई के 50-55 दिन बाद प्रथम स्प्रे तथा 65-70 दिन बाद दूसरी स्प्रे करें। आवश्यकता पड़ने पर तीसरी स्प्रे भी करनी चाहिए।
➡️रोग के लक्षण दिखाई देने के बाद स्प्रे करने से रोग का नियंत्रण करना संभव नहीं है।
➡️*सूखा प्रबंधन —* बारानी सरसों को पकने के समय सूखे के प्रकोप से बचाने हेतु 100 लीटर पानी में 1 किलोग्राम 13-00-45 उर्वरक घोलकर फसल की फूल एवं फली वाली अवस्था पर एक-एक स्प्रे करें।