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Nainital Mania

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Nainital में सबसे पहले चर्च St. John's in the Wilderness Church की एक अनोखी कहानी, जिसे आपने जरूर जानना चाहिए ✅

साल 23 February 1844 में Bishop Daniel Wilson (1778) जो Bishop of Calcutta थे, वे नैनीताल आए थे। उस समय नैनीताल आज जैसा विकसित शहर नहीं था, बल्कि चारों ओर घने जंगल और पहाड़ों से घिरा एक छोटा सा hill station था। 

वे नैनीताल में अंग्रेजो के लिए एक Anglican Church स्थापित करना चाहते थे क्योकि उन्हें 1843 में पता चल गया था कि नैनीताल अंग्रेजी शहर बनने वाला है इसीलिए चर्च की सबसे पहले स्थापना करने वो नैनीताल पहुंचे। उनका नैनीताल पहुंचना बड़ा मुश्किलों भरा था क्योकि नैनीताल में तब इतना घना जंगल हुआ करता था कि वहाँ पहुंचना ही बहुत कठिन था, ऊँचे पहाड़ो में चढ़कर जाना पड़ता था, कई जगह घनी झाड़िया थी, कोई रास्ता नहीं था और जंगली जानवर दिन दहाड़े ही दिख जाया करते थे. 

जब वो 1843 में नैनीताल पहुंचे तो यहाँ सिर्फ 7 घर बने थे उनमे भी कुछ under construction थे, इसीलिए उन्होंने कई दिन टूटी-फूटी झोपड़ी में बिताये, कड़ाके की ठंड और कठिन परिस्थितियों के कारण उनकी तबियत भी खराब हो गई, तब उनकी उम्र 65-66 वर्ष की थी मतलब वो बूढ़े इंसान थे.

उन्होंने नैनीताल में चर्च बनाने के लिए John Hallet Batten (Assistant Kumaon Comissioner) से नैनीताल में जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव रखा, जहाँ John Hallet Batten ने उनका प्रस्ताव संज्ञान में लेते हुए उन्हें सूखाताल स्थित जगह दे दी जहाँ वो चर्च बना सके. 

St. John in the Wilderness Church के architect को बनाने का श्रेय Executive Engineer Captain Young को दिया जाता है, इसके बाद 13 October 1846 में चर्च की नींव का cornerstone रखा गया और 2 April 1848 को चर्च बनकर तैयार हुआ...इस चर्च के निर्माण में 15,000 रुपए का खर्चा आया था...इस चर्च का नाम St. John in the Wilderness रखा गया जिसका अर्थ “घने जंगल में स्थित ईश्वर का घर”, क्योंकि उस दौर का नैनीताल घने जंगलों से घिरा हुआ था और St. John in the Wilderness Church ही नैनीताल में बना सबसे पहला चर्च था. 1855 के आसपास चर्च के clock tower में घंटा भी लगाया गया ताकि घंटे की आवाज़ सुनकर लोग प्रार्थना करने आ सके. 

इसके बाद  Bishop Daniel कुछ दिनों नैनीताल रहे और वापिस कलकत्ता चले गए....1864 में चर्च के दोनों सिरों पर stained-glass windows भी लगाए गए।

1880 के बाद St. John in the Wilderness Church को काफी हद तक enlarged किया क्योकि 1880 में इतना खतरनाक भूस्खलन आया था.
आज Nainital में जहाँ Boat House Club है, वहाँ Perambar Baba की एक धर्मशाला हुआ करती थी, तब नैनीताल में साधु-संतों का बसेरा हुआ करता था ✅:

दोस्तों जब नैनीताल बिल्कुल नया था अर्थात 1839-1840 के मध्य तब यहाँ Perambar Baba नाम से एक साधु रहा करते थे, उस जमाने में उनकी मल्लीताल झील के किनारे एक झोपड़ी (Makeshift Hut) हुआ करती थी जहाँ वो ध्यान और तपस्या किया करते थे. 

उसके बाद उन्होंने अंग्रेजो की मदद से 1840 में एक धर्मशाला का निर्माण करवाया ताकि जो भी तीर्थयात्री नैनीताल आये वो उनकी धर्मशाला में रुके सके.

इनकी धर्मशाला पुराने नैनादेवी मंदिर के ठीक बगल में थी, तब तीर्थयात्री नयनादेवी मंदिर में पूजा करके Perambar Baba Dharamshala में रुकते थे और अगले दिन अपनी यात्रा पर आगे निकल जाते थे ....यानी आज जिस नैनीताल को हम एक पर्यटन नगरी के रूप में जानते हैं, उसके शुरुआती दौर में यहाँ तीर्थयात्रियों और साधु-संतों की भी एक अलग दुनिया बसती थी।

1906 में लिखी हुई एक किताब "Guide to Naini Tal and Kumaun" के अनुसार 1840 में “Perambar Baba” जिन्हें एक venerable fakir कहा गया है जिससे जिससे पता चलता है कि वे एक वृद्ध बाबा थे और उनकी पैदाइस 1770  के आसपास की रही होगी।

18 सितम्बर 1880 में नैनीताल की आल्मा पहाड़ी में एक बड़ा भूस्खलन आया जिसने पुराने नैनादेवी मंदिर समेत Perambar Baba की धर्मशाला को भी मिट्टी में ढेर कर दिया और इसके अलावा Victoria Hotel, Bell Shop और Boat House Club समेत कई ऐतिहासिक buildings हमेशा के लिए इतिहास बन गयी.

दोस्तों, 1840 से लेकर 1950 तक नैनीताल बहुत धार्मिक जगह थी जहाँ कई साधु-संत माँ नयनादेवी के मंदिर आते थे और वही रुकते थे, वहीँ कुछ नैनीताल की अन्य धर्मशालाओ में शरण लेते थे...आज जब हम नैनीताल की The Mall, झील, Flats और Boat House को देखते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि इन्हीं जगहों पर कभी साधु-संतों की कुटिया, तीर्थयात्रियों की धर्मशालाएँ और माँ नयना देवी की आराधना से जुड़ी एक पुरानी धार्मिक दुनिया मौजूद थी।

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Perambar Baba Dharamshala, Perambar Baba Nainital History, Perambar Baba, Perembar Baba Nainital, Nainital History, Nainital Old History, Old Nainital, Where was Perambar Baba's Dharamshala located, <nis:link nis:type=tag nis:id=perambarbaba nis:value=PerambarBaba nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=perambarbabanainital nis:value=PerambarBabaNainital nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=nainital nis:value=Nainital nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=nainitalhistory nis:value=NainitalHistory nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=oldnainitalnainadevitemple nis:value=OldNainitalNainaDeviTemple nis:enabled=true nis:link/> NainaDevi OldNainaDeviTemple, Perembar baba

Old Naina Devi
अंग्रेजों के जमाने का है भवाली | कभी था घना जंगल फिर अंग्रेजों ने ऐसे बसाया यह शहर | Bhowali History ✅

Nainital, Bhimtal, Bhowali और Mukteshwar का इतिहास काफी पुराना है। कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास में चंद राजाओं के दौर में चंपावत और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन आधुनिक समय में इन पहाड़ी क्षेत्रों की योजनाबद्ध बसावट और विकास में ब्रिटिश शासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कहा जाता है कि 1870 से पहले भवाली का क्षेत्र मुख्य रूप से घने जंगलों से घिरा हुआ था। ब्रिटिश शासन के दौरान इस क्षेत्र की प्राकृतिक जलवायु और ऊंचाई को देखते हुए इसे स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त माना गया और धीरे-धीरे यहां सड़क और अन्य सुविधाओं का विकास शुरू हुआ। नैनीताल से भवाली को जोड़ने वाला मार्ग भी इसी दौर में विकसित हुआ।

भवाली की आधुनिक बसावट के प्रमाण हमें 19वीं सदी के उत्तरार्ध से मिलने लगते हैं। ब्रिटिश काल में यहां कई इमारतों और संस्थानों का निर्माण हुआ, जिनमें से कुछ ऐतिहासिक इमारतें आज भी भवाली की पुरानी विरासत की याद दिलाती हैं।

फिर आया 1912 का दौर, जब भवाली में TB Sanatorium की स्थापना ने इस छोटे से पहाड़ी क्षेत्र को एक नई पहचान दी। यहां की स्वच्छ हवा और अनुकूल जलवायु को देखते हुए भवाली को टीबी के मरीजों के उपचार के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनाया गया। इसके आसपास ब्रिटिश काल की कई इमारतें और संस्थान विकसित हुए।

भवाली की पुरानी इमारतों में G.B. Pant Inter College, Bhowali की ऐतिहासिक इमारत भी ब्रिटिश काल की वास्तुकला की झलक देती है....आज का भवाली अचानक नहीं बना। 1960 और 1970 के दशक में यहां विकास की गति बढ़ी, सड़कें, बाजार और आवासीय क्षेत्र विस्तार लेने लगे। वर्ष 2000 के आसपास भवाली एक महत्वपूर्ण पहाड़ी कस्बे के रूप में अपनी पहचान बना चुका था।

और आज, 2026 के दशक में भवाली तेजी से विकसित होता हुआ एक प्रमुख पर्यटन और व्यापारिक केंद्र बन चुका है...यानी जिस भवाली को आज हम बाजार, सड़क, होटल और भीड़भाड़ वाले शहर के रूप में देखते हैं, उसके पीछे 150 साल से ज्यादा पुरानी बसावट और ब्रिटिशकालीन इतिहास की एक दिलचस्प कहानी छिपी हुई है। 

भवाली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि कुमाऊँ के बदलते इतिहास का एक जीवित अध्याय है।

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जब 1950 में नीमकरोली बाबा का पहली बार नैनीताल में आवागमन हुआ और नैनीताल के Hanuman Garhi का डर खत्म हुआ ✅:

दोस्तों नैनीताल सिर्फ अंग्रेजो का शहर था लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद नैनीताल की कहानी में एक ऐसा अध्याय जुड़ा, जिसने इस शहर को धीरे-धीरे आध्यात्मिकता और आस्था का केंद्र बना दिया।

नैनीताल के Manora Peak यानी आज के हनुमानगढ़ी क्षेत्र के बारे में कहा जाता है कि आजादी के शुरुआती वर्षों में यहाँ बच्चों का कब्रिस्तान हुआ करता था और मृत बच्चों को यहाँ दफनाया जाता था। यही वजह थी कि शाम ढलने के बाद इस सुनसान इलाके में जाने से लोग डरते थे।

लेकिन सन 1950 में नीमकरोली बाबा पहली बार नैनीताल पहुंचे जहाँ उन्हें Manora Peak अर्थात आज के हनुमानगढ़ी वाला क्षेत्र अध्यात्म के लिए इतना पसंद आया की उन्होंने यहाँ हनुमान मंदिर की स्थापना की....ध्यान रहे अभी मैं विशाल हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि हनुमान भगवान का एक छोटा सा गुमटीनुमा मंदिर की बात कर रहा हूँ.

सन 1950-51 में हनुमान भगवान का छोटा सा गुटीनुमा मंदिर स्थापित होने के बाद बाबा नीम करोली महाराज यहाँ एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे...जब नैनीताल के लोगो को नीमकरोली बाबा के बारे में धीरे धीरे पता चला तो बाबा द्वारा इस स्थान पर मंदिर बनवाने के कारण लोगो का यहां डर खत्म हुआ, फिर जो जगह कभी लोगों के लिए डर का कारण थी,वही जगह आस्था का केंद्र बनने लगी...तब नैनीताल के निवासीयो के साथ साथ यहाँ अन्य जगहों से भी लोग आने लगे.

उसके बाद समय बदला और लोगो ने पैसे देने शुरू किये और मंदिर बनाने के लिए चढ़ावा किया, इसके साथ साथ नैनीताल नगरपालिका ने भी मंदिर बनाने में मदद की और 1955-1956 में नैनीताल पर हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना हुई. 1960-62 तक नैनीताल का हनुमानगढ़ी मंदिर आज के स्वरूप जैसा हो गया था....बाबा नीम करौली इस स्थान पर बैठते, साधना करते और भक्तों से मिलते रहे।

इसके बाद उनका जुड़ाव कैंची क्षेत्र से बढ़ता गया। आगे चलकर 15 जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान मंदिर की स्थापना हुई और कैंची धाम उनकी प्रमुख साधना स्थली बन गया।

यदि आपसे कोई पूछे कि बाबा नीमकरोली का नैनीताल में कौनसा मंदिर पुराना है तो आप नैनीताल का हनुमानगढ़ी कहना क्योकि नीमकरोली बाबा सबसे पहले नैनीताल आये थे और उसके बाद वो कैंचीधाम पहुचे थे, फिर अधिकांश समय उन्होंने कैंचीधाम में ही बिताया। 

इसलिए अगर कोई आपसे पूछे कि बाबा नीम करौली से जुड़ा नैनीताल का पुराना मंदिर कौन सा है, तो जवाब होगा Hanumangarhi.
एक Couple अपने कुत्ते को लेकर केदारनाथ पहुँच जाता हैं | Reached Kedarnath along with his Dog <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnath nis:value=kedarnath nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnathtemple nis:value=kedarnathtemple nis:enabled=true nis:link/>
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Jasuli Devi (also known as Jasuli Shaukyani or Jasuli Datal) was a legendary 19th-century philanthropist from the Kumaon region of Uttarakhand, India. She is remembered as one of the most generous women in the history of the state, having funded the construction of hundreds of rest houses (dharamshalas) for travelers, traders, and pilgrims across India, Nepal, and Tibet. Jasuli Devi History Nainital Mania
Gaura Devi - A Chipko Movement Lady | Chipko Andolan & Gaura Devi Uttarakhand
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अंग्रेजों के जमाने का है भवाली | कभी था घना जंगल फिर अंग्रेजों ने ऐसे बसाया यह शहर | Bhowali History ✅

Nainital, Bhimtal, Bhowali और Mukteshwar का इतिहास काफी पुराना है। कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास में चंद राजाओं के दौर में चंपावत और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है, लेकिन आधुनिक समय में इन पहाड़ी क्षेत्रों की योजनाबद्ध बसावट और विकास में ब्रिटिश शासन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कहा जाता है कि 1870 से पहले भवाली का क्षेत्र मुख्य रूप से घने जंगलों से घिरा हुआ था। ब्रिटिश शासन के दौरान इस क्षेत्र की प्राकृतिक जलवायु और ऊंचाई को देखते हुए इसे स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त माना गया और धीरे-धीरे यहां सड़क और अन्य सुविधाओं का विकास शुरू हुआ। नैनीताल से भवाली को जोड़ने वाला मार्ग भी इसी दौर में विकसित हुआ।

भवाली की आधुनिक बसावट के प्रमाण हमें 19वीं सदी के उत्तरार्ध से मिलने लगते हैं। ब्रिटिश काल में यहां कई इमारतों और संस्थानों का निर्माण हुआ, जिनमें से कुछ ऐतिहासिक इमारतें आज भी भवाली की पुरानी विरासत की याद दिलाती हैं।

फिर आया 1912 का दौर, जब भवाली में TB Sanatorium की स्थापना ने इस छोटे से पहाड़ी क्षेत्र को एक नई पहचान दी। यहां की स्वच्छ हवा और अनुकूल जलवायु को देखते हुए भवाली को टीबी के मरीजों के उपचार के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनाया गया। इसके आसपास ब्रिटिश काल की कई इमारतें और संस्थान विकसित हुए।

भवाली की पुरानी इमारतों में G.B. Pant Inter College, Bhowali की ऐतिहासिक इमारत भी ब्रिटिश काल की वास्तुकला की झलक देती है....आज का भवाली अचानक नहीं बना। 1960 और 1970 के दशक में यहां विकास की गति बढ़ी, सड़कें, बाजार और आवासीय क्षेत्र विस्तार लेने लगे। वर्ष 2000 के आसपास भवाली एक महत्वपूर्ण पहाड़ी कस्बे के रूप में अपनी पहचान बना चुका था।

और आज, 2026 के दशक में भवाली तेजी से विकसित होता हुआ एक प्रमुख पर्यटन और व्यापारिक केंद्र बन चुका है...यानी जिस भवाली को आज हम बाजार, सड़क, होटल और भीड़भाड़ वाले शहर के रूप में देखते हैं, उसके पीछे 150 साल से ज्यादा पुरानी बसावट और ब्रिटिशकालीन इतिहास की एक दिलचस्प कहानी छिपी हुई है। 

भवाली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि कुमाऊँ के बदलते इतिहास का एक जीवित अध्याय है।

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जब 1950 में नीमकरोली बाबा का पहली बार नैनीताल में आवागमन हुआ और नैनीताल के Hanuman Garhi का डर खत्म हुआ ✅:

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नैनीताल के Manora Peak यानी आज के हनुमानगढ़ी क्षेत्र के बारे में कहा जाता है कि आजादी के शुरुआती वर्षों में यहाँ बच्चों का कब्रिस्तान हुआ करता था और मृत बच्चों को यहाँ दफनाया जाता था। यही वजह थी कि शाम ढलने के बाद इस सुनसान इलाके में जाने से लोग डरते थे।

लेकिन सन 1950 में नीमकरोली बाबा पहली बार नैनीताल पहुंचे जहाँ उन्हें Manora Peak अर्थात आज के हनुमानगढ़ी वाला क्षेत्र अध्यात्म के लिए इतना पसंद आया की उन्होंने यहाँ हनुमान मंदिर की स्थापना की....ध्यान रहे अभी मैं विशाल हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि हनुमान भगवान का एक छोटा सा गुमटीनुमा मंदिर की बात कर रहा हूँ.

सन 1950-51 में हनुमान भगवान का छोटा सा गुटीनुमा मंदिर स्थापित होने के बाद बाबा नीम करोली महाराज यहाँ एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे...जब नैनीताल के लोगो को नीमकरोली बाबा के बारे में धीरे धीरे पता चला तो बाबा द्वारा इस स्थान पर मंदिर बनवाने के कारण लोगो का यहां डर खत्म हुआ, फिर जो जगह कभी लोगों के लिए डर का कारण थी,वही जगह आस्था का केंद्र बनने लगी...तब नैनीताल के निवासीयो के साथ साथ यहाँ अन्य जगहों से भी लोग आने लगे.

उसके बाद समय बदला और लोगो ने पैसे देने शुरू किये और मंदिर बनाने के लिए चढ़ावा किया, इसके साथ साथ नैनीताल नगरपालिका ने भी मंदिर बनाने में मदद की और 1955-1956 में नैनीताल पर हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना हुई. 1960-62 तक नैनीताल का हनुमानगढ़ी मंदिर आज के स्वरूप जैसा हो गया था....बाबा नीम करौली इस स्थान पर बैठते, साधना करते और भक्तों से मिलते रहे।

इसके बाद उनका जुड़ाव कैंची क्षेत्र से बढ़ता गया। आगे चलकर 15 जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान मंदिर की स्थापना हुई और कैंची धाम उनकी प्रमुख साधना स्थली बन गया।

यदि आपसे कोई पूछे कि बाबा नीमकरोली का नैनीताल में कौनसा मंदिर पुराना है तो आप नैनीताल का हनुमानगढ़ी कहना क्योकि नीमकरोली बाबा सबसे पहले नैनीताल आये थे और उसके बाद वो कैंचीधाम पहुचे थे, फिर अधिकांश समय उन्होंने कैंचीधाम में ही बिताया। 

इसलिए अगर कोई आपसे पूछे कि बाबा नीम करौली से जुड़ा नैनीताल का पुराना मंदिर कौन सा है, तो जवाब होगा Hanumangarhi.
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दोस्तों जब नैनीताल बिल्कुल नया था अर्थात 1839-1840 के मध्य तब यहाँ Perambar Baba नाम से एक साधु रहा करते थे, उस जमाने में उनकी मल्लीताल झील के किनारे एक झोपड़ी (Makeshift Hut) हुआ करती थी जहाँ वो ध्यान और तपस्या किया करते थे. 

उसके बाद उन्होंने अंग्रेजो की मदद से 1840 में एक धर्मशाला का निर्माण करवाया ताकि जो भी तीर्थयात्री नैनीताल आये वो उनकी धर्मशाला में रुके सके.

इनकी धर्मशाला पुराने नैनादेवी मंदिर के ठीक बगल में थी, तब तीर्थयात्री नयनादेवी मंदिर में पूजा करके Perambar Baba Dharamshala में रुकते थे और अगले दिन अपनी यात्रा पर आगे निकल जाते थे ....यानी आज जिस नैनीताल को हम एक पर्यटन नगरी के रूप में जानते हैं, उसके शुरुआती दौर में यहाँ तीर्थयात्रियों और साधु-संतों की भी एक अलग दुनिया बसती थी।

1906 में लिखी हुई एक किताब "Guide to Naini Tal and Kumaun" के अनुसार 1840 में “Perambar Baba” जिन्हें एक venerable fakir कहा गया है जिससे जिससे पता चलता है कि वे एक वृद्ध बाबा थे और उनकी पैदाइस 1770  के आसपास की रही होगी।

18 सितम्बर 1880 में नैनीताल की आल्मा पहाड़ी में एक बड़ा भूस्खलन आया जिसने पुराने नैनादेवी मंदिर समेत Perambar Baba की धर्मशाला को भी मिट्टी में ढेर कर दिया और इसके अलावा Victoria Hotel, Bell Shop और Boat House Club समेत कई ऐतिहासिक buildings हमेशा के लिए इतिहास बन गयी.

दोस्तों, 1840 से लेकर 1950 तक नैनीताल बहुत धार्मिक जगह थी जहाँ कई साधु-संत माँ नयनादेवी के मंदिर आते थे और वही रुकते थे, वहीँ कुछ नैनीताल की अन्य धर्मशालाओ में शरण लेते थे...आज जब हम नैनीताल की The Mall, झील, Flats और Boat House को देखते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि इन्हीं जगहों पर कभी साधु-संतों की कुटिया, तीर्थयात्रियों की धर्मशालाएँ और माँ नयना देवी की आराधना से जुड़ी एक पुरानी धार्मिक दुनिया मौजूद थी।

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Old Naina Devi
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Nainital Mania को Follow और Subscribe क्यों करे आज इस Trailer को देखकर आप समझ जायेगे ✅
अंग्रेजो के जमाने में भी नैनीताल ने 4 बार खतरनाक भूस्खलन झेले है, Nainital has faced 4 times dangerous landslides✅

बहुत से लोग सोचते है कि नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को ही भूस्खलन आया था और उसके बाद अंग्रेजो ने बरसाती नालो का नैनीताल में निर्माण किया लेकिन दोस्तों यह जानकारी थोड़ी अधूरी है क्योकि 1880 से पहले भी नैनीताल में 1866, 1867, 1869 और 1879 में आया जिसने पुराने नैनीताल की शक्ल ही बदल दी.

1866 का भूस्खलन⚠️: यह landslide नैनीताल के उत्तर-पूर्वी भाग अर्थात Alma Hill क्षेत्र में आया था जहाँ आज 7 number और Charton Lodge वाला क्षेत्र है, यह भूस्खलन इतना खतरनाक हुआ था कि जिसने उस जमाने के मल्लीताल क्षेत्र में बसी buildings को तहस नहस कर दिया था इसमें जानमाल का काफी नुक्सान हुआ था.

6 जुलाई 1867 Sher-ka-Danda: यह landslide आज जहाँ पर Nainital zoo, Ramsey Hospital और elphinstone hotel है वहाँ पर आया था और लगभग 1.25 km लंबी crack भी दर्ज हुई थी

1869 Alma Hill पर फिर से आया⚠️: इसे 1866 की instability के बाद की rainfall-triggered घटना माना जाता है, हालाँकि 1866 से तीव्रता थोड़ी कम थी.

1879 तबाही से ठीक एक साल पहले ⚠️: Alma Hill और उससे आगे का क्षेत्र तीसरी बार हिला लेकिन भूस्खलन आंशिक हुआ: British historical accounts इसे 1880 के disaster से ठीक पहले की महत्वपूर्ण चेतावनी मानते हैं

18 September 1880 ☠️: नैनीताल के इतिहास का अब तक का सबसे खतरनाक भूस्खलन जिसने किसी को सँभलने का मौका तक नहीं दिया और 151 लोगों की मृत्यु, कई लोगो के लापता होने की रिपोर्ट और Victoria Hotel, Naina Devi Temple, Assembly Hall, Bell Shop आदि के साथ साथ कई भव्य इमारते नष्ट हुई, इस भूस्खलन ने नैनीझील को कुछ क्षेत्र तक भर दिया था और flats का जन्म हुआ, इतिहासकार बताते है कि इसने मल्लीताल का क्षेत्र ही बदल दिया था. 

इसके बाद अंग्रेजो ने सबक लिया और 62 बरसाती नालो का निर्माण किया और सम्पूर्ण नैनीताल को 50 KM के radius में नालो के जाले से बांधा ताकि भविष्य में फिर कभी ऐसे भूस्खलन ना आ सके, लेकिन आज लोगो ने इन्ही नालो के ऊपर घर बना दिए है जो आगे आने वाले किसी बड़ी तबाही का कारण बन सकते है. 

तो सवाल यह नहीं है कि अगला बड़ा भूस्खलन कब आएगा? सवाल यह है कि...जब पहाड़ अगली बार चेतावनी देगा, क्या हम उसे सुन पाएंगे?

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Nainital 1850's ✅: कोई रास्ता नहीं था तब मल्लीताल जाने का हर जगह घने जंगल और रास्तो में झाड़िया थी, यह नैनीताल का प्रारंभिक दौर था.

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