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Nainital Mania

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जब 1950 में नीमकरोली बाबा का पहली बार नैनीताल में आवागमन हुआ और नैनीताल के Hanuman Garhi का डर खत्म हुआ ✅:

दोस्तों नैनीताल सिर्फ अंग्रेजो का शहर था लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद नैनीताल की कहानी में एक ऐसा अध्याय जुड़ा, जिसने इस शहर को धीरे-धीरे आध्यात्मिकता और आस्था का केंद्र बना दिया।

नैनीताल के Manora Peak यानी आज के हनुमानगढ़ी क्षेत्र के बारे में कहा जाता है कि आजादी के शुरुआती वर्षों में यहाँ बच्चों का कब्रिस्तान हुआ करता था और मृत बच्चों को यहाँ दफनाया जाता था। यही वजह थी कि शाम ढलने के बाद इस सुनसान इलाके में जाने से लोग डरते थे।

लेकिन सन 1950 में नीमकरोली बाबा पहली बार नैनीताल पहुंचे जहाँ उन्हें Manora Peak अर्थात आज के हनुमानगढ़ी वाला क्षेत्र अध्यात्म के लिए इतना पसंद आया की उन्होंने यहाँ हनुमान मंदिर की स्थापना की....ध्यान रहे अभी मैं विशाल हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि हनुमान भगवान का एक छोटा सा गुमटीनुमा मंदिर की बात कर रहा हूँ.

सन 1950-51 में हनुमान भगवान का छोटा सा गुटीनुमा मंदिर स्थापित होने के बाद बाबा नीम करोली महाराज यहाँ एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे...जब नैनीताल के लोगो को नीमकरोली बाबा के बारे में धीरे धीरे पता चला तो बाबा द्वारा इस स्थान पर मंदिर बनवाने के कारण लोगो का यहां डर खत्म हुआ, फिर जो जगह कभी लोगों के लिए डर का कारण थी,वही जगह आस्था का केंद्र बनने लगी...तब नैनीताल के निवासीयो के साथ साथ यहाँ अन्य जगहों से भी लोग आने लगे.

उसके बाद समय बदला और लोगो ने पैसे देने शुरू किये और मंदिर बनाने के लिए चढ़ावा किया, इसके साथ साथ नैनीताल नगरपालिका ने भी मंदिर बनाने में मदद की और 1955-1956 में नैनीताल पर हनुमानगढ़ी मंदिर की स्थापना हुई. 1960-62 तक नैनीताल का हनुमानगढ़ी मंदिर आज के स्वरूप जैसा हो गया था....बाबा नीम करौली इस स्थान पर बैठते, साधना करते और भक्तों से मिलते रहे।

इसके बाद उनका जुड़ाव कैंची क्षेत्र से बढ़ता गया। आगे चलकर 15 जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान मंदिर की स्थापना हुई और कैंची धाम उनकी प्रमुख साधना स्थली बन गया।

यदि आपसे कोई पूछे कि बाबा नीमकरोली का नैनीताल में कौनसा मंदिर पुराना है तो आप नैनीताल का हनुमानगढ़ी कहना क्योकि नीमकरोली बाबा सबसे पहले नैनीताल आये थे और उसके बाद वो कैंचीधाम पहुचे थे, फिर अधिकांश समय उन्होंने कैंचीधाम में ही बिताया। 

इसलिए अगर कोई आपसे पूछे कि बाबा नीम करौली से जुड़ा नैनीताल का पुराना मंदिर कौन सा है, तो जवाब होगा Hanumangarhi.
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आज Nainital में जहाँ Boat House Club है, वहाँ Perambar Baba की एक धर्मशाला हुआ करती थी, तब नैनीताल में साधु-संतों का बसेरा हुआ करता था ✅:

दोस्तों जब नैनीताल बिल्कुल नया था अर्थात 1839-1840 के मध्य तब यहाँ Perambar Baba नाम से एक साधु रहा करते थे, उस जमाने में उनकी मल्लीताल झील के किनारे एक झोपड़ी (Makeshift Hut) हुआ करती थी जहाँ वो ध्यान और तपस्या किया करते थे. 

उसके बाद उन्होंने अंग्रेजो की मदद से 1840 में एक धर्मशाला का निर्माण करवाया ताकि जो भी तीर्थयात्री नैनीताल आये वो उनकी धर्मशाला में रुके सके.

इनकी धर्मशाला पुराने नैनादेवी मंदिर के ठीक बगल में थी, तब तीर्थयात्री नयनादेवी मंदिर में पूजा करके Perambar Baba Dharamshala में रुकते थे और अगले दिन अपनी यात्रा पर आगे निकल जाते थे ....यानी आज जिस नैनीताल को हम एक पर्यटन नगरी के रूप में जानते हैं, उसके शुरुआती दौर में यहाँ तीर्थयात्रियों और साधु-संतों की भी एक अलग दुनिया बसती थी।

1906 में लिखी हुई एक किताब "Guide to Naini Tal and Kumaun" के अनुसार 1840 में “Perambar Baba” जिन्हें एक venerable fakir कहा गया है जिससे जिससे पता चलता है कि वे एक वृद्ध बाबा थे और उनकी पैदाइस 1770  के आसपास की रही होगी।

18 सितम्बर 1880 में नैनीताल की आल्मा पहाड़ी में एक बड़ा भूस्खलन आया जिसने पुराने नैनादेवी मंदिर समेत Perambar Baba की धर्मशाला को भी मिट्टी में ढेर कर दिया और इसके अलावा Victoria Hotel, Bell Shop और Boat House Club समेत कई ऐतिहासिक buildings हमेशा के लिए इतिहास बन गयी.

दोस्तों, 1840 से लेकर 1950 तक नैनीताल बहुत धार्मिक जगह थी जहाँ कई साधु-संत माँ नयनादेवी के मंदिर आते थे और वही रुकते थे, वहीँ कुछ नैनीताल की अन्य धर्मशालाओ में शरण लेते थे...आज जब हम नैनीताल की The Mall, झील, Flats और Boat House को देखते हैं, तो शायद ही कभी सोचते हैं कि इन्हीं जगहों पर कभी साधु-संतों की कुटिया, तीर्थयात्रियों की धर्मशालाएँ और माँ नयना देवी की आराधना से जुड़ी एक पुरानी धार्मिक दुनिया मौजूद थी।

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Perambar Baba Dharamshala, Perambar Baba Nainital History, Perambar Baba, Perembar Baba Nainital, Nainital History, Nainital Old History, Old Nainital, Where was Perambar Baba's Dharamshala located, <nis:link nis:type=tag nis:id=perambarbaba nis:value=PerambarBaba nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=perambarbabanainital nis:value=PerambarBabaNainital nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=nainital nis:value=Nainital nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=nainitalhistory nis:value=NainitalHistory nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=oldnainitalnainadevitemple nis:value=OldNainitalNainaDeviTemple nis:enabled=true nis:link/> NainaDevi OldNainaDeviTemple, Perembar baba

Old Naina Devi
एक Couple अपने कुत्ते को लेकर केदारनाथ पहुँच जाता हैं | Reached Kedarnath along with his Dog <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnath nis:value=kedarnath nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnathtemple nis:value=kedarnathtemple nis:enabled=true nis:link/>
Nainital Mania को Follow और Subscribe क्यों करे आज इस Trailer को देखकर आप समझ जायेगे ✅
अंग्रेजो के जमाने में भी नैनीताल ने 4 बार खतरनाक भूस्खलन झेले है, Nainital has faced 4 times dangerous landslides✅

बहुत से लोग सोचते है कि नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को ही भूस्खलन आया था और उसके बाद अंग्रेजो ने बरसाती नालो का नैनीताल में निर्माण किया लेकिन दोस्तों यह जानकारी थोड़ी अधूरी है क्योकि 1880 से पहले भी नैनीताल में 1866, 1867, 1869 और 1879 में आया जिसने पुराने नैनीताल की शक्ल ही बदल दी.

1866 का भूस्खलन⚠️: यह landslide नैनीताल के उत्तर-पूर्वी भाग अर्थात Alma Hill क्षेत्र में आया था जहाँ आज 7 number और Charton Lodge वाला क्षेत्र है, यह भूस्खलन इतना खतरनाक हुआ था कि जिसने उस जमाने के मल्लीताल क्षेत्र में बसी buildings को तहस नहस कर दिया था इसमें जानमाल का काफी नुक्सान हुआ था.

6 जुलाई 1867 Sher-ka-Danda: यह landslide आज जहाँ पर Nainital zoo, Ramsey Hospital और elphinstone hotel है वहाँ पर आया था और लगभग 1.25 km लंबी crack भी दर्ज हुई थी

1869 Alma Hill पर फिर से आया⚠️: इसे 1866 की instability के बाद की rainfall-triggered घटना माना जाता है, हालाँकि 1866 से तीव्रता थोड़ी कम थी.

1879 तबाही से ठीक एक साल पहले ⚠️: Alma Hill और उससे आगे का क्षेत्र तीसरी बार हिला लेकिन भूस्खलन आंशिक हुआ: British historical accounts इसे 1880 के disaster से ठीक पहले की महत्वपूर्ण चेतावनी मानते हैं

18 September 1880 ☠️: नैनीताल के इतिहास का अब तक का सबसे खतरनाक भूस्खलन जिसने किसी को सँभलने का मौका तक नहीं दिया और 151 लोगों की मृत्यु, कई लोगो के लापता होने की रिपोर्ट और Victoria Hotel, Naina Devi Temple, Assembly Hall, Bell Shop आदि के साथ साथ कई भव्य इमारते नष्ट हुई, इस भूस्खलन ने नैनीझील को कुछ क्षेत्र तक भर दिया था और flats का जन्म हुआ, इतिहासकार बताते है कि इसने मल्लीताल का क्षेत्र ही बदल दिया था. 

इसके बाद अंग्रेजो ने सबक लिया और 62 बरसाती नालो का निर्माण किया और सम्पूर्ण नैनीताल को 50 KM के radius में नालो के जाले से बांधा ताकि भविष्य में फिर कभी ऐसे भूस्खलन ना आ सके, लेकिन आज लोगो ने इन्ही नालो के ऊपर घर बना दिए है जो आगे आने वाले किसी बड़ी तबाही का कारण बन सकते है. 

तो सवाल यह नहीं है कि अगला बड़ा भूस्खलन कब आएगा? सवाल यह है कि...जब पहाड़ अगली बार चेतावनी देगा, क्या हम उसे सुन पाएंगे?

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Nainital 1850's ✅: कोई रास्ता नहीं था तब मल्लीताल जाने का हर जगह घने जंगल और रास्तो में झाड़िया थी, यह नैनीताल का प्रारंभिक दौर था.

Nainita
दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि नैनीताल की खोज तक पहुँचने की कहानी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण भी है?

18 नवंबर 1839 को ब्रिटिश व्यापारी P. Barron नैनीताल की उस खूबसूरत झील तक पहुँचे, जिसे बाद में दुनिया नैनीताल के नाम से जानने लगी। लेकिन यहाँ तक पहुँचना उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं था।

दरअसल, Barron ने नैनीताल के बारे में George William Traill, जो 1823 में नैनीताल पहुँचने वाले शुरुआती ब्रिटिश अधिकारियों में से एक थे, और कुछ स्थानीय पहाड़ी लोगों से सुना था कि नैनीताल बहुत सुंदर जगह है इसीलिए नैनीताल को अपनी आँखों से देखने की उत्सुकता उनकी इतनी बढ़ गई थी कि वह इसे खोजने के लिए जैसे जुनूनी हो गए थे।

सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि स्थानीय पहाड़ी लोग उन्हें नैनीताल का रास्ता ठीक से बताने को तैयार नहीं थे। लेकिन Barron ने हार नहीं मानी। वह लगातार रास्ते तलाशते रहे और हिमालय की यात्रा के बाद एक पहाड़ी आदमी को सिर पर पत्थर रखने का आदेश दिया कि यह पत्थर इसके सिर से तब उतरेगा जबतक यह नैनीताल तक ना पहुंचा दे .....आखिरकार शेर का डांडा पहाड़ी तक P Barron उस पहाड़ी आदमी के साथ पहुँच गए।

और फिर जो दृश्य उनकी आँखों के सामने था, उसने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया।

सामने फैली हुई नैनीझील का नीला-हरा पानी, जिसमें आसपास के पेड़-पौधों की परछाइयाँ बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थीं। Barron के अनुसार, झील का पानी ऐसा चमक रहा था मानो उसमें मोती बिखरे हों। उन्होंने लिखा कि उन्होंने इससे पहले इतनी सुंदर जगह नहीं देखी थी।

लेकिन आज के कंक्रीट से भरे नैनीताल की कल्पना उस समय बिल्कुल मत कीजिए।

1839 का नैनीताल चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ था। ऊँचे देवदार और बाँज के पेड़, चारों ओर सन्नाटा और जंगल की प्राकृतिक खूबसूरती। Barron को इतनी ठंड महसूस हो रही थी कि उस समय का नैनीताल उन्हें बिल्कुल अलग ही दुनिया जैसा लग रहा था।

और उस समय का नैनीताल आज से कितना अलग था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तल्लीताल में, जहाँ आज Post Office दिखाई देता है, वहाँ एक छोटा-सा Naina Devi Temple था। वहीं एक बड़ा-सा झूला भी था, जो संभवतः किसी मेले या स्थानीय आयोजन में इस्तेमाल होता होगा।

उस रात Barron अपने साथी Captain C. के साथ मल्लीताल में नैनीझील के किनारे अपना टेंट लगाकर रुके।

अगली सुबह जब उनकी आँख खुली तो उनके टेंट के सामने का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था।

सैकड़ों पहाड़ी मुर्गे उनके टेंट के आसपास दाना चुग रहे थे।
अंग्रेजो के जमाने में नैनीताल में खुद का Private Boat House Club था रामपुर के नवाब Hamid Ali Khan (Nawab of Rampur) का ✅

क्या आप जानते हैं कि कभी नैनीताल की नैनीझील के किनारे नवाब-ए-रामपुर की भी अपनी संपत्ति और निजी Boat House हुआ करता था? असल में इसका सबसे बड़ा कारण 1857 की क्रांति का है जब 1857 के विद्रोह के दौरान रामपुर के नवाब Yusuf Ali Khan ने ब्रिटिश अधिकारियों और शरणार्थियों को नैनीताल पहुंचाने में मदद की तथा Naini Tal तक British supply और communication lines खुली रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसीलिए 20 शताब्दी के शुरुवाती दौर में अंग्रेजो ने उनके बेटे Hamid Ali Khan के लिए private boathouse का निर्माण करवाया ताकि उनका नैनीताल आगमन में शाही अंदाज बना रहे.

1924 के एक पुराने यात्रा-विवरण में नैनीताल की झील पर मौजूद निजी Boat Houses का उल्लेख मिलता है। इसमें साफ लिखा है कि Nawab of Rampur और Raja of Awagarh के अपने निजी Boat Houses थे.....इतना ही नहीं, 1906 की नैनीताल की एक पुरानी directory में “Brook Hill” नाम की property के सामने “The Chief Secretary to H. H. the Nawab of Rampur” दर्ज मिलता है।

यानी रामपुर के नवाबों का नैनीताल से रिश्ता केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं था। नैनीताल में उनकी संपत्ति और झील पर उनका निजी Boat House भी था.....उस दौर में रामपुर के नवाबों का कुमाऊँ से गहरा संबंध बन चुका था। बाद में awab Hamid Ali Khan ने 1921 में Ghorakhal Estate भी खरीदा था।

आज Boat House Club के आसपास जब हम पुरानी इमारतों को देखते हैं, तो शायद ही अंदाजा होता है कि कभी इसी नैनीझील के किनारे अंग्रेजो के द्वारा बसाये रामपुर के नवाबों की भी मौजूदगी हुआ करती थी....नैनीताल की कहानी सिर्फ अंग्रेजों और राजाओं की कहानी नहीं है। इसकी झील के किनारे नवाबों, रियासतों और उनके अपने-अपने किस्से भी छिपे हैं।

नैनीताल का इतिहास जितना खूबसूरत है, उतना ही रहस्यमय भी।

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चंद शासको ने अंग्रेजो से कुमाऊँ पर दोबारा शासन करने की मांग की थी ✅

1790 के समय नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊं की पहाड़ियों पर आक्रमण किया, चंद राजा महेंद्र सिंह और उनके चाचा लाल सिंह ने अपने क्षेत्र की रक्षा की, लेकिन अंततः हवालबाग की लड़ाई में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद गोरखाओ ने शाही परिवार को पदच्युत कर दिया गया और चंदो को शरण लेने के लिए रोहिलखंड के मैदानों और तराई क्षेत्रों में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जब अंग्रेजो ने 1816 में Anglo Nepalese war में गोरखाओ को बूरी तरह हराया तो पंवार शासक सुदर्शनशाह के कहने से उन्होंने गढ़वाल का एक क्षेत्र टिहरी रियासत राज्य करने के लिए दिया लेकिन Administrative power सिर्फ अंग्रेजो के पास थी..यह सब देखकर कुमाऊँ के निर्वासित चंद शासक महेंद्र चंद को उम्मीद जगी कि शायद अब उन्हें भी अपना पुराना राज्य वापस मिल सके। उन्होंने अंग्रेजों से कुमाऊँ में दोबारा शासन करने की अनुमति मांगी, लेकिन अंग्रेजों ने उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया।

British East India Company और अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने निर्वासित शाही परिवार को तराई क्षेत्र में कुछ भूमि और संपत्ति रखने की व्यवस्था की, जिससे वे अपना जीवन-यापन कर सकें। कहा जाता है कि महेंद्र चंद पहले रुद्रपुर में रहे और बाद में किलपुरी चले गए।
लेकिन सत्ता चली जाने के बाद भी परिवार के भीतर संपत्ति और पैतृक अधिकारों को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए। जैसे-जैसे चंद परिवार मैदानी इलाकों में बसता गया, वैसे-वैसे जागीरों, पैतृक संपत्तियों और ब्रिटिश अनुदानों पर अधिकार को लेकर परिवार की अलग-अलग शाखाओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी।

ब्रिटिश सरकार ने महेंद्र चंद के गुजर जाने के बाद उनके बेटे कुंवर प्रताप सिंह को 1820 में 250 रुपये (5 लाख) की मासिक पेंशन प्रदान की। कुंवर प्रताप सिंह ने बाजपुर क्षेत्र पर अपने पैतृक परदादा बाज बहादुर चंद के नाम से दावा किया, लेकिन colonial administration ने इस दावे को भी अस्वीकार कर दिया..Lal Singh ने चंद परिवार की प्रमुख जागीरों पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा और अंततः काशीपुर जागीर के नाम से जानी जाने वाली संपत्ति को बनाया. 

Kashipur Estate में ही आखिरी बचे चंदो का समय बीता..1828 में लाल सिंह के बेटे Guman Singh को Kashipur का पहला राजा बनाते है. Guman Singh के बाद जितने भी चंद राजा उत्तराखंड के काशीपुर में रहे उनके बारे में आप फोटो में देखकर पढ़ सकते है. 

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Nainital में सबसे पहले चर्च St. John's in the Wilderness Church की एक अनोखी कहानी, जिसे आपने जरूर जानना चाहिए ✅

साल 23 February 1844 में Bishop Daniel Wilson (1778) जो Bishop of Calcutta थे, वे नैनीताल आए थे। उस समय नैनीताल आज जैसा विकसित शहर नहीं था, बल्कि चारों ओर घने जंगल और पहाड़ों से घिरा एक छोटा सा hill station था। 

वे नैनीताल में अंग्रेजो के लिए एक Anglican Church स्थापित करना चाहते थे क्योकि उन्हें 1843 में पता चल गया था कि नैनीताल अंग्रेजी शहर बनने वाला है इसीलिए चर्च की सबसे पहले स्थापना करने वो नैनीताल पहुंचे। उनका नैनीताल पहुंचना बड़ा मुश्किलों भरा था क्योकि नैनीताल में तब इतना घना जंगल हुआ करता था कि वहाँ पहुंचना ही बहुत कठिन था, ऊँचे पहाड़ो में चढ़कर जाना पड़ता था, कई जगह घनी झाड़िया थी, कोई रास्ता नहीं था और जंगली जानवर दिन दहाड़े ही दिख जाया करते थे. 

जब वो 1843 में नैनीताल पहुंचे तो यहाँ सिर्फ 7 घर बने थे उनमे भी कुछ under construction थे, इसीलिए उन्होंने कई दिन टूटी-फूटी झोपड़ी में बिताये, कड़ाके की ठंड और कठिन परिस्थितियों के कारण उनकी तबियत भी खराब हो गई, तब उनकी उम्र 65-66 वर्ष की थी मतलब वो बूढ़े इंसान थे.

उन्होंने नैनीताल में चर्च बनाने के लिए John Hallet Batten (Assistant Kumaon Comissioner) से नैनीताल में जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव रखा, जहाँ John Hallet Batten ने उनका प्रस्ताव संज्ञान में लेते हुए उन्हें सूखाताल स्थित जगह दे दी जहाँ वो चर्च बना सके. 

St. John in the Wilderness Church के architect को बनाने का श्रेय Executive Engineer Captain Young को दिया जाता है, इसके बाद 13 October 1846 में चर्च की नींव का cornerstone रखा गया और 2 April 1848 को चर्च बनकर तैयार हुआ...इस चर्च के निर्माण में 15,000 रुपए का खर्चा आया था...इस चर्च का नाम St. John in the Wilderness रखा गया जिसका अर्थ “घने जंगल में स्थित ईश्वर का घर”, क्योंकि उस दौर का नैनीताल घने जंगलों से घिरा हुआ था और St. John in the Wilderness Church ही नैनीताल में बना सबसे पहला चर्च था. 1855 के आसपास चर्च के clock tower में घंटा भी लगाया गया ताकि घंटे की आवाज़ सुनकर लोग प्रार्थना करने आ सके. 

इसके बाद  Bishop Daniel कुछ दिनों नैनीताल रहे और वापिस कलकत्ता चले गए....1864 में चर्च के दोनों सिरों पर stained-glass windows भी लगाए गए।

1880 के बाद St. John in the Wilderness Church को काफी हद तक enlarged किया क्योकि 1880 में इतना खतरनाक भूस्खलन आया था.
अंग्रेजो के जमाने में नैनीताल में खुद का Private Boat House Club था रामपुर के नवाब Hamid Ali Khan (Nawab of Rampur) का ✅

क्या आप जानते हैं कि कभी नैनीताल की नैनीझील के किनारे नवाब-ए-रामपुर की भी अपनी संपत्ति और निजी Boat House हुआ करता था? असल में इसका सबसे बड़ा कारण 1857 की क्रांति का है जब 1857 के विद्रोह के दौरान रामपुर के नवाब Yusuf Ali Khan ने ब्रिटिश अधिकारियों और शरणार्थियों को नैनीताल पहुंचाने में मदद की तथा Naini Tal तक British supply और communication lines खुली रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसीलिए 20 शताब्दी के शुरुवाती दौर में अंग्रेजो ने उनके बेटे Hamid Ali Khan के लिए private boathouse का निर्माण करवाया ताकि उनका नैनीताल आगमन में शाही अंदाज बना रहे.

1924 के एक पुराने यात्रा-विवरण में नैनीताल की झील पर मौजूद निजी Boat Houses का उल्लेख मिलता है। इसमें साफ लिखा है कि Nawab of Rampur और Raja of Awagarh के अपने निजी Boat Houses थे.....इतना ही नहीं, 1906 की नैनीताल की एक पुरानी directory में “Brook Hill” नाम की property के सामने “The Chief Secretary to H. H. the Nawab of Rampur” दर्ज मिलता है।

यानी रामपुर के नवाबों का नैनीताल से रिश्ता केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं था। नैनीताल में उनकी संपत्ति और झील पर उनका निजी Boat House भी था.....उस दौर में रामपुर के नवाबों का कुमाऊँ से गहरा संबंध बन चुका था। बाद में awab Hamid Ali Khan ने 1921 में Ghorakhal Estate भी खरीदा था।

आज Boat House Club के आसपास जब हम पुरानी इमारतों को देखते हैं, तो शायद ही अंदाजा होता है कि कभी इसी नैनीझील के किनारे अंग्रेजो के द्वारा बसाये रामपुर के नवाबों की भी मौजूदगी हुआ करती थी....नैनीताल की कहानी सिर्फ अंग्रेजों और राजाओं की कहानी नहीं है। इसकी झील के किनारे नवाबों, रियासतों और उनके अपने-अपने किस्से भी छिपे हैं।

नैनीताल का इतिहास जितना खूबसूरत है, उतना ही रहस्यमय भी।

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दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि नैनीताल की खोज तक पहुँचने की कहानी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण भी है?

18 नवंबर 1839 को ब्रिटिश व्यापारी P. Barron नैनीताल की उस खूबसूरत झील तक पहुँचे, जिसे बाद में दुनिया नैनीताल के नाम से जानने लगी। लेकिन यहाँ तक पहुँचना उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं था।

दरअसल, Barron ने नैनीताल के बारे में George William Traill, जो 1823 में नैनीताल पहुँचने वाले शुरुआती ब्रिटिश अधिकारियों में से एक थे, और कुछ स्थानीय पहाड़ी लोगों से सुना था कि नैनीताल बहुत सुंदर जगह है इसीलिए नैनीताल को अपनी आँखों से देखने की उत्सुकता उनकी इतनी बढ़ गई थी कि वह इसे खोजने के लिए जैसे जुनूनी हो गए थे।

सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि स्थानीय पहाड़ी लोग उन्हें नैनीताल का रास्ता ठीक से बताने को तैयार नहीं थे। लेकिन Barron ने हार नहीं मानी। वह लगातार रास्ते तलाशते रहे और हिमालय की यात्रा के बाद एक पहाड़ी आदमी को सिर पर पत्थर रखने का आदेश दिया कि यह पत्थर इसके सिर से तब उतरेगा जबतक यह नैनीताल तक ना पहुंचा दे .....आखिरकार शेर का डांडा पहाड़ी तक P Barron उस पहाड़ी आदमी के साथ पहुँच गए।

और फिर जो दृश्य उनकी आँखों के सामने था, उसने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया।

सामने फैली हुई नैनीझील का नीला-हरा पानी, जिसमें आसपास के पेड़-पौधों की परछाइयाँ बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थीं। Barron के अनुसार, झील का पानी ऐसा चमक रहा था मानो उसमें मोती बिखरे हों। उन्होंने लिखा कि उन्होंने इससे पहले इतनी सुंदर जगह नहीं देखी थी।

लेकिन आज के कंक्रीट से भरे नैनीताल की कल्पना उस समय बिल्कुल मत कीजिए।

1839 का नैनीताल चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ था। ऊँचे देवदार और बाँज के पेड़, चारों ओर सन्नाटा और जंगल की प्राकृतिक खूबसूरती। Barron को इतनी ठंड महसूस हो रही थी कि उस समय का नैनीताल उन्हें बिल्कुल अलग ही दुनिया जैसा लग रहा था।

और उस समय का नैनीताल आज से कितना अलग था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तल्लीताल में, जहाँ आज Post Office दिखाई देता है, वहाँ एक छोटा-सा Naina Devi Temple था। वहीं एक बड़ा-सा झूला भी था, जो संभवतः किसी मेले या स्थानीय आयोजन में इस्तेमाल होता होगा।

उस रात Barron अपने साथी Captain C. के साथ मल्लीताल में नैनीझील के किनारे अपना टेंट लगाकर रुके।

अगली सुबह जब उनकी आँख खुली तो उनके टेंट के सामने का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था।

सैकड़ों पहाड़ी मुर्गे उनके टेंट के आसपास दाना चुग रहे थे।
British Nainital की तस्वीरों को कैद करने वाले गंगी साह, History Of Gangi Sah Photographer Nainital✅

आज हम जिस पुराने नैनीताल को तस्वीरों में देखते हैं, उसके पीछे कई ऐसे लोगों की मेहनत छिपी है, जिन्होंने अपने कैमरे से उस दौर को हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कर दिया। इन्हीं में एक बेहद खास नाम था Gangi Sah का।

Gangi Sah नैनीताल में रहने वाले उन शुरुआती भारतीय फोटोग्राफरों में से थे, जिन्होंने ब्रिटिशकालीन नैनीताल की जिंदगी, इमारतों, सड़कों और प्राकृतिक खूबसूरती को कैमरे में कैद किया। माना जाता है कि उन्होंने लगभग 1907 के आसपास नैनीताल की फोटोग्राफी शुरू की थी।

उनके हाथ में उस समय का Folding Pocket Camera या Kodak Brownie कैमरा दिखाई देता था। वह कैमरा लेकर नैनीताल के अलग-अलग हिस्सों में घूमते और वहां के दृश्यों को तस्वीरों में सहेजते थे। उस दौर में फोटोग्राफी आज की तरह आसान नहीं थी। कैमरा, फिल्म और पूरी प्रक्रिया अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण थी। ऐसे समय में Gangi Sah का लगातार तस्वीरें खींचना अपने आप में बड़ी बात थी।

सिर्फ Nainital तक सीमित नहीं था उनका Camera✅
Gangi Sah की खासियत यह थी कि उनकी फोटोग्राफी केवल स्थानीय लोगों के Portraits या नैनीताल के सामान्य दृश्यों तक सीमित नहीं थी।

उनकी तस्वीरों में Delhi, Agra और अन्य मैदानी क्षेत्रों के दृश्य भी मिलते हैं। बताया जाता है कि अंग्रेज अधिकारी उन्हें ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व वाले विषयों की तस्वीरें लेने के लिए बाहर भी भेजते थे। उनके काम में ताजमहल और मुगल शासकों से संबंधित Portraits तथा ऐतिहासिक वास्तुकला की तस्वीरों के उदाहरण भी मिलते हैं।

यानी Gangi Sah उस समय सिर्फ एक स्थानीय फोटोग्राफर नहीं थे। उनका कैमरा नैनीताल की पहाड़ियों से निकलकर भारत के बड़े ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंच चुका था।

कैमरे से किताब तक, Gangi Sah Writer as well✅
Gangi Sah केवल फोटोग्राफर ही नहीं थे, बल्कि अपने समय और समाज को दर्ज करने वाले लेखक भी थे....1927 में उन्होंने “श्री रामलीला नाटक” नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक के माध्यम से उस दौर की नैनीताल की रामलीला और तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Gangi Sah का काम केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तस्वीरों और लेखन, दोनों के माध्यम से अपने समय के नैनीताल को दर्ज किया।

नैनीताल से दुनिया तक पहुंचते थे उनके Postcards 

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5th कुमाऊँ कमिश्नर George Thomas Lushington जिन्होंने आधुनिक नैनीताल की नीव रखी ✅ 

दोस्तों P Barron ने नैनीताल को 18 नवंबर 1839 में खोजा लेकिन नैनीताल को बसाने का काम P Barron ने नहीं बल्कि George Thomas Lushington ने किया। George Thomas Lushington कुमाऊँ के 5th Kumaon Commissioner थे और उन्होंने ही आधुनिक नैनीताल को बसाने की नीव रखी और British world में introduce करवाया.

Lushington ने 1842 में P Barron के घर के बाद Naini Tal में अपना भी एक छोटा house बनाना शुरू किया था इससे पता चलता है कि Lushington केवल दूर बैठे administrator नहीं थे बल्कि वह खुद Nainital में property रखने वाले शुरुआती European residents में थे।

Lushington ने bazaar, public buildings और church के लिए sites allot किए और settlement rules शुरू किये। एक contemporary-historical account यह भी बताता है कि Lushington ने bazaar की व्यवस्था करने में जल्दी की, और hill people shops बनाने के लिए leases लेने उनके पास आने लगे..इसीलिए मल्लीताल और तल्लीताल क्षेत्र में आपको घरो की खचा-खस देखने को मिलेगी, क्योकि नैनीताल को जल्दी से develop करने की होड़ लग गयी थी.

 P. Barron ने पूरे Sher-ka-Danda के लिए grant माँगा था लेकिन Lushington ने इस application को reject किया क्योंकि यह Government के land-grant orders के विरुद्ध था.....Lushington को Naini Tal में church के लिए site allot करने वाले administrator के रूप में भी दर्ज किया गया है जहाँ उनके Assistant Commissioner Sir John Hallet Batten ने St. John in the Wilderness Church के लिए Bishop Daniel Wilson के प्रस्ताव को approval के साथ। 

Lushington ने Mall Road का layout plan किया था और Raj Bhawan area जैसे viewpoints/sites identify किए थे....1845 तक Nainital इतना विकसित हो चुका था कि British European Residents ने Government से medical officer/assistant surgeon उपलब्ध कराने की मांग की।

25 October 1849 को George Thomas Lushington की मृत्यु Naini Tal में हुई जहाँ St. John in the Wilderness Church के cemetery में उनकी कब्र मौजूद है.

दोस्तों एक ख़ास बात - नैनीताल पूरे भारत का एकमात्र ऐसा जिला रहा जहाँ किसी भी क्षेत्रीय राजा जैसे खस, कत्यूरी, चंद, पंवार या गोरखा किसी का भी शासन नहीं रहा, और नैनीताल शुरू से ही अंग्रेजी शहर रहा और The British Nainital नाम से 1839 से लेकर 1947 तक रहा. 

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इनकी यह कब्र नैनीताल के St Johns Wi
Nainital के आस पास की जगहों के नामो का मतबल जानिए | Bhowali | Ramnagar | Haldwani <nis:link nis:type=tag nis:id=bhowali nis:value=bhowali nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=ghorakhal nis:value=ghorakhal nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=chorgaliya nis:value=chorgaliya nis:enabled=true nis:link/>
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एक Couple अपने कुत्ते को लेकर केदारनाथ पहुँच जाता हैं | Reached Kedarnath along with his Dog <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnath nis:value=kedarnath nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=kedarnathtemple nis:value=kedarnathtemple nis:enabled=true nis:link/>
अंग्रेजो के जमाने में भी नैनीताल ने 4 बार खतरनाक भूस्खलन झेले है, Nainital has faced 4 times dangerous landslides✅

बहुत से लोग सोचते है कि नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को ही भूस्खलन आया था और उसके बाद अंग्रेजो ने बरसाती नालो का नैनीताल में निर्माण किया लेकिन दोस्तों यह जानकारी थोड़ी अधूरी है क्योकि 1880 से पहले भी नैनीताल में 1866, 1867, 1869 और 1879 में आया जिसने पुराने नैनीताल की शक्ल ही बदल दी.

1866 का भूस्खलन⚠️: यह landslide नैनीताल के उत्तर-पूर्वी भाग अर्थात Alma Hill क्षेत्र में आया था जहाँ आज 7 number और Charton Lodge वाला क्षेत्र है, यह भूस्खलन इतना खतरनाक हुआ था कि जिसने उस जमाने के मल्लीताल क्षेत्र में बसी buildings को तहस नहस कर दिया था इसमें जानमाल का काफी नुक्सान हुआ था.

6 जुलाई 1867 Sher-ka-Danda: यह landslide आज जहाँ पर Nainital zoo, Ramsey Hospital और elphinstone hotel है वहाँ पर आया था और लगभग 1.25 km लंबी crack भी दर्ज हुई थी

1869 Alma Hill पर फिर से आया⚠️: इसे 1866 की instability के बाद की rainfall-triggered घटना माना जाता है, हालाँकि 1866 से तीव्रता थोड़ी कम थी.

1879 तबाही से ठीक एक साल पहले ⚠️: Alma Hill और उससे आगे का क्षेत्र तीसरी बार हिला लेकिन भूस्खलन आंशिक हुआ: British historical accounts इसे 1880 के disaster से ठीक पहले की महत्वपूर्ण चेतावनी मानते हैं

18 September 1880 ☠️: नैनीताल के इतिहास का अब तक का सबसे खतरनाक भूस्खलन जिसने किसी को सँभलने का मौका तक नहीं दिया और 151 लोगों की मृत्यु, कई लोगो के लापता होने की रिपोर्ट और Victoria Hotel, Naina Devi Temple, Assembly Hall, Bell Shop आदि के साथ साथ कई भव्य इमारते नष्ट हुई, इस भूस्खलन ने नैनीझील को कुछ क्षेत्र तक भर दिया था और flats का जन्म हुआ, इतिहासकार बताते है कि इसने मल्लीताल का क्षेत्र ही बदल दिया था. 

इसके बाद अंग्रेजो ने सबक लिया और 62 बरसाती नालो का निर्माण किया और सम्पूर्ण नैनीताल को 50 KM के radius में नालो के जाले से बांधा ताकि भविष्य में फिर कभी ऐसे भूस्खलन ना आ सके, लेकिन आज लोगो ने इन्ही नालो के ऊपर घर बना दिए है जो आगे आने वाले किसी बड़ी तबाही का कारण बन सकते है. 

तो सवाल यह नहीं है कि अगला बड़ा भूस्खलन कब आएगा? सवाल यह है कि...जब पहाड़ अगली बार चेतावनी देगा, क्या हम उसे सुन पाएंगे?

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Nainital 1850's ✅: कोई रास्ता नहीं था तब मल्लीताल जाने का हर जगह घने जंगल और रास्तो में झाड़िया थी, यह नैनीताल का प्रारंभिक दौर था.

Nainita
अंग्रेजो के जमाने में नैनीताल में खुद का Private Boat House Club था रामपुर के नवाब Hamid Ali Khan (Nawab of Rampur) का ✅

क्या आप जानते हैं कि कभी नैनीताल की नैनीझील के किनारे नवाब-ए-रामपुर की भी अपनी संपत्ति और निजी Boat House हुआ करता था? असल में इसका सबसे बड़ा कारण 1857 की क्रांति का है जब 1857 के विद्रोह के दौरान रामपुर के नवाब Yusuf Ali Khan ने ब्रिटिश अधिकारियों और शरणार्थियों को नैनीताल पहुंचाने में मदद की तथा Naini Tal तक British supply और communication lines खुली रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसीलिए 20 शताब्दी के शुरुवाती दौर में अंग्रेजो ने उनके बेटे Hamid Ali Khan के लिए private boathouse का निर्माण करवाया ताकि उनका नैनीताल आगमन में शाही अंदाज बना रहे.

1924 के एक पुराने यात्रा-विवरण में नैनीताल की झील पर मौजूद निजी Boat Houses का उल्लेख मिलता है। इसमें साफ लिखा है कि Nawab of Rampur और Raja of Awagarh के अपने निजी Boat Houses थे.....इतना ही नहीं, 1906 की नैनीताल की एक पुरानी directory में “Brook Hill” नाम की property के सामने “The Chief Secretary to H. H. the Nawab of Rampur” दर्ज मिलता है।

यानी रामपुर के नवाबों का नैनीताल से रिश्ता केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं था। नैनीताल में उनकी संपत्ति और झील पर उनका निजी Boat House भी था.....उस दौर में रामपुर के नवाबों का कुमाऊँ से गहरा संबंध बन चुका था। बाद में awab Hamid Ali Khan ने 1921 में Ghorakhal Estate भी खरीदा था।

आज Boat House Club के आसपास जब हम पुरानी इमारतों को देखते हैं, तो शायद ही अंदाजा होता है कि कभी इसी नैनीझील के किनारे अंग्रेजो के द्वारा बसाये रामपुर के नवाबों की भी मौजूदगी हुआ करती थी....नैनीताल की कहानी सिर्फ अंग्रेजों और राजाओं की कहानी नहीं है। इसकी झील के किनारे नवाबों, रियासतों और उनके अपने-अपने किस्से भी छिपे हैं।

नैनीताल का इतिहास जितना खूबसूरत है, उतना ही रहस्यमय भी।

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Nainital Mania को Follow और Subscribe क्यों करे आज इस Trailer को देखकर आप समझ जायेगे ✅
चंद शासको ने अंग्रेजो से कुमाऊँ पर दोबारा शासन करने की मांग की थी ✅

1790 के समय नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊं की पहाड़ियों पर आक्रमण किया, चंद राजा महेंद्र सिंह और उनके चाचा लाल सिंह ने अपने क्षेत्र की रक्षा की, लेकिन अंततः हवालबाग की लड़ाई में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद गोरखाओ ने शाही परिवार को पदच्युत कर दिया गया और चंदो को शरण लेने के लिए रोहिलखंड के मैदानों और तराई क्षेत्रों में भागने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जब अंग्रेजो ने 1816 में Anglo Nepalese war में गोरखाओ को बूरी तरह हराया तो पंवार शासक सुदर्शनशाह के कहने से उन्होंने गढ़वाल का एक क्षेत्र टिहरी रियासत राज्य करने के लिए दिया लेकिन Administrative power सिर्फ अंग्रेजो के पास थी..यह सब देखकर कुमाऊँ के निर्वासित चंद शासक महेंद्र चंद को उम्मीद जगी कि शायद अब उन्हें भी अपना पुराना राज्य वापस मिल सके। उन्होंने अंग्रेजों से कुमाऊँ में दोबारा शासन करने की अनुमति मांगी, लेकिन अंग्रेजों ने उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया।

British East India Company और अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने निर्वासित शाही परिवार को तराई क्षेत्र में कुछ भूमि और संपत्ति रखने की व्यवस्था की, जिससे वे अपना जीवन-यापन कर सकें। कहा जाता है कि महेंद्र चंद पहले रुद्रपुर में रहे और बाद में किलपुरी चले गए।
लेकिन सत्ता चली जाने के बाद भी परिवार के भीतर संपत्ति और पैतृक अधिकारों को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए। जैसे-जैसे चंद परिवार मैदानी इलाकों में बसता गया, वैसे-वैसे जागीरों, पैतृक संपत्तियों और ब्रिटिश अनुदानों पर अधिकार को लेकर परिवार की अलग-अलग शाखाओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी।

ब्रिटिश सरकार ने महेंद्र चंद के गुजर जाने के बाद उनके बेटे कुंवर प्रताप सिंह को 1820 में 250 रुपये (5 लाख) की मासिक पेंशन प्रदान की। कुंवर प्रताप सिंह ने बाजपुर क्षेत्र पर अपने पैतृक परदादा बाज बहादुर चंद के नाम से दावा किया, लेकिन colonial administration ने इस दावे को भी अस्वीकार कर दिया..Lal Singh ने चंद परिवार की प्रमुख जागीरों पर अपना कब्ज़ा बनाए रखा और अंततः काशीपुर जागीर के नाम से जानी जाने वाली संपत्ति को बनाया. 

Kashipur Estate में ही आखिरी बचे चंदो का समय बीता..1828 में लाल सिंह के बेटे Guman Singh को Kashipur का पहला राजा बनाते है. Guman Singh के बाद जितने भी चंद राजा उत्तराखंड के काशीपुर में रहे उनके बारे में आप फोटो में देखकर पढ़ सकते है. 

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दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि नैनीताल की खोज तक पहुँचने की कहानी जितनी खूबसूरत है, उतनी ही रोमांचक और संघर्षपूर्ण भी है?

18 नवंबर 1839 को ब्रिटिश व्यापारी P. Barron नैनीताल की उस खूबसूरत झील तक पहुँचे, जिसे बाद में दुनिया नैनीताल के नाम से जानने लगी। लेकिन यहाँ तक पहुँचना उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं था।

दरअसल, Barron ने नैनीताल के बारे में George William Traill, जो 1823 में नैनीताल पहुँचने वाले शुरुआती ब्रिटिश अधिकारियों में से एक थे, और कुछ स्थानीय पहाड़ी लोगों से सुना था कि नैनीताल बहुत सुंदर जगह है इसीलिए नैनीताल को अपनी आँखों से देखने की उत्सुकता उनकी इतनी बढ़ गई थी कि वह इसे खोजने के लिए जैसे जुनूनी हो गए थे।

सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि स्थानीय पहाड़ी लोग उन्हें नैनीताल का रास्ता ठीक से बताने को तैयार नहीं थे। लेकिन Barron ने हार नहीं मानी। वह लगातार रास्ते तलाशते रहे और हिमालय की यात्रा के बाद एक पहाड़ी आदमी को सिर पर पत्थर रखने का आदेश दिया कि यह पत्थर इसके सिर से तब उतरेगा जबतक यह नैनीताल तक ना पहुंचा दे .....आखिरकार शेर का डांडा पहाड़ी तक P Barron उस पहाड़ी आदमी के साथ पहुँच गए।

और फिर जो दृश्य उनकी आँखों के सामने था, उसने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया।

सामने फैली हुई नैनीझील का नीला-हरा पानी, जिसमें आसपास के पेड़-पौधों की परछाइयाँ बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थीं। Barron के अनुसार, झील का पानी ऐसा चमक रहा था मानो उसमें मोती बिखरे हों। उन्होंने लिखा कि उन्होंने इससे पहले इतनी सुंदर जगह नहीं देखी थी।

लेकिन आज के कंक्रीट से भरे नैनीताल की कल्पना उस समय बिल्कुल मत कीजिए।

1839 का नैनीताल चारों तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ था। ऊँचे देवदार और बाँज के पेड़, चारों ओर सन्नाटा और जंगल की प्राकृतिक खूबसूरती। Barron को इतनी ठंड महसूस हो रही थी कि उस समय का नैनीताल उन्हें बिल्कुल अलग ही दुनिया जैसा लग रहा था।

और उस समय का नैनीताल आज से कितना अलग था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तल्लीताल में, जहाँ आज Post Office दिखाई देता है, वहाँ एक छोटा-सा Naina Devi Temple था। वहीं एक बड़ा-सा झूला भी था, जो संभवतः किसी मेले या स्थानीय आयोजन में इस्तेमाल होता होगा।

उस रात Barron अपने साथी Captain C. के साथ मल्लीताल में नैनीझील के किनारे अपना टेंट लगाकर रुके।

अगली सुबह जब उनकी आँख खुली तो उनके टेंट के सामने का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था।

सैकड़ों पहाड़ी मुर्गे उनके टेंट के आसपास दाना चुग रहे थे।
British Nainital की तस्वीरों को कैद करने वाले गंगी साह, History Of Gangi Sah Photographer Nainital✅

आज हम जिस पुराने नैनीताल को तस्वीरों में देखते हैं, उसके पीछे कई ऐसे लोगों की मेहनत छिपी है, जिन्होंने अपने कैमरे से उस दौर को हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कर दिया। इन्हीं में एक बेहद खास नाम था Gangi Sah का।

Gangi Sah नैनीताल में रहने वाले उन शुरुआती भारतीय फोटोग्राफरों में से थे, जिन्होंने ब्रिटिशकालीन नैनीताल की जिंदगी, इमारतों, सड़कों और प्राकृतिक खूबसूरती को कैमरे में कैद किया। माना जाता है कि उन्होंने लगभग 1907 के आसपास नैनीताल की फोटोग्राफी शुरू की थी।

उनके हाथ में उस समय का Folding Pocket Camera या Kodak Brownie कैमरा दिखाई देता था। वह कैमरा लेकर नैनीताल के अलग-अलग हिस्सों में घूमते और वहां के दृश्यों को तस्वीरों में सहेजते थे। उस दौर में फोटोग्राफी आज की तरह आसान नहीं थी। कैमरा, फिल्म और पूरी प्रक्रिया अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण थी। ऐसे समय में Gangi Sah का लगातार तस्वीरें खींचना अपने आप में बड़ी बात थी।

सिर्फ Nainital तक सीमित नहीं था उनका Camera✅
Gangi Sah की खासियत यह थी कि उनकी फोटोग्राफी केवल स्थानीय लोगों के Portraits या नैनीताल के सामान्य दृश्यों तक सीमित नहीं थी।

उनकी तस्वीरों में Delhi, Agra और अन्य मैदानी क्षेत्रों के दृश्य भी मिलते हैं। बताया जाता है कि अंग्रेज अधिकारी उन्हें ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व वाले विषयों की तस्वीरें लेने के लिए बाहर भी भेजते थे। उनके काम में ताजमहल और मुगल शासकों से संबंधित Portraits तथा ऐतिहासिक वास्तुकला की तस्वीरों के उदाहरण भी मिलते हैं।

यानी Gangi Sah उस समय सिर्फ एक स्थानीय फोटोग्राफर नहीं थे। उनका कैमरा नैनीताल की पहाड़ियों से निकलकर भारत के बड़े ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंच चुका था।

कैमरे से किताब तक, Gangi Sah Writer as well✅
Gangi Sah केवल फोटोग्राफर ही नहीं थे, बल्कि अपने समय और समाज को दर्ज करने वाले लेखक भी थे....1927 में उन्होंने “श्री रामलीला नाटक” नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक के माध्यम से उस दौर की नैनीताल की रामलीला और तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक मिलती है।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Gangi Sah का काम केवल तस्वीरों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने तस्वीरों और लेखन, दोनों के माध्यम से अपने समय के नैनीताल को दर्ज किया।

नैनीताल से दुनिया तक पहुंचते थे उनके Postcards 

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आजादी के बाद का नैनीताल, जब Govind Ballabh Pant के साथ साथ Rajendra Prasad भी नैनीताल पहुँचे ✅

नैनीताल का इतिहास अंग्रेजो के जाने के बाद काफी बदला क्योकि अब देश की महान हस्तिया नैनीताल आने-जाने लगी थी, समय समय पर हर बड़ा अधिकारी नैनीताल में आता जरूर था. 

नैनीताल 1950 से लेकर 1980 तक एक विशेष Hill Station था लेकिन 1980 के बाद के नैनीताल में धीरे धीरे अंग्रेजी छवि खत्म हो गयी और अंग्रेजो के जमाने का कहा जाने वाला नैनीताल अब भारतीयों का नैनीताल कहलाने लगा 

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