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Nainital Mania

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अंग्रेज लोग नैनीताल में, British Era in Nainital ✅:

जैसा कि आप जानते हैं, नैनीताल की खोज और उसके आधुनिक स्वरूप को विकसित करने का श्रेय सिर्फ अंग्रेजों को दिया जाता है, जिन्होंने 1839 से 1947 तक इस नगर पर शासन किया। इसी दौरान नैनीताल एक छोटे से पहाड़ी क्षेत्र से बदलकर एक भव्य और आकर्षक Hill Station के रूप में उभरा।

British काल में नैनीताल के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित थी कि "नैनीताल आना छोटी विलायत (दूसरे देश) आने के समान है।" यह बात यूँ ही नहीं कही जाती थी। उस समय जब तराई क्षेत्रों के साथ-साथ Almora, Pithoragarh अथवा Garhwal के दूरस्थ गांवों से लोग पहली बार नैनीताल आते थे, तो यहाँ की चकाचौंध देखकर हैरान रह जाते थे।

अपने गांवों में उन्होंने अधिकतर पत्थरों से बने पारंपरिक मकान ही देखे होते थे, लेकिन नैनीताल पहुँचते ही उनके सामने एक बिल्कुल अलग दुनिया होती थी। यहाँ की विशाल European Buildings, Gym Khana, Nainital Club, Bar, Luxurious Hotel, कपड़ों की दुकानें, Grocery Items से सजे बाजार, Offices, Mall Road, Cinema Hall और तरह-तरह की Lights उन्हें ऐसा एहसास कराती थीं मानो वे किसी दूसरे देश में आ गए हों।

कई इतिहासकारों ने अपने लेखों में उल्लेख किया है कि उस दौर में Nainital पहुँचना पहाड़ के सामान्य लोगों के लिए केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि एक नई और आधुनिक दुनिया से पहला परिचय हुआ करता था। उस समय नैनीताल की ब्रिटिशकालीन भव्यता और आधुनिक सुविधाएँ स्थानीय लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं थीं।

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P. Barron के जमाने का नैनीताल, जिसने नैनीताल की खोज की , The Founder of The Nainital Mr Peter Barron who had discovered Nainital in Nov 1839 ✅:

नैनीताल की खोज P Barron ने नवंबर 1839 में की, और 1841 में उन्होंने नैनीताल जगह की बात सभी जगह फैला दी थी. P Barron व्यसाय से एक व्यापारी थे जिनका शराब और गन्ने का कारखाना था....उन्होंने उस समय के कुमाऊ कमिश्नर J. H. Batten को पत्र 1842  में पत्र लिखा जिसमे उन्होंने नैनीताल में अपना घर बनाने के लिए जमीन के लिए अर्जी दी. J. H. Batten ने तुरंत P Barron की अर्जी स्वीकार कर ली क्योकि नैनीताल के खोजकर्ता आखिर P Barron जो थे.

अभी जो आप photos नैनीताल की देख रहे हो वो P Barron के जमाने की है जिन्होंने नैनीताल को खोजा और विश्व पटल में नैनीताल का नाम उजागर किया, हालाँकि ये कहना गलत नहीं होगा कि George William Trail 1823 में नैनीताल आये थे लेकिन वो नैनीताल की खोज का credit नहीं ले सके क्योकि Mr Trail धार्मिक स्वाभाव के थे और उन्होंने नैनीताल जगह की जानकारी भारतीयों के आस्था के अनुसार छुपा दी लेकिन 1839 में P Barron का दिमाग इतना चतुर था कि उन्होंने नैनीताल को ढूंढ ही निकाला और नैनीताल के खोजकर्ता का क्रेडिट Mr P Barron ने ले लिया। 

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अंग्रेजो के जमाने में नैनीताल में आती थी ऐसी बसे, Nainital Bus during Colonial Nainital ✅

आज से 100 साल पहले का जमाना बिल्कुल अलग था और भारत में संपूर्ण ब्रिटिश राज था, उस दौरान गाड़िया अपने प्रारंभिक दौर में थी, जहाँ उस जमाने में ऐसी बसे नैनीताल में आया करती थी 

दोस्तों नैनीताल का विकास अंग्रेजो ने 1841 की शुरुवात से ही कर दिया था, और 1880 तक नैनीताल एक प्रसिद्ध hill Station बन चुका था, जब इंग्लैंड में गाड़ियों का आविष्कार हो गया था तब अंग्रेजो की गाड़िया 1910-1912 से India आने लगी थी, George V ने भी कार में बैठकर भारत के कई जगहों की यात्रा की.

नैनीताल में रोड की शुरुवात 1911-1915 के आसपास की बताते है और 1920  से ही नैनीताल में अंग्रेजो की गाड़िया धीरे धीरे आने लगी थी, यही से पता चलता है कि नैनीताल अंग्रेजो के लिए कितना महत्वपूर्ण शहर बन गया था. 

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Marianne North जब इंग्लैंड से 1878 में पहली बार नैनीताल आयी और उत्तराखंड का पुराना जमाना दिखा दिया ✅

अगर अंग्रेज़ों ने नैनीताल की खोज और विकास न किया होता, तो शायद आज यह खूबसूरत पहाड़ी नगर दुनिया भर में इतना प्रसिद्ध न होता। नैनीताल के इतिहास को समझने में अंग्रेज़ों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। लेकिन केवल शहर बसाने तक ही नहीं, कुछ अंग्रेज़ ऐसे भी थे जिन्होंने अपने काम के माध्यम से पुराने कुमाऊँ और गढ़वाल को हमेशा के लिए अमर कर दिया। इन्हीं में से एक थीं Marianne North (English biologist). 

1878 में इंग्लैंड से Marianne North भारत आयी और वो भारत के कई इलाको में घूमी लेकिन उन्हें कुमाऊ और गढ़वाल क्षेत्र बहुत पसंद आया और उन्होंने यहाँ 2 साल बिताये। इन्ही 2 सालो में उन्होंने नैनीताल, भीमताल, मसूरी और अल्मोड़ा समेत संपूर्ण उत्तराखंड की यात्रा की और उन जगहों की painting करी क्योकि Camera हर किसी के पास हो ये संभव नहीं था बल्कि camera अपने प्रारंभिक दौर में था.

Marianne North ने नैनीताल और संपूर्ण कुमाऊ को अपने पेंटिंग के माध्यम से संजोया जिनकी मदद से हमें ये पता चला की आज से 200 साल पहले का नैनीताल और उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र कैसा था.

Marianne North का जन्म 24 August 1830 को Hastings, England में हुआ था  वे दुनिया भर की दुर्लभ वनस्पतियों, पेड़-पौधों और प्राकृतिक दृश्यों को चित्रों के माध्यम से संरक्षित करने के लिए जानी जाती हैं.. उन्होंने विवाह नहीं किया और अपना जीवन अधिकांश यात्रा और चित्रकला को समर्पित किया.....1871 से 1885 के बीच उन्होंने Asia, Africa, Australia, Northऔर South America सहित कई देशों की यात्रा की।

उस समय फोटोग्राफी इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए उनके चित्र वैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं......उनका निधन 30 August 1890 को हुआ.

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My Elder Sisters & Brother, Past Memory 21 years ago

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चंद राजा Shakti Singh Gusai अंधे थे लेकिन कुमाऊँ को मुठ्ठी और नाली का ज्ञान देकर चले गए✅:

चंद राजा Rudra Chand के सबसे बड़े पुत्र Shakti Singh Gusai (शक्तिसिंह गुसाईं) जन्म से ही दृष्टिहीन थे। राजगद्दी के असली उत्तराधिकारी होने के बावजूद उन्होंने राज्य के हित को सर्वोपरि रखा और अपने छोटे भाई लक्ष्मी चंद को कुमाऊँ की गद्दी सौंप दी। लेकिन आंखों की रोशनी न होने के बावजूद उनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पूरे कुमाऊँ में प्रसिद्ध थी।

कहा जाता है कि शक्तिसिंह गुसाईं ने अपनी दृष्टि वापस पाने के लिए अनेक धार्मिक अनुष्ठान, दान-पुण्य और पूजा-पाठ किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। फिर भी उन्होंने समाज के लिए ऐसा कार्य किया, जिसकी पहचान आज भी कुमाऊँ की संस्कृति में जीवित है।

उन्होंने भूमि मापन की दो महत्वपूर्ण इकाइयों,"मुठ्ठी" (Mutthi) और "नाली" (Naali), को व्यवस्थित रूप दिया ताकि लोग अपनी खेती और जमीन को आसानी से माप सकें।

शक्तिसिंह गुसाईं के अनुसार "मुठ्ठी" का अर्थ 1 मुठ्ठी धान, गेहूं या �
जब अंग्रेज लोग पहली बार लामा लेकर नैनीताल आये, Llama came in Nainital 1940's ✅: 

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