भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु की तन-मन से सेवा करने वाले शिष्य का हक मारना या उसके साथ अन्याय करना गंभीर पाप माना गया है। ऐसे व्यक्ति जो किसी निस्वार्थ सेवी या विकलांग (दिव्यांग) व्यक्ति का हक छीनकर किसी और को देते हैं, वे 'पाप के भागीदार' होते हैं। इस विषय पर कुछ प्रमुख बातें: गुरु सेवा का फल: तन-मन से गुरु की सेवा करना सबसे उच्च कोटि की भक्ति मानी गई है। जो गुरु सेवा में अपना जीवन समर्पित करता है, उसका हक न केवल गुरु बल्कि समाज द्वारा भी सुरक्षित किया जाना चाहिए। दिव्यांगों के साथ अन्याय: दिव्यांगों (विकलांग) की सेवा करना मानवता की सेवा माना गया है। उनके साथ भेदभाव या उनके हक का शोषण करना, उन्हें मिलने वाले सामाजिक सुरक्षा से वंचित करना, नैतिक रूप से गलत और पापपूर्ण है।