अमनारी की पगडंडियों से रेगिस्तान की सरहद तक का सफर: न पिता का साया, न पैरों में जूते; पर हौसले इतने ऊंचे कि छू लिया सरहद का आसमान। पगडंडियों पर नंगे पांव दौड़ते हुए जब रंजना के पैरों में छाले पड़ते थे, तो उसे दर्द नहीं, अपना वह सपना याद आता था जिसे उसने 9 साल की उम्र में अपनी आंखों के सामने पिता की अर्थी उठते देख बुना था। उसके बीएसएफ बनने से सब खुश हैं।