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प्रताप नारायन मिश्र

@global_spirituality
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भक्ति मार्ग में श्रद्धा और विश्वास की अनिवार्यता
प्रेम पूर्वक राम नाम स्मरण करने से अभागा मनुष्य भी बन जाता है भाग्यशाली
https://youtube.com/shorts/HU9miwB2TjU?si=LZesFe
कितनी पापी और स्वार्थी है ये दुनियां?
https://youtube.com/shorts/jRroXtkDhwI?si=GmVWQbs5yIWQBUWR
सर्वश्रेष्ठ भक्त कैसे करता है,सगुण और निर्गुण ब्रह्म दोनों की एक साथ उपासना ?
https://youtube.com/shorts/ZhPb09oUEXw?si=
"राम भी हैं अपने नाम के गुलाम"
संसार खुशियों से भरा है, इसमें तुम्हारे दुखों का कारण है तुम्हारी झूठी भक्ति
https://youtube.com/shorts/aDXeV_ww49g?si=c
जीवन विचारों और विकारों का संगम है।
https://youtube.com/shorts/hnnrjM_JReQ?si=NIFrTJ4-oPSr2vKB
हनुमानजी के मुख से कब और क्या बोले थे भगवान श्री राम? श्रीराम के वियोग में भी छिपा है अध्यात्म।
माया की शक्ति के आगे विवश हैं सभी मनुष्य
https://youtube.com/shorts/dcGUPdNocWI?si=XGv5TnM3CyUZnt57
भगवान शिव के अनुसार सभी मनोकामनाओं की पूर्ति केवल राम का नाम ही कर सकता है।
गीता उपदेश सुनकर शूद्र की स्थिति से क्षत्रिय स्थित को प्राप्त हुए थे अर्जुन
कलियुग में राम नाम से बढ़कर नहीं है कोई दूसरा आश्रय
दशानन शरीर के साथ जीवात्मा की स्थिति है बहुत ही दयनीय, इसे कराना होगा बंधन मुक्त
"आंखों का देखा और कानों का सुना भी सत्य समझकर बोलना है पाप"
जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ण और आश्रम व्यवस्था नहीं है अध्यात्म, यह सब माया है।
प्रेम और भक्ति की एकरूपता तथा भक्ति के स्वरूप में स्थित होने का तरीका
जीवन यात्रा को सुगम बनाने में शरीर की उपयोगिता क्या है? तथा इसका संचालन कैसे करें?
https://youtube.com/shorts/s6pZlc3kmd
"शरणागति" ईश्वर की कृपा पाने का सर्वोत्तम साधन है।
ना मैं मरा न तन मरा, जग में मरा न कोय। जाकी जैसी भावना, सो तस तेहि छन होय।।
आप भी हो रामजी की लीला के एक पात्र, उनके अनुसार ही चल रहा है आपका अभिनय
सकारात्मक सोंच से होगा सभी दुखों का अंत, नकारात्मक सोंच वालों से रहें दूर।
भजन का अर्थ तथा भजन के प्रकार
https://youtube.com/shorts/UQ57mnC55Rs?si=C5vTw-9HNdsfVnjG
हनुमानजी को नहीं मिला था कोई श्राप, ब्रह्मज्ञान की वजह से भूले थे शारीरिक बल
ना शिष रहा, न गुरु रहे, रहे सिर्फ भगवान।
शिष के मिटते गुरु भी हो गए अंतर्ध्यान।।
99% मनुष्य अपनी मूर्खता से कर रहे आत्महत्या, अतः भोग रहे नरक